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Showing posts from December, 2020

शकुन शास्त्र

 *शकुन शास्त्र के 12 सूत्र  घर में हर छोटी वस्तु का अपना महत्व होता है। कभी-कभी बेकार समझी जाने वाली वस्तु भी घर में अपनी उपयोगिता सिद्ध कर देती है। गृहस्थी में रोजाना काम में आने वाली चीजों से भी शकुन-अपशकुन जुड़े होते हैं, जो जीवन में कई महत्वपूर्ण मोड़ लाते हैं। शकुन शुभ फल देते हैं, वहीं अपशकुन इंसान को आने वाले संकटों से सावधान करते हैं। हम आपको घर से जुड़ी वस्तुओं के शकुनों के बारे में बता रहे हैं। 1-दूध का शकुन सुबह-सुबह दूध को देखना शुभ कहा जाता है। दूध का उबलकर गिरना शुभ माना जाता है। इससे घर में सुख-शांति, संपत्ति, मान व वैभव की उन्नति होती है। दूध का बिखर जाना अपशकुन मानते हैं, जो किसी दुर्घटना का संकेत है। दूध को जान-बूझकर छलकाना अपशकुन माना जाता है , जो घर में कलह का कारण है। 2-दर्पण का शकुन हर घर में दर्पण का बहुत महत्व है। दर्पण से जुड़े कई शकुन-अपशकुन मनुष्य जीवन को कहीं न कहीं प्रभावित अवश्य करते हैं। दर्पण का हाथ से छूटकर टूट जाना अशुभ माना जाता है। एक वर्ष तक के बच्चे को दर्पण दिखाना अशुभ होता है। यदि कोई नव विवाहिता अपनी शादी का जोड़ा पहन कर श्रृंगार सहित खुद को...

शक्ति पीठ

 .            तमिलनाडु का कन्याकुमारी शक्तिपीठ           पौराणिक आख्यान है, एक बार बाणासुर नामक असुर ने भगवान् शिवशंकर की कठिन तपस्या की और अमरत्व का वर माँगा। उसको वर देते समय शिव ने एक शर्त रखी थी कि तुम कुमारी कन्या के अतिरिक्त अन्य सबसे अजेय रहोगे। शिव का वर मिलने के बाद उसने खूब उपद्रव एवं उत्पात करने शुरू कर दिये। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गयी। इससे सभी देवता भयभीत हो गये। तब उसके उत्पात से पीड़ित देवता भगवान् विष्णु की शरण में गये। विष्णु के कथनानुसार एक महायज्ञ का आयोजन किया गया। उस यज्ञ में हवन करने पर यज्ञकुण्ड की चिद् (ज्ञानमय) अग्नि से दुर्गाजी अपने एक अंश से कन्या रूप में प्रकट हुईं। बड़ी होने पर उस कन्या ने भगवान् शंकर को वररूप में पाने के लिये दक्षिण समुद्र के तट पर कठोर तपस्या की। उस कन्या के तप से भगवान् शिव बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने उसके साथ पाणिग्रहण स्वीकार किया। देवों को फिर चिन्ता सताने लगी कि यदि विवाह हो गया तो बाणासुर का वध होना कठिन हो जायगा। इस कार्य को रोकने का दायित्व ऋषियों ने नारद को सौंपा। नार...

तुलसी पूजा

 प्रिय साधको प्रणाम 🙏 आज का विषय है *💥तुलसी माता की पूजा से संबन्धित तथा उनके पवित्र मंत्र💥* आदि  तुलसी माँ की प्रतिदिन पूजा  करने से घर में धन-संपदा, वैभव, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती हैं।  यदि प्रतिदिन मां तुलसी से कोई मनोकामना कहीं जाए तो वह भी निश्चित रूप से पूरी होती है। शिव भगवन तथा गणेश पूजा के अतिरिक्त कोई भी पूजा तुलसी के बिना अधूरी होती है ।  साधको तुलसी माँ की महिमा अपार  है ,  तुलसी दर्शन करने से  समस्त पापों का नाश होता है,  उन्हे स्पर्श करने से शरीर पवित्र होता है,  तुलसी माता को प्रणाम करने से  रोगों का निवारण होता है,  तो उन्हे जल से सींचने पर मनोकामना पूर्ति  होती  है,  उनका पौधा लगाने से जातक भगवान के समीप आता है तो वही उनको भगवद चरणों में चढ़ाने पर मोक्ष रूपी फल प्राप्त होता है,  👉 तुलसी पत्र कभी भी द्वादशी , रविवार , सूर्यास्त के बाद , सूर्य ग्रहण तथा चन्द्र ग्रहण के दिन नहीं तोड़ना चाहिए , ना ही जल अर्घ्य देना चाहिए ,  👉 परंतु उनके समक्ष दीपदान प्रतिदिन कर सकते है ।  👉 तु...

अन महत्व

 जैसा खाए अन्न ,वैसा बने मन ।  भोजन_का_मन_पर_क्या_असर_होता_है । " तीन महीने का प्रयोग करके देखे कि सात्विक अन्न खाने से ,  आप को एक बदलाव महसूस होने लगेगा क्योंकि  *जैसा अन्न वैसा मन। सात्विक अन्न सिर्फ शाकाहारी भोजन नही बल्कि परमात्मा की याद में बनाया गया भोजन है . *गुस्से से अगर खाना बनाया गया है उसे सात्विक अन्न नही कहेंगे, इसलिए खाना बनाने वालों को कभी भी नाराज,  परेशान स्थिति में खाना नही बनाना चाहिए।  किसी को डांट दो, गुस्सा कर दो और बोलो जाके खाना बनाओ.....अब....? खाना तो हाथ बना रहा है मन क्या कर रहा है अन्दर मन तो लगतार खिन्न है -......तो वो सारे Vibration खाने के अंदर जा रहे है...  भोजन_तीन_प्रकार_का_होता_है- 1. जो हम Hotel में खाते है 2. जो घर में माँ बनाती है और  3. जो हम मंदिर और गुरूद्वारे में खाते है तीनो के Vibration अलग अलग होते हैं । (1) जो Hotel में खाना बनाते है उनके Vibration कैसे होते है आप खाओ और हम कमायें।   (2) घर में जो माँ खाना बनाती है  वो बड़े प्यार से खाना बनाती है...  एक बच्चा अपनी माँ को बोले कि.....

महाभारत का रोचक प्रसंग

 महाभारत में युद्ध के बाद मृत्यु से पहले इन 4 योद्धाओं की थी सबसे कठिन अंतिम इच्छा 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 महाभारत अनगिनत कहानियों से भरा हुआ है. जीवन को समझना है तो महाभारत के विभिन्न पात्रों से जुड़ी हुई घटनाओं को पढ़कर बहुत कुछ जाना जा सकता है. महाभारत में ऐसा ही प्रसंग है योद्धाओं की अंतिम इच्छा से जुड़ा हुआ. आइए, जानते हैं महाभारत के किन योद्धाओं ने अपनी कौन-कौन सी अंतिम इच्छा रखी थी| घटोत्कच की अंतिम इच्छा 〰〰〰〰〰〰〰〰 जब श्रीकृष्ण ने भीमपुत्र घटोत्कच की अंतिम इच्छा के बारे में पूछा तो घटोत्कच ने विनम्रतापूर्वक कहा ‘हे प्रभु यदि मैं वीरगति को प्राप्त करूं, तो मेरे मरे हुए शरीर को ना भूमि को समर्पित करना, ना जल में प्रवाहित करना, ना अग्नि दाह करना मेरे इस तन के मांस, त्वचा, आँखे, ह्रदय आदि को वायु रूप में परिवर्तित करके आकाश में उड़ा देना. मेरे शरीर के कंकाल को पृथ्वी पर स्थापित कर देना. आने वाले समय में मेरा यह कंकाल महाभारत युद्ध का साक्षी बनेगा. श्रीकृष्ण ने घटोत्कच की मृत्यु के बाद उनकी अंतिम इच्छा पूरी की थी| विदुर की अंतिम इच्छा 〰〰〰〰〰〰〰 युद्ध के समय जब विदुर श्रीकृष्ण से मिले और ...

श्री विष्णु

 ||श्री विष्णु|| ॐ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् | अनेकरूपं दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् || 🌷🌱🌷सुप्रभातम्🌷🌱🌷     गुरुवार के दिन भगवान विष्णु का स्मरण कर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना फलदायी रहता है. शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु जगत का पालन करने वाले देवता हैं. उनका स्वरूप शांत और आनंदमयी है. श्रीहरि विष्‍णु के विविध मंत्र हैं जिनका जाप कर धन-वैभव एवं संपन्नता में वृद्धि की जा सकती है. लक्ष्मी विनायक मंत्र दन्ताभये चक्र दरो दधानं, कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्। धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया, लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।। विष्णु के पंचरूप मंत्र  ॐ अं वासुदेवाय नम: ॐ आं संकर्षणाय नम: ॐ अं प्रद्युम्नाय नम: ॐ अ: अनिरुद्धाय नम: ॐ नारायणाय नम: ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान। यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्‍टं च लभ्यते।। सरल जाप  ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।। धन-वैभव एवं संपन्नता पाने का विशेष मंत्र  ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।  ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुर...

स्वस्थ्य कौन ..?*

  एक गोष्ठी हो रही थी। प्रश्न उठा—स्वस्थ कौन और रोगी कौन? कुछ बीमार थे। उन्होंने स्वीकार किया—हम बीमार हैं, अमुक-अमुक रोग से ग्रस्त हैं। कुछ स्वस्थ थे। उन्होंने स्वीकार किया—हम स्वस्थ हैं। बीमारी का नाम तक नहीं जानते। चर्चाएं चलीं। स्वस्थ और अस्वस्थ की मीमांसा हुई। एक हट्टे-कट्टे व्यक्ति ने कहा, मैं पूर्ण स्वस्थ हूं। इतने में ही तीसरे व्यक्ति ने व्यंग्य कसते हुए कुछ बात कह दी। व्यंग्य उस व्यक्ति के लिए गाली का काम कर गया। गाली गोली बन गई। वह तिलमिला उठा। वह आक्रोश में आकर व्यंग्य कसने वाले को बुरा-भला कहने लगा। क्रोध से वह आगबबूला हो गया। उस व्यंग्य करने वाले ने कहा— अरे! अभी तो तुम कह रहे थे कि तुम स्वस्थ हो। थोड़े से व्यंग्य से तिलमिला उठे, आपा खो दिया। क्या यह बीमारी का लक्षण नहीं है? ऎसे अनेक लोग होते हैं जिनकी धृति और मनोबल बहुत कमजोर होता है। वे छोटी-सी समस्या के आगे घुटने टेक देते हैं। क्या यह बीमारी नहीं है? क्या ज्वर आना ही बीमारी है? क्या क्रोध से उत्तप्त हो जाना बीमारी नहीं है? स्वास्थ्य केवल शरीर से जुड़ा हुआ ही नहीं होता। उसका सम्बंध भाव से भी है। भावना के स्तर पर जो आ...

शिव रहस्य भाग2

 शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी? 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 आइए पढ़ते है भगवान शिव के वाहन नंदी से सम्बंधित एक कहानी जिससे हमें पता चलेगा की नंदी क्यों और कैसे महादेव की सवारी बनें? और शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ? पौराणिक कथा 🔸🔸🔹🔸🔸 शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त  होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की। मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे। शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा। परन्तु इंद्र ने यह वरदान देने में असर्मथता प्रकट की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा। भगवान शंकर शिलाद मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया और नंदी के रूप में प्रकट हुए। शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु से भय मुक्त, अजर-अमर और अदु:खी हो गया। भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों, गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया। इस तरह...

शिव रहस्य

 भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा ही क्यों.. ? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। ''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र :  〰️🔸〰️ शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : 〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️ सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत...

शिवालय सूत्र

 शिवालय निर्माण - सर्वोत्तम दिव्य कर्म                      शिवालय - ब्रह्मयंत्र      3000 साल पहले पृथ्वीलोक पर एक मात्र सनातन धर्म ही था तब वैदिक परंपरा से मात्र शिवमंदिर का ही निर्माण किया जाता था । अन्य देवी देवताओं के प्रागट्य या कार्य स्थान पर पिण्डिका या कोई प्रतीक चिन्ह होते थे पर मंदिर निर्माण शिवालय का ही किया जाता था । वैदिक परंपरा के ऋषिमुनि निराकार ब्रह्म शिवलिग में ही समग्र सृष्टि है इनसे ज्ञात थे । 25 , 26 सो साल पहले अलग सम्प्रदायों बने और मूर्ति पूजा प्रथा शुरू हुई । शिवालय का निर्माण सर्वोत्तम कर्म क्यों है उनके कुछ विज्ञान सम्मत कारण भी है ।        आकाशगंगा में रही चुम्बकीय शक्ति और कॉस्मेटिक एनर्जी का अभ्यास कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया कि पुरातन शिवलिंग , ज्योतिर्लिगों के आसपास अतिभारी कॉस्मेटिक ऊर्जा पाई जाती है । कही जगहों पर तो भग्न हुवे या जमीन में गर्भस्त हुवे मंदिर या पहाड़ो ओर जंगलमे भी ये प्रचंड ऊर्जा पाई गई और उत्खुलन के बाद या इतिहासिक घटनाओ के अभ्यास के बाद वहां शि...

सरल उपाय

 *मां लक्ष्मी की पूजा से बच सकते हैं धन के नुकसान,जानिए मां किस रूप की पूजा करें* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 धन और संपत्ति की देवी हैं मां लक्ष्मी*. शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि शाम विधिवत पूजन से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और जातकों पर धन वर्षा करती हैं। माना जाता है कि समुद्र से इनका जन्म हुआ और इन्होंने श्रीविष्णु से विवाह किया. इनकी पूजा से धन की प्राप्ति होती है, साथ ही वैभव भी मिलता है। अगर लक्ष्मी रुष्ट हो जाएं, तो घोर दरिद्रता का सामना करना पड़ता है. इनकी पूजा से केवल धन ही नहीं, बल्कि नाम, यश भी मिलता है. इनकी उपासना से दाम्पत्य जीवन भी बेहतर होता है. मां लक्ष्मी की पूजा के कुछ नियम है. अगर इन नियमों का पालन न किया जाए, तो मां नाराज भी हो जाती हैं। *लक्ष्मी की पूजा के नियम और सावधानियां...* --- मां लक्ष्मी की पूजा सफेद या गुलाबी वस्त्र पहनकर करनी चाहिए। -- इनकी पूजा का उत्तम समय होता है- मध्य रात्रि। -- मां लक्ष्मी के उस प्रतिकृति की पूजा करनी चाहिए, जिसमें वह गुलाबी कमल के पुष्प पर बैठी हों। -- साथ ही उनके हाथों से धन बरस रहा हो। -- मां ...

महालक्ष्मयै महत्व

 ।। श्रीमहालक्ष्मयै नमो नमः ।। श्री महालक्ष्मी माँ की उपासना से धन, संपन्नता, प्रतिष्ठता मिलती है ।  श्री महालक्ष्मी माँ की उपासना अकेले करने से पैसे मिलते हैं, गणेश जी के साथ करने से पैसे और बुद्धि मिलती है और भगवान विष्णु जी के साथ माँ लक्ष्मी की उपासना करने से संपूर्ण संपन्नता मिलती है । श्री हरि, नारायण विष्णु ही माँ लक्ष्मी को संपूर्ण करतें है इसलिए गणेश, विष्णु के साथ माँ लक्ष्मी की उपासना करने से हर तरह की संपन्नता मिलती है ।  धन और ऐश्वर्य, संपत्ति की अधिष्ठात्री देवी माँ लक्ष्मी है, समुद्र मंथन के दौरान उनका प्रागट्य या जन्म हुआ था । इन्होंने भगवान विष्णु से विवाह किया था । इनकी पूजा से पैसे की प्राप्ति होती है साथ ही वैभव भी मिलता है । अगर लक्ष्मी जी रुष्ट हो जाए तो घोर दरिद्रता का सामना करना पड़ता है ।  ज्योतिष में शुक्र ग्रह से इनका संबंध जोड़ा जाता है । इनकी पूजा से केवल पैसे ही नहीं बल्कि नाम- यश भी मिलता है ।  कितनी भी धन संबंधी परेशानी हो, अगर विधिवत लक्ष्मी जी की पूजा की जाएँ तो पैसा मिलता ही है ।  माँ लक्ष्मी की पूजा सफेद या गुलाबी कपड़े प...

सोलह श्रृंगार का रहस्य

 *नारी गहने क्यों पहनती है ?????* भगवान राम ने धनुष तोड दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों ?’’ ‘‘बेटी विवाह के समय वधू का *16 श्रृंगार* करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था। ‘‘अर्थात?’’ सीताजी ने पुनः पूछा, ‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?’’ ‘‘बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।’’ ‘‘और मेहंदी का अर्थ?’’ मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’ ‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’ ‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।’’ ‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?’’ ‘‘बेंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशमान रहना होगा।’’ ‘‘यह नथ क्यों?’’ ‘‘नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।’...

सफल जीवन के सूत्र

 *सफल जीवन के लिए उपयोगी बातें* *संसार के साथ या स्त्री पुत्र मित्र आदि के साथ जो संबंध है,, वह माना हुआ संबंध है,, जो नाशवान है,, अर्थात शरीर के रहते ही यह संबंध रहते हैं,, और मरने पर मिट जाते हैं,,,*  *लेकिन परमात्मा से संबंध जन्म लेने के पहले और मरने के बाद भी रहता है,, जीव का परमात्मा से सनातन संबंध है,,* *विचार कीजिए--- मरने के बाद धन यही रह जाएगा,, उसे कमाने के लिए जो पाप किए हैं वे साथ जाएंगे,, और उनसे परलोक में दुर्गति होगी,,,,* *मरने के बाद धन तिजोरी में रह जाता है,, पशु जहां-तहां बंधे रह जाते हैं,, स्त्री घर के दरवाजे पर ही साथ छोड़ देती है,, लोग श्मशान तक ही जाते हैं ,,और शरीर भी चिता तक ही साथ रहता है,, उसके बाद परलोक के मार्ग में केवल धर्म ही जीव के साथ रह जाता है,,,* *विचार कीजिए---- जिन वस्तुओं को हम अपना मानते हैं,, वह सदा साथ नहीं रहेंगी,, पर उनका संबंध है वह बंधन रह जाएगा,, जो जन्म जन्मांतर तक साथ रहेगा,,,* *इसलिए साधक को चाहिए कि वह शरीर को या तो संसार अर्पण कर दे जो कर्म योग है__* *चाहे अपने को शरीर एवं संसार से सर्वथा अलग कर ले जो ज्ञान योग है__* *और चाहे ...

शमी वृक्ष का महत्व

 *शमी (खेजड़ी) वृक्ष का महत्त्व एवं पूजन विधि* 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ स्नानोपरांत साफ कपड़े धारण करें।  फिर प्रदोषकाल में शमी के पेड़ के पास जाकर सच्चे मन से प्रमाण कर उसकी जड़ को गंगा जल, नर्मदा का जल या शुद्ध जल चढ़ाएं। उसके बाद तेल या घी का दीपक जलाकर उसके नीचे अपने शस्त्र रख दें।  फिर पेड़ के साथ शस्त्रों को धूप, दीप, मिठाई चढ़ाकर आरती कर पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। साथ ही हाथ जोड़ कर सच्चे मन से यह प्रार्थना करें।  'शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी। अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी।। करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया। तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता।।' इसका अर्थ है👉  हे शमी वृक्ष आप पापों को नाश और दुश्मनों को हराने वाले है। आपने ही शक्तिशाली अर्जुन का धनुश धारण किया था। साथ ही आप प्रभु श्रीराम के अतिप्रिय है। ऐसे में आज हम भी आपकी पूजा कर रहे हैं। हम पर कृपा कर हमें सच्च व जीत के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दें। साथ ही हमारी जीत के रास्ते पर आने वाली सभी बांधाओं को दूर कर हमें जीत दिलाए।  यह प्रार्थना करने के बाद अगर आ...

पंचम सोपान की महिमा

 सुन्दरकाण्ड का पाठ कैसे अधिक लाभप्रद हो ? 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ हनुमान जी और उनके सुन्दरकाण्ड ,हनुमान चालीसा ,बाहुक ,अष्टक आदि का पाठ बहुधा हिन्दू घरों में होता है या अक्सर सूना जाता है। हनुमान जी कलयुग में सर्वाधिक जाग्रत देवता माने जाते हैं और यह अमर और चिरंजीवी हैं । इनकी आराधना यदि नियमानुसार और श्रद्धा भक्ति से की जाय तो निश्चित लाभ होता ही होता है। कुछ सावधानियां और विशेष जानकारियाँ हम अपने श्रोताओं /पाठकों को इस सम्बन्ध में देने जा रहे हैं कि कैसे हनुमान जी की आराधना और सुन्दरकाण्ड का पाठ आपके लिए अधिकतम लाभप्रद हो सकता है। ऐसा क्या क्या करना चाहिए की सुन्दरकाण्ड से आपके सभी समस्याओं का निराकरण हो जाय और आपको खुशहाली प्राप्त हो ,आपका पाठ असफल न हो। हनुमान आराधना में सुन्दर काण्ड के पाठ को सदैव से विशेष स्थान दिया जाता है क्योकि इस खंड में हनुमान की अतुलनीय बुद्धि, बल, विवेक दिखाई देती है। रामचरित मानस भगवान् राम के जीवन पर आधारित है और इसमें सुन्दर काण्ड खंड भगवान हनुमान से विशेष रूप से जुडा है। सुन्दरकाण्ड के पाठ से हनुमान आराधना का विशेष और अद्वितीय लाभ होता ...

मुक्ति मार्ग

 *मुक्ति के लिए कलियुग ही सर्वश्रेष्ठ।* . एक बार बड़े-बड़े ऋषि-मुनि एक जगह जुटे तो इस बात पर विचार होने लगा कि कौन सा युग सबसे बढिया है. बहुतों ने कहा सतयुग, कुछ त्रेता को तो कुछ द्वापर को श्रेष्ठ बताते रहे। . जब एक राय न हुई यह तय हुआ कि जिस काल में कम प्रयास में ज्यादा पुण्य कमाया जा सके, साधारण मनुष्य भी सुविधा अनुसार धर्म-कर्म करके पुण्य कमा सके उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा। . विद्वान आसानी से कभी एकमत हो ही नहीं सकते. कोई हल निकलने की बजाए विवाद और भड़क गया. सबने कहा झगड़ते रहने से क्या फायदा, व्यास जी सबके बड़े हैं उन्हीं से पूछ लेते हैं। वह जो कहें, उसे मानेंगे। . सभी व्यास जी के पास चल दिए. व्यास जी उस समय गंगा में स्नान कर रहे थे. सब महर्षि के गंगा से बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगे. व्यास जी ने भी सभी ऋषि-मुनियों को तट पर जुटते देखा तो एक गहरी डुबकी ली। . जब बाहर निकले तो उन्होंने एक मंत्र बोला. वह मंत्र स्नान के समय उच्चारण किए जाने वाले मंत्रों से बिल्कुल अलग था. ऋषियों ने व्यास जी को जपते सुना- कलियुग ही सर्वश्रेष्ठ है कलियुग ही श्रेष्ठ। . इससे पहले कि ऋषिगण कुछ समझते व्यास जी ...

भक्ति मार्ग

 _*ईश्वर प्राप्ति के 12 कदम*_   *भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....*   _*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।*_   _*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 8*_   *_भावार्थ :-_ हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।*   *तुलसी दास जी कहते हैं....*   _*"बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।"*_   *1. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस   व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।*   *2. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।*   *3. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।*   *4. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।*   *5. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जा...

व्रत महत्त्व एवं निर्देश

 व्रत - उपवास  आचरण ( 6 ) व्रत उपवास                   * जैसा आहार ऐसे विचार *           सद्विचार की साधना में अत्यंत जरूरी एक साधन है व्रत उपवास । शरीर के 114 चक्रोमे प्रधान सात चक्र ओर इनमे मणिपुर चक्र का स्थान नाभि है । जब हम आठ प्रहर तक निराहार रहते है तब नाभिचक्रमे ऊर्जा पैदा होती है । ये ऊर्जा 114 या प्रधान सातो चक्र तक व्याप्त होती है जो शरीरस्थ दिव्य शक्तिओ को जागृत करती है । जिस इष्टदेव देवी की प्रसन्नता केलिए व्रत किया जा रहा है उनके नाम स्मरण ओर मंत्र जापसे वो दैवीशक्ति की हमारे शरीरमे जागृति होने लगती है । मंत्रजाप नाम स्मरण या ध्यान अवस्थामे ब्रह्मांड की दिव्य शक्तिओ का अनायास संपर्क होने लगता है । सत्व तत्त्वका व्याप्त होने से चित मनमे सद्विचार का व्याप्त होता है । तामसी तत्व का नाश होता है और दिव्यता प्राप्त होती है । इस तरह उपवास व्रत मात्र अरोग्यहीत केलिए नही पर मन मस्तिष्क से नकारात्मकता , दुर्बुद्धि का नाश करने और सत तत्व का जागरण करने का साधन है ।      व्रत, धर्म का साधन मा...

सुंदर प्रसंग

 *रामकथा से* *ठाकुर जी सहायता करने आए*............. . श्री जयदेव गोस्वामी परम वैष्णव संत थे। उनके साथ भगवान लीलाये करते रहते थे , उसमें से  एक लीला इस प्रकार है... . *जिस झोपड़ी में गोस्वामी जी रहते थे, उस झोपडी  से बारिश में पानी टपकता था ,एक बार उनकी धर्मपत्नी पद्मावती ने अपने पति से झोपडी को ठीक करने की प्रार्थना की*। . जयदेव गोस्वामी जी कुछ घास -फूस एकत्रित करके उसको ठीक करने लगे, वो सीढ़ी से नीचे उतर कर के थोड़ा सा घास ऊपर ले कर जाते, फिर सीढ़ी से नीचे उतरते... . इसी प्रक्रिया को उन्होंने दो-तीन बार ही किया होगा, तभी उन्होंने देखा कि उनको नीचे से कोई घास उठा कर दे रहा है.. इस तरह से उनका जो कार्य तीन चार घंटे में खत्म होना था वह अति शीघ्र ही ख़त्म हो गया। . वापिस झोपड़ी में आने पर उन्होंने अपनी पत्नी को झोपड़ी ठीक करने में मदद करने  के लिए धन्यवाद किया। . परन्तु उनकी पत्नी ने बताया की वह तो रसोई के कार्यों में व्यस्त थी, उसने उनकी कोई सहायता नहीं की। . यह सुनकर जयदेव गोस्वामी जी आश्चर्यचकित हो गए और सोचने लगे कि फिर उनकी सहायता किसने की। . यही सोचते हुए स्नान कर...

कालभैरव भजे

 महारुद्र - कालभैरव देवता        कालभैरव वो महादेव का रौद्र अवतार है । उग्र  स्वरूप है और भूत पिचाशादी गणों के अध्यक्ष है और स्मशानादी स्थानमे उनकी तंत्र उपासना तंत्र विधान मंत्रो से की जाती है । पर ये सिर्फ योग्य गुरु के सनिध्यमे तंत्र मार्ग से दीक्षित उपासको को ही करनी होती है । इसलिए यहां काल भैरवदेवता की सौम्य उपासना दे रहे है । ये विधान भक्ति भाव पूर्वक हरकोई कर सकता है । भैरव देवता के प्रमुख अष्ट स्वरूप पूजे जाते है । कार्य और स्थान को लेकर ये अलग अलग स्वरूप है पर तत्वानुसार महारुद्र के ही स्वरूप है ।  शिवपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को दोपहर में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए इस तिथि को काल भैरवाष्टमी या भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है।   पुराणों के अनुसार अंधकासुर दैत्य ने एक बार अपनी क्षमताओं को भूलकर अहंकार में भगवान शिव के ऊपर हमला कर दिया। उसके संहार के लिए शिव के खून से भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव शिव का ही स्वरूप हैं।   इसलिए शिव की आराधना से पहले भैरव उपासना का विधान बताया...

दक्षिणा काली

 *दक्षिणकालीस्तोत्रम्* श्रीगणेशाय नम: ध्यायेत्काली महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणिम् । चतुर्भुजां ललज्जिह्वा पूर्णचन्द्रनिभानननम् ॥१॥ नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसङ्घविदारिणीम् । नरमुण्डन्तथा खड्गङ्कमलं वरदन्तथा ॥२॥ विभ्राणं रक्तवदनां दंष्ट्राली घोररूपिणीम् । अट्टाट्टहासनिरता सर्वदा च दिगम्बराम् ॥३॥ शवासनस्थितां देवीं मुण्डमालाविभूषिताम् । इति ध्यात्वा महादेवी ततस्तु हृदयं पठेत् ॥४॥ काली दक्षिणकाली च कृष्णरूपा परात्मिका । मुण्डमाली विशालाक्षी सृष्टिसंहासकारिका ॥५॥ स्थितिरूपा महामाया योगनिरद्रा भवात्मिका । भगसर्पि: पानरता भगोद्योता भगाङ्गजा ॥६॥ आद्या सदा नवा घोरा महातेजा: करालिका । प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥७॥ एतानि नाममाल्यानि ये पठन्ति दिने दिने । तेषा दासस्य दासोsहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥८॥ त्वं काली त्वञ्य तारा त्वमसि गिरिसुता सुन्दरी भैरबी त्वम्  त्वं दुर्गा छिन्नमस्ता त्वमसि च भुवना त्वं हि लक्ष्मी: शिवा त्वम् । धूमा मताङगिनि त्वं त्वससी च बगलामङ्गलादिस्तवाख्या क्षन्तव्यो मेsपराध: पकटितवदने कामरूपे कराले ॥९॥ ब्रह्माणी कमलेन्दु सौम्यवदना माहेश्वरी लीलया  कौ...

अनुकरणीय

 *गृहस्थ में सन्यस्थ धर्म का पालन जो पुरुष घरमें रहकर सकामभावसे गृहस्थके धर्मोंका पालन करता है और उनके फलस्वरूप अर्थ एवं काम का उपभोग करके फिर उन्हींका अनुष्ठान करता रहता है, वह तरह-तरहकी कामनाओं से मोहित रहनेके कारण भगवद्धर्मों से विमुख हो जाता है और यज्ञों द्वारा श्रद्धापूर्वक देवता तथा पितरोंकी ही आराधना करता रहता है  उसकी बुद्धि उसी प्रकारकी श्रद्धा से युक्त रहती है। देवता और पितर ही उसके उपास्य रहते हैं,अत: वह चन्द्रलोकमें जाकर उनके साथ सोमपान करता है और फिर पुण्य क्षीण होनेपर इसी लोकमें लौट आता है।  जिस समय प्रलयकालमें शेषशायी भगवान्‌ शेषशय्यापर शयन करते हैं, उस समय सकाम गृहस्थाश्रमियों को प्राप्त होनेवाले ये सब लोक भी लीन हो जाते हैं। जो विवेकी पुरुष अपने धर्मोंका अर्थ और भोग-विलासके लिये उपयोग नहीं करते, बल्कि भगवान्‌की प्रसन्नताके लिये ही उनका पालन करते हैं—वे अनासक्त, प्रशान्त, शुद्धचित्त, निवृत्तिधर्मपरायण, ममतारहित और अहंकारशून्य पुरुष स्वधर्मपालनरूप सत्त्वगुणके द्वारा सर्वथा शुद्धचित्त हो जाते हैं,  वे अन्तमें सूर्यमार्ग (अर्चिमार्ग या देवयान) के द्वारा ...

विघ्नहर्ता श्री गणेश

 विघ्नहर्ता, विद्यादाता व धन-सम्पति प्रदायक भगवान श्रीगणेश जी जीवन की समस्त समस्याओं का हरण करते हैं ! उनकी उपासना करने से सभी संकटों का नाश होता है !! संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सुख-समृद्धि‍ की प्राप्ति होती है - !! संकटनाशन गणेश स्तोत्र !! प्रणम्य शिरसा देवं गौरी विनायकम् ।  भक्तावासं स्मेर नित्यमाय्ः कामार्थसिद्धये ॥1॥ प्रथमं वक्रतुडं च एकदंत द्वितीयकम् ।  तृतियं कृष्णपिंगात्क्षं गजववत्रं चतुर्थकम् ॥2॥ लंबोदरं पंचम च पष्ठं विकटमेव च ।  सप्तमं विघ्नराजेंद्रं धूम्रवर्ण तथाष्टमम् ॥3॥ नवमं भाल चंद्रं च दशमं तु विनायकम् ।  एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजानन् ॥4॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसंघ्यंयः पठेन्नरः ।  न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥5॥ विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।  पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मो क्षार्थी लभते गतिम् ॥6॥ जपेद्णपतिस्तोत्रं षडिभर्मासैः फलं लभते ।  संवत्सरेण सिद्धिंच लभते नात्र संशयः ॥7॥ अष्टभ्यो ब्राह्मणे भ्यश्र्च लिखित्वा फलं लभते ।  तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥8॥ ॥ इति श्री नारद प...

जय श्री महाकाल

 श्रीमहाकालस्तोत्रम्  दृष्ट्वा देवं महाकालं कालिकाङ्गं महाप्रभुम् । भार्गवः पतितो भूमौ दण्डवत्सुरपूजिते ॥ १॥ भार्गव उवाच कल्यन्तकालाग्निसमानभासं चतुर्भुजं कालिकयोपजुष्टम् । कपलखट्वाङ्गवराभयाढ्यकरं महाकालमनन्तमीडे ॥ २॥ नमः परमरूपाय परामलसुरूपिणे । नियतिप्राप्तदेहाय तत्त्वरूपाय ते नमः ॥ ३॥ नमः परमरूपाय परमार्थैकरूपिणे । वियन्मायास्वरूपाय भैरवाय नमोऽस्तुते ॥ ४॥ ॐ नमः परमेशाय परतत्त्वार्थदर्शिणे । वियन्मायाद्यधीशाय धीविचित्राय शम्भवे ॥ ५॥ त्रिलोकेशाय गूढाय सूक्ष्मायाव्यक्तरूपिणे । पराकाष्ठादिरूपाय पराय शम्भवे नमः ॥ ६॥ ॐ नमः कालिकाङ्काय कालाञ्जननिभाय ते । जगत्संहारकर्त्रे च महाकालाय ते नमः ॥ ७॥ नम उग्राय देवाय भीमाय भयदायिने । महाभयविनाशाय सृष्टिसंहारकारिणे ॥ ८॥ नमः परापरानन्दस्वरूपाय महात्मने । परप्रकाशरूपाय प्रकाशानां प्रकाशिने ॥ ९॥ ॐ नमो ध्यानगम्याय योगिहृत्पद्मवासिने । वेदतन्त्रार्थगम्याय वेदतन्त्रार्थदर्शिने ॥ १०॥ वेदागमपरामर्शपरमानन्ददायिने । तन्त्रवेदान्तवेद्याय शम्भवे विभवे नमः ॥ ११॥ धियां प्रचोदकं यत्तु परमं ज्योतिरुत्तमम् । तत्प्रेरकाय देवाय परमज्योतिषे नमः ॥ १२॥ गुणाश्रय...

तुलादान का महत्व

 क्यों किया जाता है तुलादान, क्या हैं इसके लाभ तुलादान लीला भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में तुलादान लीला भी शामिल है। माना जाता है कि इस तुलादान लीला में भगवान कृष्ण ने तुलसी के महत्व के बारे में बताया है। इस तुलादान लीला से प्रेरित होकर भगवान द्वारकाधीश के साथ ही एक और मंदिर का निर्माण किया था जिसे तुलादान मंदिर के नाम से जाना गया। . क्यों पड़ा तुलादान नाम . इस मंदिर का नाम काफी अलग है। आप भी सोच रहे होंगें कि आखिर इस मंदिर को ऐसा नाम क्‍यों दिया गया। दरअसल, किवदंती है कि इसी स्‍थान पर सत्यभामाजी ने श्रीकृष्ण का तुलादान किया था। इस मंदिर में भगवान कृष्ण की मूर्ति के ठीक सामने एक विशाल तराजू रखा है जिस पर आज भी तुलादान किया जाता है। . श्रीकृष्ण ने क्‍यों किया था तुलादान . इस मंदिर में श्रृद्धालुु अपने वजन के बराबर अन्न, घी, चीनी और तेल का दान करते हैं। किवदंती है कि भगवान कृष्ण को पूरी तरह से अपना बनाने का और उन पर एकाधिकार पाने की लालसा में उनकी पटरानी सत्यभामा ने नारद मुनि को श्रीकृष्ण का दान कर दिया और जब नारद जी कृष्ण जी को अपने साथ लेकर जाने लगे तब जाकर सत्यभामा को अपनी गलती का ...

श्री मद्भागवत का महत्व

 * अनजाने में किये हुये पाप का प्रायश्चित कैसे होता है...? 👏🏻* बहुत सुन्दर प्रश्न है ,यदि हमसे अनजाने में कोई पाप हो जाए तो क्या उस पाप से मुक्ती का कोई उपाय है। श्रीमद्भागवत जी के षष्ठम स्कन्ध में , महाराज राजा परीक्षित जी ने ,श्री शुकदेव जी से ऐसा प्रश्न कर लिए । बोले भगवन - आपने पञ्चम स्कन्ध में जो नरको का वर्णन किया ,उसको सुनकर तो गुरुवर रोंगटे खड़े जाते हैं। प्रभूवर मैं आपसे ये पूछ रहा हूँ की यदि कुछ पाप हमसे अनजाने में हो जाते हैं ,जैसे चींटी मर गयी,हम लोग स्वास लेते हैं तो कितने जीव श्वासों के माध्यम से मर जाते हैं। भोजन बनाते समय लकड़ी जलाते हैं ,उस लकड़ी में भी कितने जीव मर जाते हैं । और ऐसे कई पाप हैं जो अनजाने हो जाते हैं तो उस पाप से मुक्ती का क्या उपाय है भगवन । आचार्य शुकदेव जी ने कहा -राजन ऐसे पाप से मुक्ती के लिए रोज प्रतिदिन पाँच प्रकार के यज्ञ करने चाहिए । महाराज परीक्षित जी ने कहा, भगवन एक यज्ञ यदि कभी करना पड़ता है तो सोंचना पड़ता है ।आप पाँच यज्ञ रोज कह रहे हैं । यहां पर आचार्य शुकदेव जी हम सभी मानव के कल्याणार्थ कितनी सुन्दर बात बता रहे हैं । बोले राजन पहली ...