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Showing posts from May, 2021

नाम महिमा

 "ब्रह्म राम तें नाम बड़" बर दायक‌ बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।। गोस्वामी जी स्पष्ट रूप से, बिना किसी संकोच के कहते हैं कि "ब्रह्म राम तें नाम बड़" अर्थात परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म से उनका नाम बड़ा है ही सगुण साकार रूप राम जी से भी बड़ा है। उदाहरण के लिए मनु सतरुपा जी ने "द्वादस अक्षर मंत्र बर जपहिं सहित अनुराग" नाम जाप कर निर्गुण निराकार ब्रह्म को  चर्म चक्षुओं से दर्शन करने में सफल भी हुए और उन्हें पुत्र रुप में अवतरित होने को तैयार भी कर लिए । उनके द्वारा नाम के अवलंबन लेने पर उन्हें उसी प्रकार से उपस्थित होना पड़ा मानो जैसे कचहरी के मामूली चपरासी के पुकारने पर करोड़पति अभियुक्त भी , जो सैकड़ों लोगों के बीच में था,  तत्काल उपस्थित हो जाता है।  परम स्वतंत्र , जिनके सिर पर कोई नहीं है (परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। देखउं नयन परम प्रभु सोई)। वे नाम के अवलंबन लेने वाले के सन्मुख आ गए अतः नाम में शक्ति है ही।  शबरी माता ने कभी  सगुण साकार श्रीराम जी को देखी नहीं थीं लेकिन सद्गुरु के वचनों पर विश्वास करते हुए श्रीराम नाम के अवलंबन ली तो...

सनातन संस्कृति

 *भोजन करने के 55जरुरी नियम   संकलित--श्रीरमेशानन्द गुरूजी 🌹🙏जय श्री महाकाल ★ हमारे पुराने ग्रंथों में पहले से ही भोजन के बारे में तथ्य दिया जा रहा है कि भोजन आधा पेट करना चाहिए, चौथाई पेट पानी पीना चाहिए और पेट की बाकी बची हुई जगह हवा के लिए रखनी चाहिए। लेकिन बहुत ही कम संख्या में लोग इस बात पर गौर करते हैं। ★ बहुत से लोगों का मानना ​​है कि कम भोजन करने से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है जिससे शरीर कमजोर हो जाता है। यह बात बिल्कुल गलत है। शरीर के लिए वही भोजन उपयोगी होता है जो शरीर में अच्छी तरह से पच जाए। ★ यह बात आपको हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि आप जितना अधिक भोजन करेंगे उतने ही अधिक रोग शरीर को घेरेंगे। आप अपने ऊपर इसका प्रयोग करके देख सकते हैं। 3-4 दिनों तक कम मात्रा में भोजन करने से आपको भूखे पेट होने का अहसास होगा। लेकिन एक सप्ताह बाद पेट उसी के अनुकूल हो जाएगा। इसके बाद ध्यान से अपने शरीर और व्यवहार को देखें। आप देखते हैं कि आपके शरीर में चेतना अधिक होती है। फिर अपने कम खाने के महत्व को समझनेकर आप अपने जीवन में इसका उपयोग करते रहेंगे। ★ जिन लोगों की उम्र संसार ...

बैद्यनाथ महादेव

 *बैद्यनाथ महादेव की कथा* 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर स्थिर होकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। उस राक्षस ने अपना एक-एक सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ा दिये। इस प्रकिया में उसने अपने नौ सिर चढ़ा दिया तथा दसवें सिर को काटने के लिए जब वह उद्यत (तैयार) हुआ, तब तक भगवान शंकर प्रसन्न हो उठे। प्रकट होकर भगवान शिव ने रावण के दसों सिरों को पहले की ही भाँति कर दिया। उन्होंने रावण से वर माँगने के लिए कहा। रावण ने भगवान शिव से कहा कि मुझे इस शिवलिंग को ले जाकर लंका में स्थापित करने की अनुमति प्रदान करें। शंकरजी ने रावण को इस प्रतिबन्ध के साथ अनुमति प्रदान कर दी कि यदि इस लिंग को ले जाते समय रास्ते में धरती पर रखोगे, तो यह वहीं स्थापित (अचल) हो जाएगा। जब रावण शिवलिंग को लेकर चला, तो मार्ग में ‘चिताभूमि’ में ही उसे लघुशंका (पेशाब) करने की प्रवृत्ति हुई। उसने उस लिंग को एक अहीर को पकड़ा दिया और लघुशंका से निवृत्त होने चला गया। इधर शिवलिंग भारी होने के कारण उस अहीर ने उसे भूमि पर रख दिया। वह लिंग वहीं अचल हो गया। वापस आकर रावण ने काफ़ी ज़ोर लगाकर उस शिवलिंग को उखाड़ना चाहा, किन...

सोलह कला

 भगवान् श्रीकृष्ण की सोलह कलाएं ---- १. अमृतदा ---   जीवात्मा तथा परमात्मा का साक्षात्कार कराकर , ज्ञान रूपी अमृत पिलाकर मुक्त करने वाली कला अमृतदा है । २. मानदा ---  मानवती स्वाभिमानिनी गोपिकाओं को मान देने वाली  ;   भगवान् की रास-क्रीड़ा में दो प्रकार की गोपिकाएं थी , उनमें से एक निराभिमानिनी तथा दूसरी मानिनी थी । उनमें राधा सहित आठ सखियां मानिनी थी , बात-बात में रूठ जाती थी , तब भगवान् उन्हें अनुनय-विनय द्वारा मनाया करते थे ---- यह भगवान् की कला इसी कारण मानदा कही गई है । ३ . पूषा ---     अनन्त-कोटि ब्रह्माण्ड का भरण-पोषण करने वाली । ४ . पुष्टि ---     गीता के पन्द्रहवें अध्याय में भगवान् ने कहा है --- "पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमोभूत्वा रसात्मक:।"  मैं रस-स्वरूप चन्द्रमा होकर सभी औषधियों को पुष्ट करता हूँ  अर्थात्  औषधि शब्द का प्रयोग यहां पर सभी स्थावर-जंगम प्राणियों को पुष्ट करने के अर्थ में है , ऐसी भगवान् की कला पुष्टि नाम की है । ५ . तुष्टि ---    प्रारब्धानुसार जो प्राप्त हो जाये , उसी में ...

मानस प्रसंग

 जय श्री राम क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। विष्णु जी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं।  . क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा उनकी ओर बढ़ा।  . उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग जी ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा। फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया।  . कुछ समय पश्चात् जब शेष जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मी देवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया।  . इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष जी और लक्ष्मी माता के कारण उसे कभी सफलता नहीं मिली। यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया।  . इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा। अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को...

त्रिदल बिल्वपत्र

 बिल्व वृक्ष- 1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते l 2. अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है l 3. वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है l 4. चार, पांच, छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्र पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है l  5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है एवं बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। 6. सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है। 7. बेल वृक्ष को सींचने से पित्र तृप्त होते है। 8. बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 9. बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । 10. जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिव लिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी जीव सभी पापों से मुक्त हो जाते है l 11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है। कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । बिल्व पत्र के ल...

हनुमान रहस्य

 "क्यों हनुमान जी के भक्तों पर शनि देव का प्रकोप नहीं होता ?" शास्त्रों के अनुसार भगवान की सेना ने सागर सेतु बांध लिया, तब राक्षस इसे हानि न पहुंचा सकें, उसके लिए पवन सुत हनुमान को उसकी देखभाल की जिम्मेदारी सौपी गई। जब हनुमान जी शाम के समय अपने इष्टदेव राम के ध्यान में मग्न थे, तभी सूर्य पुत्र शनि ने अपना काला कुरूप चेहरा बनाकर क्रोधपूर्ण कहा- "हे वानर मैं देवताओ में शक्तिशाली शनि हूँ। सुना हैं, तुम बहुत बलशाली हो। आँखें खोलो और मेरे साथ युद्ध करो, मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ।" इस पर हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक कहा- "इस समय मैं अपने प्रभु को याद कर रहा हूं। आप मेरी पूजा में विघन मत डालिए। आप मेरे आदरणीय है। कृपा करके आप यहां से चले जाइए।" जब शनि देव लड़ने पर उतर आए, तो हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूंछ में लपेटना शुरू कर दिया। फिर उन्हें कसना प्रारंभ कर दिया जोर लगाने पर भी शनि उस बंधन से मुक्त न होकर पीड़ा से व्याकुल होने लगे। हनुमान ने फिर सेतु की परिक्रमा कर शनि के घमंड को तोड़ने के लिए पत्थरो पर पूंछ को झटका दे-दे कर पटकना शुरू कर दिया। इससे शनि का शरीर...

भगवत मर्म

 महाभारत में युद्ध के बाद मृत्यु से पहले इन 4 योद्धाओं की थी सबसे कठिन अंतिम इच्छा 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 महाभारत अनगिनत कहानियों से भरा हुआ है. जीवन को समझना है तो महाभारत के विभिन्न पात्रों से जुड़ी हुई घटनाओं को पढ़कर बहुत कुछ जाना जा सकता है. महाभारत में ऐसा ही प्रसंग है योद्धाओं की अंतिम इच्छा से जुड़ा हुआ. आइए, जानते हैं महाभारत के किन योद्धाओं ने अपनी कौन-कौन सी अंतिम इच्छा रखी थी| घटोत्कच की अंतिम इच्छा 〰〰〰〰〰〰〰〰 जब श्रीकृष्ण ने भीमपुत्र घटोत्कच की अंतिम इच्छा के बारे में पूछा तो घटोत्कच ने विनम्रतापूर्वक कहा ‘हे प्रभु यदि मैं वीरगति को प्राप्त करूं, तो मेरे मरे हुए शरीर को ना भूमि को समर्पित करना, ना जल में प्रवाहित करना, ना अग्नि दाह करना मेरे इस तन के मांस, त्वचा, आँखे, ह्रदय आदि को वायु रूप में परिवर्तित करके आकाश में उड़ा देना. मेरे शरीर के कंकाल को पृथ्वी पर स्थापित कर देना. आने वाले समय में मेरा यह कंकाल महाभारत युद्ध का साक्षी बनेगा. श्रीकृष्ण ने घटोत्कच की मृत्यु के बाद उनकी अंतिम इच्छा पूरी की थी| विदुर की अंतिम इच्छा 〰〰〰〰〰〰〰 युद्ध के समय जब विदुर श्रीकृष्ण से मिले और ...

जीवन चक्र

 *चौरासी चक्र* *""""""""""""""* जीव का प्रथम ३० लाख बार वृक्ष योनि में जन्म होता है । इस योनि में सर्वाधिक कष्ट होता है । धूप ताप,आँधी, वर्षा आदि में बहुत शाखा तक टूट जाती हैं । शीतकाल में पतझड में सारे पत्ता पत्ता तक झड़ जाता है एवं लोग कुल्हाड़ी से काटते हैं । उसके बाद जलचर प्राणियों के रूप में ९ लाख बार जन्म होता  है  हाथ और पैरों से रहित देह और मस्तक। सड़ा गला मांस  ही खाने को मिलता है परस्पर एक दूसरे का मांस खाकर जीवन रक्षा करते हैं। उसके बाद कृमि योनि में १० लाख बार जन्म होता है। और फिर ११ लाख बार पक्षी योनि में जन्म होता है।वृक्ष ही आश्रय स्थान होते हैं।  कीड़े-मकोड़े, सड़ा गला जो कुछ भी मिल जाय, वही खाकर उदरपूर्ति करना। स्वयं भूखे रह कर संतान को खिलाते हैं और जब संतान उडना सीख जाती है  तब पीछे मुडकर भी नहीं देखती । काक और शकुनि का जन्म दीर्घायु होता है। उसके बाद २० लाख बार पशु योनि,वहाँ भी अनेक प्रकार के कष्ट मिलते हैं। अपने से बडे हिंसक और बलवान् पशु सदा ही पीडा पहुँचाते रहते हैं। भय के कारण पर्वत कन्दराओं मे...

रोचक कथा

 आज आपको  हनुमान जी एक लोक कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ, *जिसका विवरण संसार के किसी भी पुस्तक में आपको शायद ही मिलेगा..   *जय श्री राम* *कथा का आरंभ तब का है ,,* जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,, की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,, उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,, और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,, सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,, और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,, बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,, उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,, जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,, रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,, अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,, और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,, अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,, हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,, अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ क...

प्रक्रति और धर्म

 *वृक्षों एवं पौधों का धार्मिक महत्व* हमारी धर्म संस्कृति में वृक्षों को देवता स्वरूप माना गया है। मनु-स्मृति के अनुसार वृक्ष योनि पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप मानी गयी है। परमात्मा द्वारा वृक्षों का सर्जन परोपकार एवं जनकल्याण के लिए किया गया है। (1) तुलसी- तुलसी एक बहुश्रुत, उपयोगी वनस्पति है। स्कन्दपुराण एवं पद्मपुराण के उत्तर खण्ड में आता है कि जिस घर में तुलसी होती है वह घर तीर्थ के समान होता है। समस्त वनस्पतियों में सर्वाधिक धार्मिक,  आरोग्यदायिनी  एवं शोभायुक्त तुलसी भगवान नारायण को अतिप्रिय है। तुलसी माला से मन्त्र जाप अधिक शुभ फलदायी होते है। तुलसी के समीप किया गया अनुष्ठान अत्यन्त पुण्यदायी एव ंसद्गति प्राप्त कराता है। (2) बिल्वपत्र- शिवपुराण के अनुसार बिल्व पत्र का महत्व इस प्रकार है। एक बिल्व पत्र रोज चढ़ाने से मनुष्य संसार सागर में गोते नहीं खाता, इस संसार में पुण्यात्मा रूप में सुविख्यात होता है। बिल्व पत्र का पौधा पोषित करने वाले को अनन्त पुण्य फल मिलता है। भगवान शंकर के तीर्थ स्थलों पर बिल्वपत्र का पेड़ लगाने की प्राचीन परम्परा है। (3) केला- केला, विष्ण...

भगवत लीला

 श्रीराम बाल लीला कथा .  गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान राम की सुंदर बाल लीलाओं का वर्णन कर रहे है। तुलसीदास जी बता रहे हैं बचपन से ही लक्ष्मण जी की राम जी के चरणों में प्रीति थी,और भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी और सेवक की जिस प्रीति की प्रशंसा है, वैसी प्रीति हो गई। वैसे तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुण के धाम हैं लेकिन सुख के समुद्र श्री रामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं। माँ कभी गोदी में लेकर भगवान को प्यार करती है। कभी सुंदर पालने में लिटाकर  ‘प्यारे ललना!’ कहकर दुलार करती है। जो भगवान सर्वव्यापक, निरंजन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मे ब्रह्म हैं,वो आज  प्रेम और भक्ति के वश कौसल्याजी की गोद में (खेल रहे) हैं। भगवान के कान और गाल बहुत ही सुंदर हैं। ठोड़ी बहुत ही सुंदर है। दो-दो सुंदर दँतुलियाँ हैं, लाल-लाल होठ हैं। नासिका और तिलक (के सौंदर्य) का तो वर्णन ही कौन कर सकता है। जन्म से ही भगवान के बाल चिकने और घुँघराले हैं, जिनको माता ने बहुत प्रकार से बनाकर सँवार दिया है। शरीर पर पीली झँगुली पहनाई हुई है। उनका घुटनों और हाथों के बल चलना बहुत ही प्यारा लगता है। ...

रोचक प्रसंग

 नाम करण लीला। . अब भगवान के नामकरणका समय आया है। गुरु वशिष्ठजी को बुलाया गया है। गुरुदेव आये है। ऊँचा आसान गुरूजी को दिया है। चार आसान नीचे लगाये गए हैं। चार आसनों पर दशरथ जी, माता कौसल्या, कैकई और सुमित्रा जी बैठे हुए हैं। आज गुरु वसिष्ठ अपने भाग्य की सरहाना कर रहे हैं। आज मेरे द्वारा भगवान का नामकरण हो रहा हैं। गुरूजी की आँखों में आंसू आ गए हैं। एक पूर्व प्रसंग का स्मरण हुआ हैं। जिस समय ब्रह्मा जी ने मुझे प्रकट किया था तो उस समय ये आज्ञा दी थी की तुम सूर्य वंश के पुरोहित बन जाओ। और उस समय वसिष्ठ जी ने मना करदिया था। क्योंकि उन्होंने कहा की ये काम मुझे अच्छा नही लगता हैं पिताजी। ब्रह्मा जी ने कहा की यदि तुम ये मौका चूक गए तो बहुत पछताओगे। और एक दिन रोना पड़ेगा तुम्हे। वसिष्ठ जी बोले की पिताजी में क्यू पछताऊंगा। ब्रह्मा जी बोले हैं यदि तुम पुरोहित बन गए तो भगवान विष्णु , श्री राम बनकर इस वंश में जन्म लेंगे और तुम्हे इनको गोदी में खिलाने का अवसर प्राप्त हो जायेगा। आप सोचो थोड़ा आपकी गोद में ठाकुर जी होंगे और आप आनंद प्राप्त करोगे। तभी वसिष्ठ जी ने स्वीकार कर लिया की मैं पुरोहित बनूँग...

भक्ति महात्म्य

 जैसे दिल करें वैसे भक्ति करें। जैसा दिल कहे वैसे भजन करें। आप कहेंगे ये क्या बात हुई? सही बात है और ये ही बात है। बहुत ज्यादा नियम में जाओगे तो थक जाओगे, हार जाओगे, परेशान हो जाओगे। इसका मतलब ये नहीं कि जो नियम से पूजा करते हैं वो गलत हैं…. पर हम जैसे कहाँ जायेंगे जो नियम नहीं कर पाते। ध्यान – जिनकी ध्यान में रूचि है, जिनका ध्यान लग जाता है भगवान में और आपको ये करने में अगर सहजता होती है तो आप ध्यान करो। मान लीजिये आपको कोई ध्यान करने के लिए बोले और आपका ध्यान लग ही नहीं रहा। आप आँखें बंद करके बैठे रहो। मन में उलटे पुल्टे ख्याल आये। तो इससे अच्छा है न आप ध्यान ही न करो। भजन – अगर आपका भजन करने में मन है। कोई भी एक भजन जो जिसे गाकर, सुनकर आप की आँख में आंसू आ जाए। तो वो आपके लिए भक्ति है। भगवान को याद करके आंसू आना…. भक्ति है… प्रेम है। वो आपकी भक्ति चल रही है। अगर आपकी भजन में रूचि नहीं है तो आप भजन मत गाइये। कथा सुनना– आपकी कथा सुनने में रूचि है आप कथा सुनिए। लेकिन ये सब काम करते हुए थोड़ा ध्यान रखना ज़िद्द मत करना परिवार में कि हमें तो भजन करना है.. कथा सुननी है आप टीवी नहीं देखने...

मानस मर्म

 भगवान राम के वनवास का मुख्य कारण कौन थे खुद श्री राम, रानी कैकयी, मन्थरा या भाग्य चक्र? भगवान श्रीराम ही इसका मुख्य कारण थे क्योंकि भगवान श्रीराम नहीं माता कैकयी को यह सब करने के लिए कहा था भले ही यह बात तुलसीकृत रामायण में ना लिखी हो लेकिन यह सच्चाई है एक बार प्रभु श्री राम अकेले बगीचे में बैठे थे झूले पर और वह भी उदास तभी माता कैकेई उनके पास आई और उनकी उदासी का कारण पूछा की हे राघव तुम उदास क्यों हो तब भगवान ने कहां नहीं मां मैं उदास नहीं हूं आपको ऐसा क्यों प्रतीत होता है तब माता कैकई ने कहा हे राघव तुम सब से झूठ बोल सकते हो लेकिन मुझसे नहीं मुझे पता है तुम उदास हो जब बार-बार माने आग्रह करा प्रभु श्री राम ने कहा की हे माता मैं इस संसार में खाली यह राजसी सुख भोगने के लिए ही नहीं आया हूं बल्कि इसके अलावा भी मुझे बहुत कुछ करना है जिसके लिए मुझे अयोध्या से दूर जाना होगा तब माता कैकई ने कहा ऐसा कौन सा कार्य है जो तुम अयोध्या में रहते हुए नहीं कर सकते हो तो भगवान श्रीराम ने बताया की हे माता अनेक ऋषि मुनि ने मेरे दर्शन की अभिलाषा से अनेक जन्मों से तप किए हैं और अभी कर रहे हैं वह भी वनो...

पुर्णीमा

 *पीपल पूर्णिमा व्रत विशेष(पीपल के वृक्ष की महिमा और महत्व) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन मृत्यु के देवता धर्मराज के निमित्त प्रातः स्नान के उपरांत व्रत का संकल्प रख भक्ति भाव से व्रत रखने का विधान है। इस दिन जल से भरा हुआ कलश, छाता, जूते, पंखा, सत्तू,पकवान आदि दान करना चाहिए। इस दिन किया गया दान गोदान के समान फल देने वाला होता है और ऐसा करने से धर्मराज प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। मनुष्य को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। ऐसा शास्त्र मानते हैं।     हिदु धर्म में पीपल का महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए:- मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु, सखा शंकरमेवच । पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम, वृक्षराज नमोस्तुते ।। हिदु धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं और हमारे पितरों का वास भी माना गया है। पीपल वस्तुत: भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है की वृक्षों में मैं पीपल हूँ। पुराणो में उल्लेखित है कि 〰...

बुद्ध

 *बुद्ध पूर्णिमा विशेष 〰️〰️🌸🌸〰️〰️ भगवान बुध के जन्म दिवस को बुद्ध पूर्णिमा के रुप में मनाए जाने की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है. इस वर्ष बुध पूर्णिमा 26 मई 2021 को बुधवार के दिन मनाई जाएगी. बुद्ध पूर्णिमा को “बुद्ध जयन्ती” और “वैसाक” और “वैशाख पूर्णिमा” नामों से भी पुकारा जाता है। बुधपूर्णिमा के शुभ अवसर पर भूमि, भवन और वाहन की खरीद के साथ ही पदभार ग्रहण करना बहुत ही शुभ माना जाता है। नए काम की शुरुआत के लिए भी यह दिन बहुत शुभ माना जाता है। ईसा पूर्व कपिलवस्तु के महाराजा शुद्धोदन की धर्मपत्नी महारानी महामाया देवी की कोख से नेपाल की तराई के लुम्बिनी वन में जन्मे सिद्धार्थ ही आगे चलकर बुद्ध कहलाए। बुद्ध के जन्म, बोध और निर्वाण के संदर्भ में भारतीय पंचांग के वैशाख मास की पूर्णिमा की पवित्रता की प्रासंगिकता स्वयंसिद्ध है। वैसाखी पूर्णिमा पावनता की त्रयी है। इस पुनीत तिथि को ही बुद्ध का अवतरण हुआ, आत्मज्ञान अर्थात बोध हुआ और महापरिनिर्वाण हुआ। गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों में संतुलन की धारणा को महत्व दिया। उन्होंने इस बात पर बहुत बल दिया कि भोग की अति से बचना जितना आवश्यक है उत...

मेरे राम

 *🔶🔹श्रीराम का कूटनीतिज्ञ स्वरूप🔹🔶* 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 प्रायः ये जनप्रवृत्ति रही है कि श्रीराम को एक सरल , करुणावत्सल और मर्यादारक्षक के रूप में देखा गया जो सदैव सामाजिक और राजनैतिक मर्यादाओं की रक्षा करते हैं जबकि श्रीकृष्ण को एक चतुर , कूटनीतिज्ञ और लीलाधर के रूप में देखा गया जो धर्मस्थापना के लिये साध्य साधन औचित्य की किसी मर्यादा को मानने के लिये तैयार नहीं हैं । इसी तुलना के चलते भावुक भक्तों द्वारा चौदह और सोलह कलाओं जैसी अवधारणायें दी गयीं जबकि वास्तविकता यह है कि श्रीराम भी उतने ही घोर राजमर्मज्ञ थे जितने श्रीकृष्ण । अंतर केवल छवि का है । श्रीराम की सरल छवि के नीचे उनका धुर राजनीतिज्ञ रूप आच्छादित हो गया है जबकि श्रीकृष्ण की चपल छवि के कारण उनका कूटनीतिज्ञ रूप जनमानस में स्थापित हो गया है ।  एक वास्तविकता यह भी है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण दोंनों की कूटनीतिक और रणनैतिक कार्यशैली एक जैसी ही थी जिसे चार प्रमुख सिद्धांत थे --  1-- अपने पक्ष में सुदृढ संगठन  नैतिक बल उत्पन्न करना  2-- युध्द पूर्व विरोधी पक्ष में समर्थक उत्पन्न करना । 3-- सैन्य प्रयोग के लिये...