योग्य गुरु न मिले तो क्या करें???? *बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥ भावार्थ:-मैं गुरु महाराज के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ, जो सुरुचि (सुंदर स्वाद), सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुंदर चूर्ण है, जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है॥ मित्रों हम जिस शांति की तलाश में रहते हैं वह हमें नहीं मिल पाती है, क्यो? क्योंकि, हम शिष्य बनने को तैयार ही नहीं है, शिष्य का मतलब इतना ही है कि जो सीखने को तैयार है, शिष्य का अहंकार झुका होना चाहियें, क्योंकि जब अहंकार झुकता है तो ही ज्ञान के रास्ते खुलते हैं। हम सभी अकड में घूमते हैं और यही वजह है कि हम जिस शांति की तलाश में रहते हैं वह हमें नहीं मिल पाती है, जिस दिन हम विनम्र हो जायें तो भाई-बहनों आप यकीन मानिये कि सच से हमारा परिचय हो जायेगा। अगर हमें जीवन में शांति की तलाश है या हम ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति करना चाहते हैं तो हमें अपने भीतर शिष्यभाव लाना होगा, हमें उन सभी से सीखना होगा जो हमें क...