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Showing posts from January, 2021

आदि शंकर

 *आदि शंकराचार्य जी से प्रश्न किया गया कि "परिपक्वता" का क्या अर्थ है ?* *आदि शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया कि –* *1. परिपक्वता वह है - *जब आप दूसरों को बदलने का प्रयास करना बंद कर दे, इसके बजाय स्वयं को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करें।* *2. परिपक्वता वह है –  *जब आप दूसरों को, जैसे हैं,वैसा ही स्वीकार करें।* *3. परिपक्वता वह है –  *जब आप यह समझे कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी सोच अनुसार सही हैं।* *4. परिपक्वता वह है –  *जब आप "जाने दो" वाले सिद्धांत को सीख लें।* *5. परिपक्वता वह है –  *जब आप रिश्तों से लेने की उम्मीदों को अलग कर दें और केवल देने की सोच रखे।* *6. परिपक्वता वह है –  *जब आप यह समझ लें कि आप जो भी करते हैं, वह आपकी स्वयं की शांति के लिए है।* *7. परिपक्वता वह है –  *जब आप संसार को यह सिद्ध करना बंद कर दें कि आप कितने अधिक बुद्धिमान है।* *8. परिपक्वता वह है –  *जब आप दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना बंद कर दे।* *9. परिपक्वता वह है –  *जब आप दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कर दें।* *10. परिपक्वता वह है –  *जब आप स्वयं में शांत है।* *11. परिपक...

विचारणीय

                         . *कटु सत्य..* *एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!* *पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!!* *तो आईं तो एक ने कहा-*  *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...* *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली..* *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया...* *दूसरी बोली--"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..*  *अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?* *तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* *लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-*               *क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है,...

श्री हरिविष्णु

 विष्णु भगवान पूरी सृष्टि के पालनहार है। जब जब धरती पर पाप बढ़ता है। तो पाप का नाश करने के लिए श्री हरि विष्णु धरती पर प्रकट होते है। और राक्षसों का वध करके सृष्टि के बोझ को हल्का करते है। कभी वह श्री राम के अवतार में तो कभी श्री कृष्ण के अवतार में भगवान ने भक्तों के कष्ट दूर किए। सर्वव्यापक परमात्मा ही भगवान विष्णु हैं। पूरे संसार को चलाने वाले भगवान विष्णु हैं। वह निर्गुण और सगुण है।जो पीताम्बरधारी, वनमाला, सुंदर कमलों के समान नेत्र वाले भगवान श्री विष्णु का ध्यान करता है, वह बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह ही नारायण हैं, वासुदेव, अच्युत, परमात्मा, माधव, कृष्ण, शाश्वत, शिव, अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। वहीं हरि श्री विष्णु की स्तुति का पाठ करने से श्री नारायण भगवान प्रसन्न होते हैं, और साधक की सभी मनोकामनाओं को पूरा करते है।       🌹👏श्री हरि स्तुति👏🌹 शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशहम्। विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभांगम्।। लक्ष्मीकातं कमलनयनं योगिभिध्र्यानगम्यं। वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।। जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता। गो द्विज हितका...

संकल्प शक्ति

 कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें-- आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण-- जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा-- कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें। सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं। जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो , तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना है ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक दूसरे में घुलमिल जाएं। किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में निषेधात्मक कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं तो वह वास्तविकता में बदल जाती ...

ब्राह्मणों को जानिये

 ब्राह्मणों के 8 प्रकार जानिए कौन से प्राचीन काल में हर जाति, समाज आदि का व्यक्ति ब्राह्मण बनने के लिए उत्सुक रहता था। ब्राह्मण होने का अधिकार सभी को आज भी है। चाहे वह किसी भी जाति, प्रांत या संप्रदाय से हो वह गायत्री दीक्षा लेकर ब्राह्मण बन सकता है, लेकिन ब्राह्मण होने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है। हम उस ब्राह्मण समाज की बात नहीं कर रहे हैं जिनमें से अधिकतर ने अपने ब्राह्मण कर्म छोड़कर अन्य कर्मों को अपना लिया है। हालांकि अब वे ब्राह्मण नहीं रहे लेकिन कहलाते अभी भी ब्राह्मण ही है। 👉स्मृति-पुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है:- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। आठ प्रकार के ब्राह्मण श्रुति में पहले बताए गए हैं। इसके अलावा वंश, विद्या और सदाचार से ऊंचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। ब्राह्मण को "धर्मज्ञ " "विप्र" और "द्विज" भी कहा जाता है।* उपनाम में छुपा है पूरा इतिहास 1👉मात्र : ऐसे ब्राह्मण जो जाति से ब्राह्मण हैं लेकिन वे कर्म से ब्राह्मण नहीं हैं उन्हें मात्र कहा गया है। ब्राह्मण कुल में ...

तिलक क्यों लगाया जाता है

 🙏🙏 तिलक लगाने का महत्व 🙏🙏 👉तिलक लगवाते समय सिर पर हाथ क्यों रखते हैं ?          *********** ❇️ व्यास जी कहते हैं कि तिलक बिना लगाएं हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कोई भी पूजा-प्रार्थना नहीं होती। सूने मस्तक को अशुभ माना जाता है। तिलक लगाते समय सिर पर हाथ रखना भी हमारी एक परंपरा है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसका कारण क्या है? ❤️ दरअसल धर्म शास्त्रों के अनुसार सूने मस्तक को अशुभ और असुरक्षित माना जाता है। तिलक लगाने के लिएअनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है। मध्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है। अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है। ❤️ तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है। ज्योतिष के अनुसार अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है। यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्वी, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे। ❤️ दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र ...

साक्षी कौन?

 *मनुष्य के कर्मों का साक्षी कौन है*   मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप-पुण्य का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है। ‘शरीर और गुण (पुण्यकर्म) इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु गुण प्रलयकाल तक बने रहते हैं। जिसके गुण और धर्म जीवित हैं, वह वास्तव में जी रहा है।’ पाप और पुण्य 〰️〰️〰️〰️〰️ वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्म (पुण्य) हैं और उनके विपरीत कर्म अधर्म (पाप) कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो। मनुष्य के कर्म के चौदह साक्षी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म–ये सब मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं। सूर्य रात्रि में नहीं रहता और चन्द्रमा दिन में नहीं रहता, जलती हुई अग्नि भी...

धर्मनिष्ठा

 धर्मानुबन्धनम् भगवान् का प्रत्येक अवतार सामान्य-धर्म का उद्धार करने के लिए होता है , किन्तु इन्ही अवतारों में भी कहीं-कहीं सामान्य-धर्म के विरुद्ध विशेष-धर्म का भी आश्रय लेते हैं , जो सामान्य-धर्म के विपरीत दिखाई देता है । वह विशेष-धर्म सामान्य धर्मशास्त्र की दृष्टि से पाप होने पर भी धर्मानुबन्धित होने से उसे धर्म ही कहना चाहिये , क्योंकि उस धर्म के पथ का अनुसरण करने से जीव का कल्याण होता है । जैसे भगवान् राम ने गौ-ब्राह्मण-देवता-सन्त की रक्षा के लिए अवतार लिया ,  यह संस्कृत तथा भाषा की अनेक रामायणों से सिद्ध होता है । किन्तु उसी ब्राह्मण धर्म के विपरीत कर्म करने वाले सोमयाजी वेद के महाविद्वान् महाब्राह्मण रावण की परिवार सहित हत्या करके अनेकों ऋषियों के धर्म की रक्षा की । जैसे भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न धारण करने की प्रतिज्ञा करके भी अपने भक्त अर्जुन की रक्षा के लिए तथा भीष्म के प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भी सुदर्शन चक्र धारण कर लिया । सामान्य-धर्म किसी पतिव्रता स्त्री के धर्म को नष्ट करने को महापाप मानता है , किन्तु जब उसी महासती के पतिव्रत-धर...

श्रीअन्नपूर्णा

 *श्रीअन्नपूर्णाष्टोत्तर शतनामस्तोत्रम्*  *॥ श्रीगणेशाय नमः ॥*  *॥ श्रीअन्नपूर्णा विश्वनाथाभ्यां नमः ॥* *अस्य श्रीअन्नपूर्णाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् श्रीब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीअन्नपूर्णेश्वरी देवता । स्वधा बीजम् । स्वाहा शक्तिः । ॐ कीलकम् । मम सर्वाभीष्टप्रसादसिद्धयर्थे पाठे विनियोगः ।* ॐ अन्नपूर्णा शिवा देवी भीमा पुष्टिस्सरस्वती । सर्वज्ञा पार्वती दुर्गा शर्वाणी शिववल्लभा ॥ १॥  वेदवेद्या महाविद्या विद्यादात्री विशारदा ।  कुमारी त्रिपुरा बाला लक्ष्मीश्श्रीर्भयहारिणी ॥ २॥  भवानी विष्णुजननी ब्रह्मादिजननी तथा ।  गणेशजननी शक्तिः कुमारजननी शुभा ॥ ३॥  भोगप्रदा भगवती भत्ताभीष्टप्रदायिनी ।  भवरोगहरा भव्या शुभ्रा परममङ्गला ॥ ४॥  भवान्नी चञ्चला गौरी चारुचन्द्रकलाधरा ।  विशालाक्षी विश्वमाता विश्ववन्द्या विलासिनी ॥ ५॥  आर्या कल्याणनिलया रुद्राणी कमलासना ।  शुभप्रदा शुभावर्ता वृत्तपीनपयोधरा ॥ ६॥  अम्बा संहारमथनी मृडानी सर्वमङ्गला ।  विष्णुसंसेविता सिद्धा ब्रह्माणी सुरसेविता ॥ ७॥  परमानन्ददा शान्त...

गणनायकाष्टकम्

 *गणनायकाष्टकम्*  एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् ।  लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ १॥  मौञ्जीकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतिनम् ।  बालेन्दुसुकलामौलिं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ २॥  अम्बिकाहृदयानन्दं मातृभिः परिवेष्टितम् ।  भक्तिप्रियं मदोन्मत्तं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ३॥  चित्ररत्नविचित्राङ्गं चित्रमालाविभूषितम् ।  चित्ररूपधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ४॥  गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं कर्णचामरभूषितम् ।  पाशाङ्कुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ४॥  मूषकोत्तममारुह्य देवासुरमहाहवे योद्धुकामं महावीर्यं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ५॥  यक्षकिन्नरगन्धर्वक्ष् सिद्धविद्याधरैस्सदा स्तूयमानं महाबाहुं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ६॥  सर्वविघ्नहरं देवं सर्वविघ्नविवर्जितम् ।  सर्वसिद्धिप्रदातारं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ ८॥  गणाष्टकमिदं पुण्यं यः पठे सततं नरः सिद्ध्यन्ति सर्वकार्याणि विद्यावान् धनवान् भवेत् ॥  इति श्रीगणनायकाष्टकं सम्पूर्णम् । 🙏*

रोचक कथा

 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 *संगति का फर्क* पुराने जमाने में एक शहर में दो ब्राह्मण पुत्र रहते थे, एक गरीब था तो दूसरा अमीर..दोनों पड़ोसी थे..,,गरीब ब्राम्हण की पत्नी ,उसे रोज़ ताने देती , झगड़ती ..।। एक दिन ग्यारस के दिन गरीब ब्राह्मण पुत्र झगड़ों से तंग आ जंगल की ओर चल पड़ता है , ये सोच कर , कि जंगल में शेर या कोई मांसाहारी जीव उसे मार कर खा जायेगा , उस जीव का पेट भर जायेगा और मरने से वो रोज की झिक झिक से मुक्त हो जायेगा..।          जंगल में जाते ही उसे एक गुफ़ा नज़र आती है...वो गुफ़ा की तरफ़ जाता है...। गुफ़ा में एक शेर सोया होता है और शेर की नींद में ख़लल न पड़े इसके लिये हंस का पहरा होता है..        हंस ज़ब दूर से ब्राह्मण पुत्र को आता देखता है तो चिंता में पड़ सोचता है..ये ब्राह्मण आयेगा ,शेर जगेगा और इसे मार कर खा जायेगा... ग्यारस के दिन मुझे पाप लगेगा...इसे बचायें कैसे???         उसे उपाय सुझता  है और वो शेर के भाग्य की तारीफ़ करते कहता है..ओ जंगल के राजा... उठो, जागो..आज आपके भाग खुले हैं, ग्यारस के दिन खुद विप्रद...

आरती का अर्थ

 *🙏🏻🙏🏻 आरती का अर्थ 🙏🏻🙏🏻* व्याकुल होकर भगवान को याद करना, उनका स्तवन करना।  आरती, पूजा के अंत में धूप, दीप, कर्पूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। हिंदू धर्म में अग्नि को शुद्ध माना गया है। पूजा के अंत में जलती हुई लौ को आराध्य देव के सामने एक विशेष विधि से घुमाया जाता है।  इसमें इष्टदेवता की प्रसन्नता के लिए दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन और गुणगान किया जाता है। यह उपासक के हृदय में भक्ति दीप प्रज्वलित करने और ईश्वर का आशीर्वाद ग्रहण करने का सुलभ माध्यम है। आरती चार प्रकार की होती है – दीप आरती, जल आरती, धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती, पुष्प आरती दीप आरती: दीपक लगाकर आरती का आशय है। हम संसार के लिए प्रकाश की प्रार्थना करते हैं। जल आरती: जल जीवन का प्रतीक है। आषय है हम जीवन रूपी जल से भगवान की आरती करते हैं। धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती: धूप, कपूर और अगरबत्ती सुगंध का प्रतीक है। यह वातावरण को सुगंधित करते हैं तथा हमारे मन को भी प्रसन्न करते हैं। पुष्प आरती: पुष्प सुंदरता और सुगंध का प्रतीक है। अन्य कोई साधन न होने पर पुष्प से आरती की जाती है। आरती ...

मानस मर्म

 रामायण के सात काण्ड - मानव की उन्नति के सात सोपान  1 बालकाण्ड  - बालक प्रभु को प्रिय है क्योकि उसमेँ छल ,कपट , नही होता । विद्या , धन एवं प्रतिष्ठा बढने पर भी जो अपना हृदय निर्दोष निर्विकारी बनाये रखता है , उसी को भगवान प्राप्त होते है। बालक जैसा निर्दोष निर्विकारी दृष्टि रखने पर ही राम के स्वरुप को पहचान सकते है। जीवन मेँ सरलता का आगमन संयम एवं ब्रह्मचर्य से होता है। बालक की भाँति अपने मान अपमान को भूलने से जीवन मेँ सरलता आती है।बालक के समान निर्मोही एवं निर्विकारी बनने पर शरीर अयोध्या बनेगा । जहाँ युद्ध, वैर ,ईर्ष्या नहीँ है , वही अयोध्या है। 2. अयोध्याकाण्ड - यह काण्ड मनुष्य को निर्विकार बनाता है l जब जीव भक्ति रुपी सरयू नदी के तट पर हमेशा निवास करता है, तभी मनुष्य निर्विकारी बनता है। भक्ति अर्थात् प्रेम , अयोध्याकाण्ड प्रेम प्रदान करता है । राम का भरत प्रेम , राम का सौतेली माता से प्रेम आदि ,सब इसी काण्ड मेँ है ।राम की निर्विकारिता इसी मेँ दिखाई देती है । अयोध्याकाण्ड का पाठ करने से परिवार मेँ प्रेम बढता है । उसके घर मेँ लडाई झगडे नहीँ होते । उसका घर अयोध्या बनता है ...

भगवान शिव के रहस्य

 *भगवान शिव के  "35" रहस्य! भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है। *🔱1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है। *🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था। *🔱3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है। *🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं। *🔱5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है। *🔱6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को ...

कालिंदी कौन थी

 महाभारत में कालिंदी कौन थी और कैसे हुआ उसका श्री कृष्ण से मिलन ? राधा कृष्ण के प्रेम संबंध से तो पुरा जगत् परिचित है। अगर इनको प्रेम का पर्याय भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी। ऐसे हीं श्री कृष्ण से अथाह प्रेम रखनेवाली एक और गोपी हुई, जो श्रीकृष्ण के विरह को सह न पायी थी। तो आइये जानते हैं- महाभारत में कालिंदी कौन थी और कैसे हुआ उसका श्रीकृष्ण से मिलन? यह प्रेम कहानी राधाकृष्ण के प्रेम-रस के समय की है। सूर्यपुत्री कालिंदी हीं यमुना देवी थीं। जब ब्रज में श्रीकृष्ण रास रचाते थे, तो यमुना यानी कालिंदी भी गोते खाती थी, और श्रीकृष्ण के माधुर्य में नृत्य किया करती थी। जब श्रीकृष्ण को अक्रूर जी मथुरा ले गए, तब उनका विरह सहन नहीं कर पाने में एक गोपी, यमुना अर्थात कालिंदी भी थी। जो अपना बहाव मोड़कर वह द्वारावती चली गयी। एक बार कृष्ण और अर्जुन जंगल में साथ जा रहे थे।अर्जुन शिकार खलेते-खेलते थक गये थे। अब वे प्यास लगने पर यमुनाजी के किनारे गये । भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ने यमुनाजी में हाथ-पैर धोकर उनका निर्मल जल पिया और देखा कि एक परम सुन्दरी कन्या वहाँ तपस्या कर रही है ।  कृ...

जीवन जीने के तीन सूत्र

 *💐💐सुखी, स्वाभिमान एवं सम्मान के साथ जीवन जीने के तीन सूत्र  हैं! उपयोगिता, भावना एवं कर्तव्य। 💐💐* उपयोगिता संबंधों को प्रगाढ़ करती है, भावना परिवार को मजबूत करती है और कर्तव्य घर, परिवार, समाज में एकता एवं समन्वय स्थापित करते हैं।  उपयोगिता के बदले उपयोगिता, भावना के बदले भावना चाहिए, लेकिन कर्तव्य के बदले कुछ नहीं चाहिए, कर्तव्य तो निःस्वार्थ भावना से किए जाते हैं।  छोटी-सी भूल सदियों की सजा बन जाती है, इसलिए हमें जीवन सही और व्यवस्थित तरीके से जीना चाहिए।  जिन माँ-बाप ने हमें खून दिया उन्हें बुढ़ापे में खून के आँसू बहाने पर मजबूर करना कायरता है, जिन्होंने अपने खून से हमे बड़ा किया उनके लिए खून बहा देना मानवता है। भगवान राम ने कर्तव्य की खातिर सौतेली माँ के वचनों को स्वीकार कर लिया, क्या आप भी इतने कर्तव्यनिष्ठ होकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं? अगर नहीं तो आपका जीवन सार्थक नहीं है।  श्रवण कुमार अपने पुत्र होने का कर्तव्य बगैर किसी तर्क के निभाता है, कर्तव्य के पालन में तर्क नहीं समर्पण की जरूरत पड़ती है। गंगा जल पीने से ज्यादा पुण्य बूढ़े माँ-बाप के आँसू ...

वृंदावन राहस्य

 *ब्रह्म जिसके इशारे पर नाचता है उसे "वृंदावन कहते है"।* एक बार जब ग्रहण के समय सभी व्रज वासियों और द्वारिका वासियों को कुरुक्षेत्र में जाने का अवसर मिला तब श्री राधा रानी भी अपनी सखियों से साथ वहाँ गई,जब रुक्मणि आदि रानियों को पता चला की व्रजवासी सहित राधा रानी जी भी आई है तो उनके मन में तो बहुत वर्षों से उनसे मिलने की इच्छा थी,क्योकि भगवान हमेशा यशोदा जी नन्द बाबा और राधा रानी जी के प्रेम में इतना डूबे रहते थे कि द्वारिका में सभी रानियों को बड़ा आश्चर्य होता था.आज जब पता चला तो सभी ने भगवान कृष्ण से राधा रानी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। भगवान श्री कृष्ण ने कुछ सैनिको के साथ रानियों को भेजा,रानियाँ वहाँ पहुँची जहाँ राधा रानी जी ठहरी हुई थी,रुक्मणि आदि रानियाँ जैसे ही अन्दर गई,तो देखा एक बहुत सुन्दर युवती खड़ी हुई,वह इतनी सुन्दर थी कि सभी रानियाँ उनके सामने फीकी लगने लगी, सभी उसके चरणों में गिर गई,तब वह बोली - आप सभी कौन है? तब रुक्मणि आदि रानियों ने अपना परिचय बताया और कहा कि हम आपसे ही मिलने आये है आप राधा हो ना ? तब सखी बोली - मै राधा रानी नहीं हूँ , मै तो उनकी सखी हूँ ,म...

क्यों हो रहे हैं आजकल के विवाह असफल ?

    कई दिनों से यह देखने मे आ रहा हैं की आज कल लगभग विवाह के पूर्व लड़का - लड़की की कुंडली का मिलान करवाते हैं ।  अच्छे गुण मिल जाते हैं, विवाह सम्पन्न भी हो जाता हैं।  पर कुछ दिनो बाद विवाह, विवाद मे बदल जाता हैं । वैसे तो विवाह के विवाद मै बदलने के कई कारण हैं पर कुछ ख़ास कारण जो मूल जड़ होती हैं उस पर किसी का ध्यान नही जाता । पहला कारण जब हम विवाह की पत्रिका छापते हैं तो पहली पत्रिका हम अपने इष्ट देव या श्री गणेश जी या कुल देव को अर्पित कर आमन्त्रण देते हैं, विवाह सम्पूर्ण हो जाता हैं ,  लेकिन विवाह पश्चात कभी भी हमने उनके पास जाकर विवाह सुखद सम्पन्न होने का धन्यवाद नही देते ।  हम शादी के बाद इतने व्यस्त हो जाते की जिनको हमने निमन्त्रण देकर बुलाया उनको सम्मान सहित वापस भी तो भेजना होगा ।  यंही गलती होती हैं ।  ईश्वर को यदि हम बुला रहे हैं तो ससम्मान विसर्जन या भेजना भी होगा ।  होता यूं हैं की बुला तो लेते हैं और फिर बुलाकर काम निकालकर भूल जाते हैं ।  अक्सर परिवार मैं उनके कुल देव ,  कुल देवी को विवाह का निमंत्रण नही देते,  साथ ह...

वासुदेवाय नमः।

 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ❤️जगत गुरु श्रीकृष्णचन्द्र जो सबके प्रियतम प्राण। अगहन (मार्गशीर्ष) की एकादशी को प्रगटे गीता-ज्ञान॥ 💕विश्व के किसी भी धर्म या संप्रदाय में किसी भी ग्रंथ की जयंती नहीं मनाई जाती। सनातन हिंदू धर्म में भी सिर्फ गीता जयंती मनाने की परंपरा पुरातन काल से चली आ रही है, क्योंकि अन्य ग्रंथ किसी मनुष्य द्वारा लिखे या संकलित किए गए हैं जबकि गीता का जन्म स्वयं श्रीभगवान के श्रीमुख से हुआ है:- 💖"या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता" 🍁श्री गीता जी" का प्राकट्य धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में मार्गशीर्ष मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को भगवान श्रीकृष्ण के मुख से हुआ था, यह तिथि मोक्षदा एकादशी के नाम से विख्यात है। 🌻कलियुग के प्रारंभ होने के मात्र तीस वर्ष पहले, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन, कुरुक्षेत्र के मैदान में, अर्जुन के नन्दिघोष नामक रथ पर सारथी के स्थान पर बैठकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश किया था, इसी तिथि को प्रतिवर्ष गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। ❤️गीता एक सार्वभौम ग्रंथ है, यह किसी काल, धर्म, संप्रदाय या जाति विशेष के लिए नहीं...