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Showing posts from May, 2020

शाक्ति रहस्य

जय माँ महाकाली आज हम आपको महाशक्ति के मुख्य रहस्यों से अवगत करवाएंगे हालांकि यह बहुत गूढ़ विषय है किंतु अध्ययन और मनन करने पर इसे समझा जा सकता है!                     महा-शक्ति का रहस्य विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है।'तैत्तिरीयोपनिषद्' ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय होता है, उसी का नाम ब्रह्म है।इस बात को समझाते हुए गुरुदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि 'अत्नं ब्रह्मेति व्यजानत' अर्थात् अन्न ब्रह्म  है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को  इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरुजी ने 'प्राणं ब्रह्मेति व्यजानत' कहा अर्थात् प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा  हुआ, प्राण से जीता है और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से सन्तोष न हुआ। फिर गुरुजी न 'मन ब्रह्मेति व्याजानत' बताया अर्थात् मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से सन्तोष न हुआ। तब गुरुजी ने 'विज्ञान' को...

यंत्र महिमा

👉पूजा में यंत्रों का महत्व क्यों ? विद्वानों का मानना है कि पूजा के स्थान पर देवी-देवताओं के यंत्र रख कर उनकी पूजा उपासना करने से अधिक उत्तम फल मिलता है, क्योंकि देवी-देवता यंत्र में स्वयं वास करते हैं। अतः मंत्रों की तरह ही यंत्र भी शीघ्र सिद्धि देने वाले होते हैं। यों भी कहा जा सकता है कि यंत्र, मंत्रों का चित्रात्मक प्रदर्शन हैं। यंत्र का तात्पर्य चेतना अथवा सजगता को धारण करने का माध्यम या उपादान माना गया है। ये ज्यामितीय आकृतियां होते हैं, जो त्रिभुज, अधोमुखी त्रिभुज, वृत्त, वर्ग, पंच कोण तथा षट्कोणीय आदि आकृतियों के होते हैं। मंडल का अर्थ वर्तुलाकर आकृति होता है, जो ब्रह्मांडीय शक्तियों से आवेशित होती है। यंत्र की नित्य पूजा उपासना और दर्शन से व्यक्ति को अभीष्ट की पूर्ति तथा इष्ट की कृपा प्राप्त होती है। इन्हीं अनुभवों को ध्यान में रखते हुए हमारे पूर्वज मनीषियों ने यंत्रों का निर्माण सर्वसाधारण के लाभ हेतु किया। ध्यान रखें कि यंत्रों को प्राणप्रतिष्ठित कराकर ही पूजा स्थल में रखें, तभी वे फलदायी होंगे। भुवनेश्वरी क्रम चंडिका में लिखा है कि भगवान् शिव देवी पार्वती को कह रह...

रोचक तथ्य ६

पुराण के नाम और उनका महत्त्व (१) ब्रह्मपुराणः—इसे “आदिपुराण” भी का जाता है। प्राचीन माने गए सभी पुराणों में इसका उल्लेख है। इसमें श्लोकों की संख्या अलग- २ प्रमाणों से भिन्न-भिन्न है। १०,०००…१२.००० और १३,७८७ ये विभिन्न संख्याएँ मिलती है। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में लोमहर्षण ऋषि ने किया था। इसमें सृष्टि, मनु की उत्पत्ति, उनके वंश का वर्णन, देवों और प्राणियों की उत्पत्ति का वर्णन है। इस पुराण में विभिन्न तीर्थों का विस्तार से वर्णन है। इसमें कुल २४५ अध्याय हैं। इसका एक परिशिष्ट सौर उपपुराण भी है, जिसमें उडिसा के कोणार्क मन्दिर का वर्णन है। (२) पद्मपुराणः—-इसमें कुल ६४१ अध्याय और ४८,००० श्लोक हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार इसमें ५५,००० और ब्रह्मपुराण के अनुसार इसमें ५९,००० श्लोक थे। इसमें कुल खण़्ड हैं—(क) सृष्टिखण्डः—५ पर्व, (ख) भूमिखण्ड, (ग) स्वर्गखण्ड, (घ) पातालखण्ड और (ङ) उत्तरखण्ड। इसका प्रवचन नैमिषारण्य में सूत उग्रश्रवा ने किया था। ये लोमहर्षण के पुत्र थे। इस पुराण में अनेक विषयों के साथ विष्णुभक्ति के अनेक पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। इसका विकास ५ वीं शताब्दी माना जाता है। (३) ...

महादेव🙏

सर्वेश्वर शिव           भगवान शिव पंचमुखी होकर 10 भुजाओं से युक्त हैं एवं पृथ्वी, आकाश और पाताल तीनों लोकों के एकमात्र स्वामी हैं। शिव का रूप ज्योतिर्मय भी है। एक रूप ज्योतिर्मय भी है।  एक रूप भौतिकी शिव के नाम से जाना जाता है जिसकी हम सभी आराधना करते हैं। ज्योतिर्मय शिव पंचतत्वों से निर्मित हैं। भौतिकी शिव का वैदिक रीति से अभिषेक एवं स्रोतों (मंत्रोच्चारण) द्वारा स्तवन किया जाता है। ज्योतिर्मय शिव के निकट साधक मौन रहकर अपना कर्म करता है। ज्योतिर्मय शिव तंत्र विज्ञान द्वारा दर्शन देते हैं, बशर्ते साधक को गुरु का पूर्ण मार्गदर्शन हो, क्योंकि तं‍त्र विज्ञान शिव का तेज है (तीसरा नेत्र)। इस विज्ञान को जानने वाले जितने भी हुए और जिन्होंने भी शिव के इस रूप के दर्शन किए, सबने इस ज्ञान को गोपनीय रखा।  यह सत्य है कि सत्यान्वेषी मनीषियों ने संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन कर अपनी व्याख्याओं में अपने-अपने अनुभवों को अपनी भाषाओं में वर्णित कर समाज के सामने जितना प्रकट करना आवश्यक था उसका प्रचार-प्रसार किया है। तंत्र विज्ञान वास्तविकता के दर्शन कराता है।...

रोचक तथ्य ५

गणेशजी ही नहीं, विष्णुजी की पीठ का भी न करें दर्शन...... बुद्धि के देवता श्रीगणेश की पीठ के दर्शन नहीं करना चाहिए। वह इसीलिए क्योंकि ऐसा करने से घर में दरिद्रता का वास होने लगता है। हो सकता है ऐसे में आपको कई तरह की परेशानियों का सामना भी करना पड़े। पुराणों में वर्णित है कि गणेशजी रिद्धी-सिद्धी के दाता हैं। गणेशजी के शरीर पर ब्रह्मांड से जुड़े अंग निवास करते हैं। उनकी सूंड पर धर्म, कानों पर ऋचाएं, दाएं हाथ में वर, बाएं हाथ में अन्न, पेट में समृद्धि, नाभी में ब्रह्मांड, आंखों में लक्ष्य, पैरों में सातों लोक और मस्तक में ब्रह्मलोक विद्यमान है। गणेशजी के सामने से दर्शन करने पर उपरोक्त सभी सुख-शांति और समृद्धि प्राप्त हो जाती है। पीठ के दर्शन करने पर यह पुण्य नहीं मिलता। इसीलिए पुराणों में गणेश जी की पीठ के दर्शन करना वर्जित माना गया है। मान्यता है कि श्रीगणेश की पीठ पर दरिद्रता का निवास होता है। उनकी पीठ के दर्शन करने वाला इंसान अगर बहुत धनवान हो तो उसके घर पर दरिद्रता का प्रभाव बढ़ जाता है। यही कारण इनकी पीठ नहीं देखना चाहिए। अगर आपने इनकी पीठ के दर्शन कर लिए है तो श्री गणे...

संवाद

ठाकुर रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद स्वामी विवेकानंद     :  मैं समय नहीं निकाल पाता. जीवन आप-धापी से भर गया है.  रामकृष्ण परमहंस   :  गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं. लेकिन उत्पादकता आजाद करती है. स्वामी विवेकानंद     :  आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?            रामकृष्ण परमहंस   :  जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो. यह इसे जटिल बना देता है. जीवन को सिर्फ जिओ. स्वामी विवेकानंद     :  फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हैं?          रामकृष्ण परमहंस   :  परेशान होना तुम्हारी आदत बन गयी है. इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते. स्वामी विवेकानंद     :  अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं? रामकृष्ण परमहंस   :  हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है. सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है. अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं. इस अ...

रोचक तथ्य ४

विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो का अनुसंधान ) ■ क्रति = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग ■ 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग ■ 2 त्रुति = 1 लव , ■ 1 लव = 1 क्षण ■ 30 क्षण = 1 विपल , ■ 60 विपल = 1 पल ■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) , ■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा ) ■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) , ■ 7 दिवस = 1 सप्ताह ■ 4 सप्ताह = 1 माह , ■ 2 माह = 1 ऋतू ■ 6 ऋतू = 1 वर्ष , ■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी ■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी , ■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग ■ 2 युग = 1 द्वापर युग , ■ 3 युग = 1 त्रैता युग , ■ 4 युग = सतयुग ■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग ■ 76 महायुग = मनवन्तर , ■ 1000 महायुग = 1 कल्प ■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ ) ■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म ) ■ महाकाल = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म ) सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l दो लिंग : नर और नारी । दो पक्ष : शुक्ल पक...

मानव शरीर के रहस्य २

सात प्रकार के शरीरों की संरचना एवम् विकास . 1. स्थूल शरीर:👉 एक बच्चे के जन्म लेने के बाद 7 वर्षों तक स्थूल शरीर अथवा भौतिक शरीर का निर्माण और विकास होता है। इन साथ वर्षों में भौतिक शरीर का पूर्ण रूप से विकसित होना आवश्यक है। पशुओं के पास सिर्फ भौतिक शरीर ही होता है। इन प्रथम सात वर्षों में मनुष्य और पशुओं में कोई विशेष अंतर नही पायी जाती है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिनका सिर्फ भौतिक शरीर ही निर्मित हो पाता है और आगे के शरीरों का कोई विकास नही हो पाता है। ऐसे लोग पशुवत जीवन ही जीकर मरजाते हैं।भौतिक शरीर में रहने वालों में नकल करने की आदत होती है। उस समय तक बुद्धि का विकास नही हो पाता है। इसलिए पहले सात वर्षों तक बच्चों में अनुकरण अथवा नकल करने की प्रवृत्ति प्रधान रूप से बनी रहती है। 2.आकाश शरीर:👉  दूसरे सात वर्षों में आकाश शरीर अथवा भाव शरीर का विकास होने लगता है। व्यक्ति में भावनाओं का जन्म होता है। उसमे प्रेम और आत्मीयता की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। अब व्यक्ति अपने तक सीमित नही रहता है। वह दूसरों से भी अपने संबंधों का ताना बाना बुनने लगता है। विकास का यह चरण व्य...

विश्वास

विश्वास दो कहानियां है जो हमारे विश्वास को दर्शाती हैं 1 . एक बार एक गांव में बरसात हो ,इसके लिये प्राथना सभा रखी जाती हैं।सभी गांव वासी प्रार्थना के लिये इकट्ठा हुये। एक बालक भी अपनी छतरी ले कर वहां पर आ गया। गांव वालो ने कहा भाई वैसे ही बरसात नही हो रही उस पर तुम छतरी लेकर आ गए? तुम छतरी का क्या करोगे? उस अबोध बालक ने  कहा प्रार्थना होगी तो बरसात होगी , तब मैं भीग नही जाऊंगा।  इसे कहते है विश्वास।। . दूसरी कथा। . 2- एक संत ने अपनी सभा मे कहा कि *"ऊपर वाला जब भी देता ,देता छप्पर फाड़कर के"। एक श्रदालु अनुयायी ने सोचा कि यदि ऊपर बाला छप्पर फाड़ कर ही देगा तो क्यो ना मै उसका काम आसान कर दूं।औऱ उसने अपनी छत का एक हिस्सा तोड़ दिया।    उस रात एक चोर चोरी करके छतों से भाग रहा था,वो टूटी छत से नीचे गिरने लगा,किसी तरह वो चोर तो छत से लटकर वहाँ से निकल भागा।पर उसका चोरी का सामान उसी घर मे गिर गया जो मकान मालिक को मिला। . कहने का मतलब यह है कि यदि आपको अपने परमात्मा पर, अपने इष्ट पर पूर्ण विश्वास है तो ही आप सफल हो सकते हैं, तो पूरी कायनात आपको सफल करने लगेग...

श्री रामचरितमानस महिमा ५

श्रीरामचरितमानस महिमा  भाग ६  गतांक से आगे........ . बंदऊं नाम राम रघुवर को।  हेतु क्रसानू भानु हिमकर को।। पुनि मन वचन कर्म रघुनायक। चरण कमल बंदऊं सब लायक।। .     यह नाम क्या है?  राम ऐसा नाम है जिसकी वंदना करना भी नाम की वंदना के स्वरूप है । राम भी तो अनेक जैसे परशुराम, बलराम, व्यापक राम इत्यादि तो फिर कौन से राम ? रघुवर को राम अर्थात श्रेष्ठ रघुकुल उत्पन्न चक्रवर्ती महाराज श्री दाशरथि पुत्र राम जी।   परम राम भक्त मानस प्रेमी महानुभाव परमप्रसिद्ध बैकुंठ वासी श्रीजयरामदास जी महाराज के लगभग सभी लेख मैंने कल्याण में पड़े हैं और मेरे ह्रदय उनके अगाध श्रद्धा है मानस से संबंधित लगभग सभी शंकाओं का समाधान और मीमांसा श्री जी द्वारा अति उत्तम स्वरूप में की गई उन्होंने श्रीरामचरितमानस से संबंधी भावपूर्ण लेख कल्याण में लिखे हैं जिनसे यह उद्धरण लेकर मैं लिख रहा हूं साथ ही इस उद्धरण में मैं मानस रहस्य से भी कुछ अंश ले रहा हूं। इस निर्णय के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज (श्री गोसाई जी) श्रीअवधनाथसरकारदशरथ पुत्र कौशल्यानंदन रघुकुल श्रेष्ठ जो राम ...

जप महिमा एवं साधनात्मक तथ्य

ॐ नमः शिवाय।। मंत्र के विज्ञान को समझें। मंत्र का सृजन यह ध्यान में रखकर किया जाता है कि मंत्र की ध्वनियों का उच्चारण किस स्तर का शक्ति कंपन उत्पन्न करता है और उसका जपकर्ता पर, बाहरी वातावरण पर तथा अभीष्ट प्रयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है? वस्तुत: जप से:- (1) शरीर में स्थित चक्रों, उपत्यकाओं एवं ग्रंथियों की सामर्थ्य बढ़ती है। (2) व्यक्ति में भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता विकसित होती है। (3) अलौकिक क्षमताएं प्राप्त होती है। (4) लगातार जप करने से ध्वनि के प्रभावोत्पदक चेतन तत्व जहां भी टकराते हैं, वहां चेतनात्मक हलचल उत्पन्न करते हैं। (5) मंत्र जप की दोहरी प्रक्रिया होती है-एक भीतर और दूसरी बाहर। लगातार जप एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है जिससे सूक्ष्म शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होते है। चेतना में परिवर्तन होता है। (6) जप और ध्यान के मेल से मानसिक शक्तियां सिमटने लगती है। उनका बिखराव बंद हो जाता है। (7) कभी-कभी मन, जप करते-करते अचेतन की किसी बात में रमने लगता है। भटक जाता है। तब ऐसे विचार उठने लगते है जिन पर ग्लानि होने लगती है। ऐसी अवस्था में भटकें ...

भगवंत नाम महिमा

नाम मंत्र की महिमा।। . ‘ श्रीकृष्ण: शरणं मम’  ‘श्रीकृष्ण: शरणं मम’  ‘श्रीकृष्ण: शरणं मम’ . श्रीकृष्ण: शरणं मम’ इस नाममन्त्र के संकीर्तन और जप से वैष्णवों को परम आनन्द और शान्ति का अनुभव होता है।’ महाप्रभु जी ‘अष्टाक्षरार्थ-निरूपण’ नामक ग्रन्थ में इस महामन्त्र की कैसी दिव्य महिमा कही गयी है:- य: स्मरेत्तु सदा मन्त्रं ‘श्रीकृष्ण: शरणं मम’। अष्टाक्षरं जपेन्नित्यं यमो दृष्ट्वा हि शंकते॥ “जो प्राणी सदैव ‘श्रीकृष्ण: शरणं मम’ इस प्रकार स्मरण करता है, जप-कीर्तनक रता है, उसको देखकर यम निश्चय शंकित होते हैं।” जिस प्रकार भगवान मनुष्य की भावना के अनुसार उसके मनोरथ पूर्ण करने में समर्थ हैं, उसी प्रकार इस अष्टाक्षर महामन्त्र (जो कि भगवान का अक्षरात्मक भगवद्विग्रह है) का प्रत्येक अक्षर समस्त मनोरथों को पूर्ण करने में समर्थ है। श्रीमद्भगवद्गीता के विभूतियोग में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है–‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ अर्थात् ‘समस्त यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूँ’। जप से सब प्रकार के क्लेशों की निवृत्ति होती है और समाधि सिद्ध होती है। श्रीमद्वल्लभ मतानुयायी नाममन्त्र अथवा नामदीक्षा के र...

रोचक तथ्य ३

मंदिर में जाने से पहले क्यों बजाते हैं घंटा या घंटी ? मंदिर के द्वार पर और विशेष स्थानों पर घंटी या घंटे लगाने का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। लेकिन इस घंटे या घंटी लगाने का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है? कभी आपने सोचा कि यह किस कारण से लगाई जाती है? घंटियां 4 प्रकार की होती हैं : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1. गरूड़ घंटी,  2. द्वार घंटी, 3. हाथ घंटी और  4. घंटा। 1. गरूड़ घंटी : गरूड़ घंटी छोटी-सी होती है जिसे एक हाथ से बजाया जा सकता है। 2. द्वार घंटी : यह द्वार पर लटकी होती है। यह बड़ी और छोटी दोनों ही आकार की होती है। 3. हाथ घंटी : पीतल की ठोस एक गोल प्लेट की तरह होती है जिसको लकड़ी के एक गद्दे से ठोककर बजाते हैं। 4. घंटा : यह बहुत बड़ा होता है। कम से कम 5 फुट लंबा और चौड़ा। इसको बजाने के बाद आवाज कई किलोमीटर तक चली जाती है। मंदिर में घंटी लगाए जाने के पीछे न सिर्फ धार्मिक कारण है बल्कि वैज्ञानिक कारण भी इनकी आवाज को आधार देते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है। ...

रोचक कथा ३

भागवत कथा में बांस की स्थापना क्यों की जाती है?     जब महात्मा गोकर्ण जी ने महाप्रेत धुंधुकारी के उद्धार के लिए श्रीमद् भागवत की कथा सुनायी थी, तक धुंधुकारी के बैठने के लिए कोई बांस की अलग से व्यवस्था नहीं की थी । बल्कि उसके बैठने के लिए एक सामान्य आसान ही बिछाया गया था । महात्मा गोकर्ण जी ने धुंधुकारी का आह्वान किया और कहा - "भैया धुंधुकारी ! आप जहाँ कहीं भी हों, आ करके इस आसान पर बैठ जाईये । यह भागवत जी की परम् पवित्र कथा विशेषकर तेरे लिए ही हो रही है । इसको सुनकर तुम इस प्रेत योनि से मुक्त हो जाओगे । अब धुंधुकारी का कोई शरीर तो था नहीं, जो आसन पर स्थिर रहकर भागवत जी की कथा सुन पाते । वह जब जब आसन पर बैठने लगता, हवा का कोई झोंका आता और उसे कहीं दूर उड़ाकर ले जाता । ऐसा उसके साथ बार-बार हुआ ।ल वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाये कि मुझे हवा उड़ा ना पाए और मैं सात दिन तक एक स्थान पर बैठकर भागवत जी की मंगलमयी कथा सुन पाऊँ, जिससे मेरा उद्धार हो जाये और मेरी मुक्ति हो जाये । वह सोचने लगा कि मेरे तो अब माता-पिता भी नहीं हैं, जिनके भीतर प्रवेश करके या उनके माध्यम से मैं क...

रोचक तथ्य

चरण स्पर्श करने से कौन लाभ से मिलते है ??? .         पैर छुना या प्रणाम करना, केवल एक परंपरा या बंधन नहीं है। यह एक विज्ञान है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा है। पैर छुने से केवल बड़ों का आशीर्वाद ही नहीं मिलता बल्कि अनजाने ही कई बातें हमारे अंदर उतर जाती है। पैर छुने का सबसे बड़ा फायदा शारीरिक कसरत होती है, तीन तरह से पैर छुए जाते हैं। पहले झुककर पैर छुना, दूसरा घुटने के बल बैठकर तथा तीसरा साष्टांग प्रणाम। झुककर पैर छुने से कमर और रीढ़ की हड्डी को आराम मिलता है। दूसरी विधि में हमारे सारे जोड़ों को मोड़ा जाता है, जिससे उनमें होने वाले स्ट्रेस से राहत मिलती है, तीसरी विधि में सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं, इससे भी स्ट्रेस दूर होता है। इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जो स्वास्थ्य और आंखों के लिए लाभप्रद होता है। प्रणाम करने का तीसरा सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे हमारा अहंकार कम होता है। किसी के पैर छुना यानी उसके प्रति समर्पण भाव जगाना, जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार स्वत: ही खत्म होता है। इसलि...

रोचक कथा २

क्यों है श्रीगणेश को दूर्वा अत्यन्त प्रिय ?      सनातन हिन्दू धर्म में देव पूजा में दूर्वा को अत्यन्त पवित्र माना गया है । देवी दुर्गा को छोड़कर पूजा में प्राय: सभी देवताओं को दूर्वा चढ़ाई जाती है । जिस प्रकार शिव पूजन में बेल पत्र आवश्यक है उसी प्रकार श्रीगणेश की पूजा तो बगैर दूर्वा के पूरी ही नहीं मानी जाती है । यह दूर्वा कहां से उत्पन्न हुई ? कैसे अजर-अमर (चिरायु) हुई ? क्यों इतनी पवित्र मानी गयी है ? क्यों श्रीगणेश को दूर्वा अति प्रिय है ? और दूर्वा से गणेश पूजन का महत्व क्या है ? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर इस प्रस्तुति में दिया गया है । समुद्र-मंथन में भगवान विष्णु से हुई दूर्वा की उत्पत्ति अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और देत्यों ने जब क्षीरसागर को मथने के लिए मन्दराचल पर्वत की मथानी बनायी तो भगवान विष्णु ने अपनी जंघा पर हाथ से पकड़कर मन्दराचल को धारण किया था । मन्दराचल पर्वत के तेजी से घूमने से रगड़ के कारण भगवान विष्णु के जो रोम उखड़ कर समुद्र में गिरे, वे लहरों द्वारा उछाले जाने से हरे रंग के होकर दूर्वा के रूप में उत्पन्न हुए । दूर्वा की चिरायु...