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पितृ– परिचय और जानकारी

 पितृपक्ष,  पितृ पूजा मंत्र, पितृ प्रार्थना पितृपक्ष – परिचय और जानकारी पितृ पक्ष पितरों को याद और उनकी पूजा करने का समय है. पितृ पक्ष 16 दिन का होता है, जो भाद्रपद की पूर्णिमा को शुरू होता है और अश्विन की अमावस्या यानि सर्व पितृ अमावस्या को खत्म होता है. पितृ पक्ष के दौरान तर्पण श्राद्ध किया जाता है. मान्यता है कि पितृ पक्ष के दिनों में यमराज आत्मा को मुक्त कर देते हैं. जिससे वे अपने परिजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें. पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष दूर होता है. ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को अशुभ फल देने वाला माना गया है. अतः श्राद्ध में पितरों का तर्पण करने से पितृ दोष से आने वाली परेशानियां दूर होती हैं और पितरों का आशीर्वाद मिलता है. पितृ पक्ष के दौरान मृत परिजनों की आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए तर्पण किया जाता है. यहां जानिए श्राद्ध पूजा की सामग्री, श्राद्ध विधि, पितृ पक्ष तर्पण विधि, तर्पण विधि मंत्र, पितृ प्रार्थना, पितृ पक्ष का महत्व आदि के बारे में- पितृपक्ष के मुख्य दिन चौथ भरणी या भरणी पंचमी- गतवर्ष जिनकी मृत्यु हुई है उनका श्राद्ध इस ति...
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गजेंद्र मोक्ष

 गजेंद्र और ग्राह मुक्ति कथा वैकुण्ठ के द्वारपाल जय और विजय पूर्व जन्म में कौन थे? क्षीरसागर में एक त्रिकूट नामक एक प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठ पर्वत था। उसकी ऊँचाई आसमान छूती थी। उसकी लम्बाई-चौड़ाई भी चारों ओर काफी विस्तृत थी। उसके तीन शिखर थे, पहला सोने का, दूसरा चाँदी का तीसरा लोहे का। इनकी चमक से समुद्र, आकाश और दिशाएँ जगमगाती रहती थीं। इनके अलावा उसकी और कई छोटी चोटियाँ थीं जो रत्नों और कीमती धातुओं से बनी हुई थीं। सब ओर से समुद्र की लहरें आकर इस पर्वत के निचले भाग से टकरातीं जिससे प्रतीत होता कि समुद्र इनके पाँव पखार रहा था। पर्वत की तलहटी में तरह-तरह के जंगली जानवर बसेरा बनाए हुए थे। इसके ऊपर बहुत सी नदियाँ और सरोवर भी थे। इस पर्वतराज त्रिकूट की तराई में एक तपस्वी महात्मा रहते थे जिनका नाम वरुण था। महात्मा वरुण ने एक अत्यन्त सुन्दर उद्यान में अपनी कुटी बनाई थी। इस उद्यान का नाम ऋतुमान था। इसमें सब ओर अत्यन्त ही दिव्य वृक्ष शोभा पा रहे थे, जो सदा फलों-फूलों से लदे रहते थे। इस उद्यान में एक बड़ा-सा सरोवर भी था जिसमें सुनहले कमल भी खिले रहते थे तथा विविध जाति के कुमुद, उत्पल, शतदल कमल...

साकार व निराकार ब्रम्ह

 भगवान के साकार व निराकार रूप!!!!!! भगवान अथार्त ब्रह्म परमात्मा परमेश्वर निराकार है या साकार है । इस पर हमेशा से ही भिन्न भिन्न विचार लोग रखते आये हैं व प्रायः विद्वान् जनो व भक्तों ने भी इस पर अपनी अपनी राय अपने अपने साधन व साधन की सफलता के अनुरूप दी है। यहाँ ये समझना आवश्यक है की ये प्रभु की महान कृपा की उसने सभी को जिसने उसे जिस भी रूप में देखा और राय दी उसे मंडित किया अपने प्रिय भक्तों के विचारों के अनुसार करूणानिधि व भक्तवत्सल प्रभु ने प्रायः सभी रूपों में अपने को प्रदर्शित किया । भगवान के लिए कुछ भी असंभव नहीं और वो तो वैसे भी सबकुछ है ही चाहे हम निराकार रूप को लें या साकार रूप को लें । परन्तु भगवान क्या साकार व निराकार के अतिरिक्त भी कुछ हो सकते हैं तो जहाँ तक इंसान सोच सकता है भगवान वहां तक हो सकते हैं चाहे वो सगुण साकार की बात हो या निर्गुण निराकार या फिर दोनों का मिश्रित रूप । प्राकृतिक मन बुद्धि इन्द्रियों के द्वारा भगवान की विवेचना नहीं हो सकती क्यूंकि परमात्मा चेतन है सबका प्रकाशक है व मन बुद्धि इन्द्रियाँ जड़ हैं वस्तुतः परमेश्वर के लिए ये कहना की वो साकार ही है अथवा...

वृतांत

 ✨ मानसी-सेवा का अद्भुत फल ✨   🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 बहुत पुरानी बात है, वृन्दावन में एक सन्त रहते थे।  . उनके पास बालकृष्ण की एक मूर्ति थी जिसे वह अपना पुत्र मानते थे और स्वयं को नंदबाबा समझकर श्रीकृष्ण की मानसिक सेवा किया करते थे।  . श्रीकृष्ण का चरित्र ही इतना अद्भुत है कि उनसे आप अपना कोई भी नाता (पिता, पुत्र, स्वामी, पति, सखा, दास आदि) जो भी आपको अच्छा लगे, जोड़ सकते हैं... . तोहि मोहि नाते अनेक मानिये जो भावै। ज्यों-त्यों तुलसी कृपालु चरन-सरन पावै।।  (विनय-पत्रिका ७९) . संत बाबा ब्राह्ममुहुर्त से लेकर रात्रि में शयन करने तक कन्हैया की मानसिक सेवा करते और मन से ही उन्हें सभी वस्तु अर्पण करते थे।  . प्रात:काल ही लाला (व्रज में लड्डूगोपाल को लाला कहते हैं) को भूख लगी होगी-ऐसा सोचकर कन्हैया के लिए दूध, मलाई, मिश्री का मानसिक रूप से प्रबन्ध करते।  . दोपहर में लाला से पूछते 'क्या खायेगा ?', वही तैयार करते। शाम को ब्यारु (रात्रि भोजन) कराते और रात को सोते समय दूध पिलाते। . गीता (९।२६) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं.. . पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रय...

गणेश स्तोत्र

 हर प्रकार के ऋणों से मुक्ति देने वाला गणेश स्तोत्र.....  जिस प्रकार मंत्र ध्वनि का समूह है, उसी प्रकार स्तोत्र पाठ भी ध्वनि का समूह ही है जिससे साधक को फल की प्राप्ति अवश्य होती है । स्तोत्र पाठ से अनेक समस्याएं स्वयं ही हल हो जाती हैं लेकिन इसमें शर्त यह है कि मनुष्य में उसमें आस्था होनी चाहिए और स्तोत्र का पाठ उच्च स्वर में किया जाना चाहिए । कृष्णयामल ग्रंथ में हर प्रकार के ऋणों से मुक्ति देने वाले गणेश स्तोत्र का वर्णन किया गया है । ऋणहर्ता गणेश एक बार कैलास पर्वत के रमणीय शिखर पर भगवान चन्द्रशेशर शिव गिरिराजनन्दिनी पार्वती के साथ बैठे हुए थे । उस समय पार्वतीजी ने भगवान शिव से कहा—‘आप सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता हैं । कृपा करके मुझे ऋण नाश का उपाय बताइये ।’ शिवजी ने कहा—‘तुमने संसार के कल्याण की कामना से यह बात पूछी है, इसे मैं जरुर बताऊंगा । भगवान गणेश ऋणहर्ता हैं । उनका ‘ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र’ हर प्रकार के कर्जों से मुक्ति दिलाने वाला है ।’  इस स्तोत्र का पाठ करने से पहले गणेशजी का ध्यान कर लेना चाहिए । ध्यान  सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं लम्बोदरं पद्मदले निविष्...

श्री कृष्ण

 स्नेह वंदन...!!! भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उद्धवजी को तत्व ज्ञानोपदेश !!! उद्धवजी ने भगवान से कहा—‘आपने थोड़े समय में मुझे अच्छा ज्ञान दिया है । मैं आपकी शरण में हूँ, मैं भी आपके साथ आपके धाम चलूंगा ।’ भगवान ने कहा—‘उद्धव ! तेरे हृदय में मैं चैतन्य रूप से स्थित हूँ । तू मेरा जहां ध्यान करेगा, वहीं मैं प्रकट हो जाऊंगा । तू यह भावना रखना कि श्रीकृष्ण मेरे साथ ही हैं ।’ भगवान अपनी चरण-पादुका उद्धवजी को देकर स्वधाम पधार गए । उद्धवजी भगवान श्रीकृष्ण के समान श्यामवर्ण और कमलनयन हैं । मथुरा आने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को अपना अंतरंग सखा और मंत्री बना लिया । उद्धवजी के लिए भगवान श्रीकृष्ण का कथन है— ‘उद्धवजी ! मुझे आप जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रिय हैं, उतने ब्रह्माजी, शंकरजी, बलरामजी, लक्ष्मीजी भी प्रिय नहीं हैं । अधिक क्या, मेरा आत्मा भी मुझे उतना प्रिय नहीं है ।’  (श्रीमद्भागवत ११।१४।१५) भगवान ने गोपियों को सान्त्वना-संदेश पहुंचाने के लिए उद्धवजी को व्रज में भेजा परन्तु वे गोपियों के महाभाव को लेकर, उनके चेले बन कर लौटे । भगवान श्रीकृष्ण के साथ वे द्वारका गए । जब द्वारका में अपशक...

ब्रम्हा की वंशावली

 ब्रह्मा की सन्तान ब्रह्मा जी से दक्ष हुआ जिसे ब्रह्मा जी ने सृष्टि करने की आज्ञा दी । तब दक्ष ने अपनी पत्नी वीरिणी के गर्भ से ६० कन्याएं उत्पन्न कीं। उनमें से दस को धर्म से, तेरह कश्यप जी से, सत्ताईस चन्द्रमा से ब्याह दीं । चार कन्याएं अरिष्टनेमि को, दो भृगुपुत्र को, दो कृशाश्व को, दो अंगिरा मुनि को ब्याह दी । कश्यप की स्त्रियां  अदिति  अंश धाता भव त्वष्टा मित्र वरुण अर्यमा विवस्वान सविता पूषा अंशुमान विष्णु - ये सहस्त्र किरणों वाले बारह आदित्य हैं  सुरभि  अजैकपाद अहिर्बुधन्य विरुपाक्ष रेवत हर बहुरूप त्र्यम्बक सवित्र जयन्त पिनाकी अपराजित - ये ग्यारह रुद्रगण हैं, जो असंख्य रुद्रगणों के स्वामी हैं  दिति  हिरण्यकश्यिपु प्रह्लाद  गवेष्ठि कालनेमि जम्भ बल्वल शम्भु  धेनुक, शोमलोमा  विरोचन  बलि  अनुह्लाद   निवातकवच नामक दैत्य(लगभग ३ करोड़, सभी अर्जुन द्वारा मारे गए) ह्लाद  मूक (अर्जुन द्वारा किरात प्रदेश में मारा गया) ह्लद   सुन्द   मारीच (ताड़का से, दण्डकारण्य में श्रीराम द्वारा मारा गया) उपसुन्द हिरण...