Skip to main content

Posts

Showing posts from May, 2022

शनिदेव जन्मोत्सव 30 मई विशेष

 शनिदेव जन्मोत्सव 30 मई विशेष 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शनि जिन्हें कर्मफलदाता माना जाता है। दंडाधिकारी कहा जाता है, न्यायप्रिय माना जाता है। जो अपनी दृष्टि से राजा को भी रंक बना सकते हैं। हिंदू धर्म में शनि देवता भी हैं और नवग्रहों में प्रमुख ग्रह भी जिन्हें ज्योतिषशास्त्र में बहुत अधिक महत्व मिला है। शनिदेव को सूर्य का पुत्र माना जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ माह की अमावस्या को ही सूर्यदेव एवं छाया (संवर्णा) की संतान के रूप में शनि का जन्म हुआ। शनि पूजा (साधना) की सामान्य विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शनिदेव की पूजा करने के लिये कुछ अलग नहीं करना होता। इनकी पूजा भी अन्य देवी-देवताओं की तरह ही होती है। शनि जयंती के दिन उपवास भी रखा जाता है।  शनिदेव का जन्म दोपहर के समय हुआ था, अतः शास्त्र अनुसार शनि देव की पूजा उपासना मध्यकाल के समय ही कि जानी चाहिये। भारत में अनेक स्थानों पर उदय तिथि के (पंचांग) अनुसार के पर्व संपन्न होता हैं।  शारीरिक शुद्धि के पश्चात लकड़ी के एक पाट पर साफ-सुथरे काले रंग के कपड़े को बिछाना चाहिये। कपड़ा नया हो तो बहुत अच्छा अन्यथा साफ अवश्य होना चाहिये। फिर...

किन्नर कैलाश

 यह हैं किन्नर कैलाश, कहते है महादेव के इस धाम में जाने की इंसान एक बार ही कर पाता है हिम्मत – तिब्बत स्थित मानसरोवर कैलाश के बाद किन्नर कैलाश को ही दूसरा बडा कैलाश पर्वत माना जाता है। सावन का महीना शुरू होते ही हिमाचल की खतरनाक कही जाने वाली किन्नर कैलाश यात्रा शुरू हो जाती है। इस यात्रा के बारे में कहा जाता है कि इस यात्रा को अपने जीवन काल में आम आदमी एक ही बार करने की हिम्मत जुटा पाता है। इस स्थान को भगवान शिव शीतकालीन प्रवास स्थल माना जाता है। किन्नर कैलाश सदियों से हिंदू व बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र है। इस यात्रा के लिए देश भर से लाखों भक्त किन्नर कैलाश के दर्शन के लिए आते हैं। किन्नर कैलाश पर प्राकृतिक रूप से उगने वाले ब्रह्म कमल के हजारों पौधे देखे जा सकते हैं। भगवान शिव की तपोस्थली किन्नौर के बौद्ध लोगों और हिंदू भक्तों की आस्था का केंद्र किन्नर कैलाश समुद्र तल से 24 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंग की ऊंचाई 40 फीट और चौड़ाई 16 फीट है। हर वर्ष सैकड़ों शिव भक्त जुलाई व अगस्त में जंगल व खतरनाक दुर्गम मार्ग से हो कर किन्नर कैलाश पहुच...

श्रीमहावीरवैभवम्

 श्री रघुवीर गद्यम् (श्री महावीर वैभवम्) श्रीमान्वेङ्कटनाथार्य कवितार्किक केसरि । वेदान्ताचार्यवर्योमे सन्निधत्तां सदाहृदि ॥ जयत्याश्रित सन्त्रास ध्वान्त विध्वंसनोदयः । प्रभावान् सीतया देव्या परमव्योम भास्करः ॥ जय जय महावीर महाधीर धौरेय, देवासुर समर समय समुदित निखिल निर्जर निर्धारित निरवधिक माहात्म्य, दशवदन दमित दैवत परिषदभ्यर्थित दाशरथि भाव, दिनकर कुल कमल दिवाकर, दिविषदधिपति रण सहचरण चतुर दशरथ चरम ऋणविमॊचन, कोसल सुता कुमार भाव कञ्चुकित कारणाकार, कौमार केलि गोपायित कौशिकाध्वर, रणाध्वर धुर्य भव्य दिव्यास्त्र बृन्द वन्दित, प्रणत जन विमत विमथन दुर्ललित दोर्ललित, तनुतर विशिख विताडन विघटित विशरारु शरारु ताटका ताटकेय, जडकिरण शकलधर जटिल नटपति मकुट तट नटनपटु विबुधसरिदतिबहुल मधुगलन ललितपद नलिनरज उपमृदित निजवृजिन जहदुपल तनुरुचिर परम मुनिवर युवति नुत, कुशिक सुत कथित विदित नव विविध कथ, मैथिल नगर सुलोचना लोचन चकोर चन्द्र, खण्डपरशु कोदण्ड प्रकाण्ड खण्डन शौण्ड भुजदण्ड, चण्डकर किरण मण्डल बोधित पुण्डरीक वन रुचि लुण्टाक लोचन, मोचित जनक हृदय शङ्कातङ्क, परिहृत निखिल नरपति वरण जनक दुहितृ कुचतट विहरण सम...

केनोपनिषत् चतुर्थ खंड

 केन उपनिषद् - चतुर्थः खण्डः सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ 1॥ तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्​शुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ 2॥ तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्​श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ 3॥ तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा(3) इतीन् न्यमीमिषदा(3) इत्यधिदैवतम् ॥ 4॥ अथाध्यात्मं-यँद्देतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः ॥ 5॥ तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं-वेँदाभि हैनग्ं सर्वाणि भूतानि सं​वाँञ्छन्ति ॥ 6॥ उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं-वाँव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ 7॥ तसै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ 8॥ यो वा एतामेवं-वेँदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ 9॥ ॥ इति केनोपनिषदि चतुर्थः खण्डः ॥ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां ...

तृतीयः केन उपनिषद्

 केन उपनिषद् - तृतीयः खण्डः ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥ 1॥ त ऐक्षन्तास्माकमेवायं-विँजयोऽस्माकमेवायं महिमेति । तद्धैषां-विँजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं-यँक्षमिति ॥ 2॥ तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं-यँक्षमिति तथेति ॥ 3॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ 4॥ तस्मिन्स्त्वयि किं-वीँर्यमित्यपीदꣳ सर्वं दहेयं-यँदिदं पृथिव्यामिति ॥ 5॥ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं-विँज्ञातुं-यँदेतद्यक्षमिति ॥ 6॥ अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ 7॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ 8॥ तस्मिन्स्त्वयि किं-वीँर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ 9॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं-विँज्ञातुं-यँदेतद्यक्षमिति ॥ 10॥ अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥ 11॥ स तस्मिन्ने...

केनोपनिषदि द्वितीय खंड

 केन उपनिषद् - द्वितीयः खण्डः यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं-वेँत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं-यँदस्य देवेष्वथ नु मीमाम्स्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ 1॥ नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ 2॥ यस्यामतं तस्य मतं मतं-यँस्य न वेद सः । अविज्ञातं-विँजानतां-विँज्ञातमविजानताम् ॥ 3॥ प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं-विँद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ 4॥ इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ 5॥ ॥ इति केनोपनिषदि द्वितीयः खण्डः ॥

केन उपनिषद्

 केन उपनिषद् - प्रथमः खण्डः ॥ अथ केनोपनिषत् ॥ ॐ स॒ह ना॑ववतु । स॒ह नौ॑ भुनक्तु । स॒ह वी॒र्यं॑ करवावहै । ते॒ज॒स्विना॒वधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषा॒वहै᳚ । ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः॒ शान्तिः॒ शान्तिः॑ ॥ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केनेषितां-वाँचमिमां-वँदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ 1॥ श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ 2॥ न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः । न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ 3॥ अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां-येँ नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ 4॥ यद्वाचाऽनभ्युदितं-येँन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं-विँद्धि नेदं-यँदिदमुपासते ॥ 5॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । त...

श्रीरामरक्षा स्तोत्र

 श्रीरामरक्षा स्तोत्र  श्रीरामरक्षा स्तोत्र सभी तरह की विपत्तियों से व्यक्ति की रक्षा करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य भय रहित हो जाता है। एक कथा है कि भगवान शंकर ने बुधकौशिक ऋषि को स्वप्न में दर्शन देकर, उन्हें रामरक्षास्तोत्र सुनाया और प्रातःकाल उठने पर उन्होंने वह लिख लिया। यह स्तोत्र संस्कृत भाषा में है। इस स्तोत्र के नित्य पाठ से घर के कष्ट  व भूतबाधा भी दूर होती है। जो इस स्तोत्र का पाठ करता है वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होता है। रामरक्षा स्तोत्र का नियमित एक  पाठ करने से शरीर रक्षा होती है। मंगल का कुप्रभाव समाप्त होता है। रामरक्षा स्तोत्र के प्रभाव से व्यक्ति के चारों और एक सुरक्षा कवच बन जाता है जिससे हर प्रकार की विपत्ति से रक्षा होती है। यदि गर्भवती स्त्री रोजाना इस स्तोत्र का पाठ करे तो इसके शुभ प्रभाव से गर्भ रक्षा होती है।  स्वस्थ, सौभाग्यशाली एवं आज्ञाकारी संतान प्राप्त होती है। रामरक्षा स्तोत्र पाठ से भगवान राम के साथ पवनपुत्र हनुमान भी प्रसन्न होते हैं। सर्पप्रथम हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र बोलें- विनियोग अस्य श...

सोमवती अमावस्या 2022 विशेषांक

 *सोमवती अमावस्या 2022 विशेषांक* . सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस बार 30 मई 2022 सोमवार को ज्येष्ठ की अमावस्या है। इसी दिन शनिदेवजी का जन्म हुआ था और इस बार इसी दिन वट सावित्री का व्रत भी रखा जाएगा। इसी दिन सर्वार्थसिद्धि और सुकर्मा योग भी बन रहा है। पूरे 30 साल बात ऐसा योग बन रहा है। ऐसे में पितृदोष से मुक्ति के लिए कर लें मात्र 3 उपाय।   1. पितृ तर्पण और पिंडदान : सोमवती अमावस्या के दिन की पितरों को जल देने से उन्हें तृप्ति मिलती है। महाभारत काल से ही पितृ विसर्जन की अमावस्या, विशेषकर सोमवती अमावस्या पर तीर्थस्थलों पर पिंडदान करने का विशेष महत्व है।   2. दान : इस दिन शनि और चंद्र का दान करें। इससे भी पितृदोष से लाभ मिलेगा। चंद्र का दान करने से जहां चंद्रदोष दूर होंगे वहीं शनि का दान करसे शनि दोष भी दूर होंगे।    3. नदी स्नान : इस दिन गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें और हनुमान, शनिदेव, विष्णु, चंद्रदेव और शिवजी की पूजा के साथ ही माता पार्वती की पूजा भी करें। नदी स्नान नहीं कर पा रहे हैं तो घर के जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर...

भक्ति कैसे करें

 *भक्ति कैसे करें? अथवा भक्ति करना क्या है?*     इसी भक्तिकी परिभाषा देते हुए भगवान् श्रीरामजी ने स्वयं ही कहा - *गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा।।* कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।। सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।। मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।। बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।। बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।। अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।। प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।। *भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।*     जब कोई भक्त उपर्युक्त गुणोंसे युक्त होता है; तब वही भक्त ही साधु-संत कहलाता है -  तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।। जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा।। सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।। समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।। अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।। तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।। दो०...

संत महिमा।।👣

 👣।।संत महिमा।।👣 एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे। एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था। एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ, आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.? संत बोले - श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे। किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ? मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको। संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया.... कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है। किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा। फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया... 3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है, बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए। किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा, जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला, अच्छा बच्चु .. 3 दिन भूखा प्यासा...

एकादशी-व्रत की महिमा

 रामावतार की यज्ञ-सीताओं और गोपियों का क्या है सम्बन्ध ? गोपियों का एक यूथ ‘रामावतार में यज्ञ में स्थापित सीताजी की प्रतिमाओं’ का था । कैसे यज्ञ-सीताएं गोपी रूप में अवतरित हुईं—वहीं प्रसंग इस प्रस्तुति में दिया जा रहा है। श्रीमद्भागवत में ‘गोपी’ शब्द का अर्थ परमात्मा को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा बताया गया है । कल्पों तक कठोर तपस्या करके जो पूर्ण त्याग और अपने मधुर प्रेम के द्वारा प्रियतम श्रीकृष्ण को सुख पहुंचाने के लिए वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे, वे श्रुतियां, ब्रह्मविद्या, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, देवकन्याएं गोपी बनकर व्रज में आए । इसके अतिरिक्त रामावतार में श्रीराम को देखकर मुग्ध होने वाले दण्डकवन के ऋषि-मुनि, जनकपुर की निवासिनी स्त्रियां, कोसलपुर की स्त्रियां, अयोध्या की स्त्रियां, भीलकन्याएं आदि जो भगवान का आलिंगन करना चाहते थे–उन्हें भगवान के वरदान स्वरूप व्रज में गोपीरूप में अवतीर्ण होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इस प्रकार गोपियों के अनेक यूथ थे ।  भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्माजी से कहते हैं—‘जिनको मैं पूर्व के युगों में वर दे चुका हूँ, वे सब मेरे पुण्यमय व्रज में गोपीरूप म...

हनुमानजी के गुरु

 हनुमानजी के गुरु कौन थे ? त्रिभुवन के गुरु भगवान शिव अंजनादेवी के अंक में हनुमान रूप से अवतरित हुए तो उनका शिक्षा-गुरु भगवान सूर्य को ही बनना था । हनुमानजी विद्या पढ़ने के लिए भगवान सूर्य के पास गये और उनसे ही उन्हें सारी विद्याएं प्राप्त हुईं । सूर्यदेव क्यों बने हनुमानजी के गुरु ? कहा जाता है कि हनुमानजी को जन्म ग्रहण करने के कुछ ही समय बाद इतनी भूख लगी कि वे माता के पय:पान से तृप्त नहीं हो सके । इससे चिन्तित होकर मां अंजना उनके लिए जंगल में फल लेने गयीं, तब तक सूर्योदय होने लगा । आकाश में उगते सूर्य को देखकर हनुमान उसे लाल फल समझकर निगलने के लिए बढ़े ।  उस समय सूर्यग्रहण था और राहु सूर्य को ग्रस्त करने के लिए आया था । हनुमानजी का विशाल आकार और उनको सूर्य को निगलते देखकर राहु ने डरकर देवराज इन्द्र से निवेदन किया कि एक दूसरा महाराहु मेरा अधिकार छीन कर मुझे भी ग्रस्त करना चाहता है, अत: आप मेरी रक्षा करें ।  इन्द्र को ऐरावत पर चढ़कर आते देख पवन-कुमार ने उसे बड़ा-सा सफेद फल समझा और उसी को पकड़ने के लिए दौड़ चले । यह देखकर इन्द्र ने अपने वज्र से हनुमानजी के मुख पर जोरों से ...

रामावतार

 रामावतार की यज्ञ-सीताओं और गोपियों का क्या है सम्बन्ध ? गोपियों का एक यूथ ‘रामावतार में यज्ञ में स्थापित सीताजी की प्रतिमाओं’ का था । कैसे यज्ञ-सीताएं गोपी रूप में अवतरित हुईं—वहीं प्रसंग इस प्रस्तुति में दिया जा रहा है। श्रीमद्भागवत में ‘गोपी’ शब्द का अर्थ परमात्मा को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा बताया गया है । कल्पों तक कठोर तपस्या करके जो पूर्ण त्याग और अपने मधुर प्रेम के द्वारा प्रियतम श्रीकृष्ण को सुख पहुंचाने के लिए वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे, वे श्रुतियां, ब्रह्मविद्या, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, देवकन्याएं गोपी बनकर व्रज में आए । इसके अतिरिक्त रामावतार में श्रीराम को देखकर मुग्ध होने वाले दण्डकवन के ऋषि-मुनि, जनकपुर की निवासिनी स्त्रियां, कोसलपुर की स्त्रियां, अयोध्या की स्त्रियां, भीलकन्याएं आदि जो भगवान का आलिंगन करना चाहते थे–उन्हें भगवान के वरदान स्वरूप व्रज में गोपीरूप में अवतीर्ण होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इस प्रकार गोपियों के अनेक यूथ थे ।  भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्माजी से कहते हैं—‘जिनको मैं पूर्व के युगों में वर दे चुका हूँ, वे सब मेरे पुण्यमय व्रज में गोपीरूप म...

नामी से बड़ा नाम

नामी से नाम  बड़ा.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,लंका विजय के पश्चात जब राम अयोध्या लौटे और राजतिलक हो गया तो एक दिन राजदरबार में महर्षि वशिष्ट, विश्वामित्र, नारद तथा अन्य की ऋषि धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए पधारे। जब उसी प्रकार के विषयों पर चर्चा चल रही थी तो देवर्षि नारद ने एक प्रश्न उठाया कि नाम और नामी में कौन श्रेष्ठ है ? ऐसे प्रश्न को सुनकर ऋषियों ने कहा - नारद जी! नामी से तुम्हारा क्या तात्पर्य है, स्पष्ट करो। नारद जी ने कहा - ऋषियों नाम तथा नामी से तात्पर्य है कि भगवान नाम का जप-भजन श्रेष्ठ है या स्वयं भगवान श्रेष्ठ हैं ? नारद जी की बात सुनकर ऋषियों ने हंसकर कहा - अरे नारद! तुमने यह कैसे बच्चों जैसा प्रश्न किया है। निश्चय ही भगवान श्रेष्ठ हैं क्योंकि उन्हीं के नाम का तो जप किया जाता है। नारद ने कहा - नहीं आपकी यह धारणा ठीक नहीं है। मेरे विचार से भगवान से बढ़कर उनका नाम है। भक्त को भगवान के नाम के जप ...

रोचक प्रसंग रामायण

 नामी से नाम  बड़ा.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,लंका विजय के पश्चात जब राम अयोध्या लौटे और राजतिलक हो गया तो एक दिन राजदरबार में महर्षि वशिष्ट, विश्वामित्र, नारद तथा अन्य की ऋषि धार्मिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिए पधारे। जब उसी प्रकार के विषयों पर चर्चा चल रही थी तो देवर्षि नारद ने एक प्रश्न उठाया कि नाम और नामी में कौन श्रेष्ठ है ? ऐसे प्रश्न को सुनकर ऋषियों ने कहा - नारद जी! नामी से तुम्हारा क्या तात्पर्य है, स्पष्ट करो। नारद जी ने कहा - ऋषियों नाम तथा नामी से तात्पर्य है कि भगवान नाम का जप-भजन श्रेष्ठ है या स्वयं भगवान श्रेष्ठ हैं ? नारद जी की बात सुनकर ऋषियों ने हंसकर कहा - अरे नारद! तुमने यह कैसे बच्चों जैसा प्रश्न किया है। निश्चय ही भगवान श्रेष्ठ हैं क्योंकि उन्हीं के नाम का तो जप किया जाता है। नारद ने कहा - नहीं आपकी यह धारणा ठीक नहीं है। मेरे विचार से भगवान से बढ़कर उनका नाम है। भक्त को भगवान के नाम ...

विष्णु अष्टोत्तर शतनास्तोत्रम्

 श्री विष्णु शत नाम स्तोत्रम् (विष्णु पुराण) ॥ श्री विष्णु अष्टोत्तर शतनामस्तोत्रम् ॥ वासुदेवं हृषीकेशं वामनं जलशायिनम् । जनार्दनं हरिं कृष्णं श्रीवक्षं गरुडध्वजम् ॥ 1 ॥ वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं नरकान्तकम् । अव्यक्तं शाश्वतं विष्णुमनन्तमजमव्ययम् ॥ 2 ॥ नारायणं गदाध्यक्षं गोविन्दं कीर्तिभाजनम् । गोवर्धनोद्धरं देवं भूधरं भुवनेश्वरम् ॥ 3 ॥ वेत्तारं यज्ञपुरुषं यज्ञेशं यज्ञवाहनम् । चक्रपाणिं गदापाणिं शङ्खपाणिं नरोत्तमम् ॥ 4 ॥ वैकुण्ठं दुष्टदमनं भूगर्भं पीतवाससम् । त्रिविक्रमं त्रिकालज्ञं त्रिमूर्तिं नन्दकेश्वरम् ॥ 5 ॥ रामं रामं हयग्रीवं भीमं रऽउद्रं भवोद्भवम् । श्रीपतिं श्रीधरं श्रीशं मङ्गलं मङ्गलायुधम् ॥ 6 ॥ दामोदरं दमोपेतं केशवं केशिसूदनम् । वरेण्यं वरदं विष्णुमानन्दं वासुदेवजम् ॥ 7 ॥ हिरण्यरेतसं दीप्तं पुराणं पुरुषोत्तमम् । सकलं निष्कलं शुद्धं निर्गुणं गुणशाश्वतम् ॥ 8 ॥ हिरण्यतनुसङ्काशं सूर्यायुतसमप्रभम् । मेघश्यामं चतुर्बाहुं कुशलं कमलेक्षणम् ॥ 9 ॥ ज्योतीरूपमरूपं च स्वरूपं रूपसंस्थितम् । सर्वज्ञं सर्वरूपस्थं सर्वेशं सर्वतोमुखम् ॥ 10 ॥ ज्ञानं कूटस्थमचलं ज्ञ्हानदं परमं प्रभुम् । यो...

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रं

 श्री विष्णु सहस्र नाम स्तोत्रम् ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 1 ॥ यस्यद्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ 2 ॥ पूर्व पीठिका व्यासं वसिष्ठ नप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् । पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ 3 ॥ व्यासाय विष्णु रूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 4 ॥ अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने । सदैक रूप रूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥ 5 ॥ यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् । विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥ 6 ॥ ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे । श्री वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा धर्मा नशेषेण पावनानि च सर्वशः । युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्य भाषत ॥ 7 ॥ युधिष्ठिर उवाच किमेकं दैवतं लोके किं वाऽप्येकं परायणं स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥ 8 ॥ को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः । किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसार बन्धनात् ॥ 9 ॥ श्री भीष्म उवाच जगत्प्रभुं देवदेव मनन्तं पुरुषोत्तमम् । स्तुवन्नाम सहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥ 10 ॥ तमेव ...