Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2022

वृतांत

 ✨ मानसी-सेवा का अद्भुत फल ✨   🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 बहुत पुरानी बात है, वृन्दावन में एक सन्त रहते थे।  . उनके पास बालकृष्ण की एक मूर्ति थी जिसे वह अपना पुत्र मानते थे और स्वयं को नंदबाबा समझकर श्रीकृष्ण की मानसिक सेवा किया करते थे।  . श्रीकृष्ण का चरित्र ही इतना अद्भुत है कि उनसे आप अपना कोई भी नाता (पिता, पुत्र, स्वामी, पति, सखा, दास आदि) जो भी आपको अच्छा लगे, जोड़ सकते हैं... . तोहि मोहि नाते अनेक मानिये जो भावै। ज्यों-त्यों तुलसी कृपालु चरन-सरन पावै।।  (विनय-पत्रिका ७९) . संत बाबा ब्राह्ममुहुर्त से लेकर रात्रि में शयन करने तक कन्हैया की मानसिक सेवा करते और मन से ही उन्हें सभी वस्तु अर्पण करते थे।  . प्रात:काल ही लाला (व्रज में लड्डूगोपाल को लाला कहते हैं) को भूख लगी होगी-ऐसा सोचकर कन्हैया के लिए दूध, मलाई, मिश्री का मानसिक रूप से प्रबन्ध करते।  . दोपहर में लाला से पूछते 'क्या खायेगा ?', वही तैयार करते। शाम को ब्यारु (रात्रि भोजन) कराते और रात को सोते समय दूध पिलाते। . गीता (९।२६) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं.. . पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रय...

गणेश स्तोत्र

 हर प्रकार के ऋणों से मुक्ति देने वाला गणेश स्तोत्र.....  जिस प्रकार मंत्र ध्वनि का समूह है, उसी प्रकार स्तोत्र पाठ भी ध्वनि का समूह ही है जिससे साधक को फल की प्राप्ति अवश्य होती है । स्तोत्र पाठ से अनेक समस्याएं स्वयं ही हल हो जाती हैं लेकिन इसमें शर्त यह है कि मनुष्य में उसमें आस्था होनी चाहिए और स्तोत्र का पाठ उच्च स्वर में किया जाना चाहिए । कृष्णयामल ग्रंथ में हर प्रकार के ऋणों से मुक्ति देने वाले गणेश स्तोत्र का वर्णन किया गया है । ऋणहर्ता गणेश एक बार कैलास पर्वत के रमणीय शिखर पर भगवान चन्द्रशेशर शिव गिरिराजनन्दिनी पार्वती के साथ बैठे हुए थे । उस समय पार्वतीजी ने भगवान शिव से कहा—‘आप सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता हैं । कृपा करके मुझे ऋण नाश का उपाय बताइये ।’ शिवजी ने कहा—‘तुमने संसार के कल्याण की कामना से यह बात पूछी है, इसे मैं जरुर बताऊंगा । भगवान गणेश ऋणहर्ता हैं । उनका ‘ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र’ हर प्रकार के कर्जों से मुक्ति दिलाने वाला है ।’  इस स्तोत्र का पाठ करने से पहले गणेशजी का ध्यान कर लेना चाहिए । ध्यान  सिन्दूरवर्णं द्विभुजं गणेशं लम्बोदरं पद्मदले निविष्...

श्री कृष्ण

 स्नेह वंदन...!!! भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उद्धवजी को तत्व ज्ञानोपदेश !!! उद्धवजी ने भगवान से कहा—‘आपने थोड़े समय में मुझे अच्छा ज्ञान दिया है । मैं आपकी शरण में हूँ, मैं भी आपके साथ आपके धाम चलूंगा ।’ भगवान ने कहा—‘उद्धव ! तेरे हृदय में मैं चैतन्य रूप से स्थित हूँ । तू मेरा जहां ध्यान करेगा, वहीं मैं प्रकट हो जाऊंगा । तू यह भावना रखना कि श्रीकृष्ण मेरे साथ ही हैं ।’ भगवान अपनी चरण-पादुका उद्धवजी को देकर स्वधाम पधार गए । उद्धवजी भगवान श्रीकृष्ण के समान श्यामवर्ण और कमलनयन हैं । मथुरा आने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धवजी को अपना अंतरंग सखा और मंत्री बना लिया । उद्धवजी के लिए भगवान श्रीकृष्ण का कथन है— ‘उद्धवजी ! मुझे आप जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रिय हैं, उतने ब्रह्माजी, शंकरजी, बलरामजी, लक्ष्मीजी भी प्रिय नहीं हैं । अधिक क्या, मेरा आत्मा भी मुझे उतना प्रिय नहीं है ।’  (श्रीमद्भागवत ११।१४।१५) भगवान ने गोपियों को सान्त्वना-संदेश पहुंचाने के लिए उद्धवजी को व्रज में भेजा परन्तु वे गोपियों के महाभाव को लेकर, उनके चेले बन कर लौटे । भगवान श्रीकृष्ण के साथ वे द्वारका गए । जब द्वारका में अपशक...

ब्रम्हा की वंशावली

 ब्रह्मा की सन्तान ब्रह्मा जी से दक्ष हुआ जिसे ब्रह्मा जी ने सृष्टि करने की आज्ञा दी । तब दक्ष ने अपनी पत्नी वीरिणी के गर्भ से ६० कन्याएं उत्पन्न कीं। उनमें से दस को धर्म से, तेरह कश्यप जी से, सत्ताईस चन्द्रमा से ब्याह दीं । चार कन्याएं अरिष्टनेमि को, दो भृगुपुत्र को, दो कृशाश्व को, दो अंगिरा मुनि को ब्याह दी । कश्यप की स्त्रियां  अदिति  अंश धाता भव त्वष्टा मित्र वरुण अर्यमा विवस्वान सविता पूषा अंशुमान विष्णु - ये सहस्त्र किरणों वाले बारह आदित्य हैं  सुरभि  अजैकपाद अहिर्बुधन्य विरुपाक्ष रेवत हर बहुरूप त्र्यम्बक सवित्र जयन्त पिनाकी अपराजित - ये ग्यारह रुद्रगण हैं, जो असंख्य रुद्रगणों के स्वामी हैं  दिति  हिरण्यकश्यिपु प्रह्लाद  गवेष्ठि कालनेमि जम्भ बल्वल शम्भु  धेनुक, शोमलोमा  विरोचन  बलि  अनुह्लाद   निवातकवच नामक दैत्य(लगभग ३ करोड़, सभी अर्जुन द्वारा मारे गए) ह्लाद  मूक (अर्जुन द्वारा किरात प्रदेश में मारा गया) ह्लद   सुन्द   मारीच (ताड़का से, दण्डकारण्य में श्रीराम द्वारा मारा गया) उपसुन्द हिरण...

सुख

 संसारी सुख अनित्य हैं  ---------------------------- सांसारिक सुख-भोग असार, अनित्य और नाशवान हैं । ये सदा स्थिर रहनेवाले नहीं; आज जो लक्ष्मी का लाल है, वह कल दर दर का भिखारी देखा जाता है; जो आज जवान पट्ठा है, मिर्जा अकड़बेग की तरह अकड़ता हुआ चलता है, वही कल बुढ़ापे के मारे लकड़ी टेक टेक कर चलता है । जिसे पहले सब लोग खूबसूरत कहते थे और मुहब्बत से पास बिठाते थे, अब उसके पास खड़ा होना भी नहीं चाहते । मतलब यह कि यौवन, जीवन, मन-धन, शरीर-छाया और प्रभुता, यह सब अनित्य और चञ्चल हैं; अतः दुःख के कारण हैं । काया में मरण, लाभ में हानि , जीत में हार, सुन्दरता में असुन्दरता, भोग में रोग, संयोग में वियोग और सुख में दुःख - ये सब दुःख के कारण हैं । अगर बिना मृत्यु का जीवन, बिना रंज की ख़ुशी, बिना बुढ़ापे की जवानी, बिना दुःख का सुख, बिना वियोग का संयोग और सदा-सर्वदा रहने वाला धन होता, तो मनुष्य को इस जीवन में अवश्य सुख होता । विषय भोगों में सुख नहीं है । ये असार हैं; केले के पत्ते या प्याज के छिलको की तरह सारहीन हैं । फिर भी, मोहवश मनुष्य विषयों में फंसा रहता है । पर एक न एक दिन मनुष्य को इन विषय-भोग...

मानस मर्म

 तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है - करत चातुरी मोहवश, लखत न निज हित हान । शूक मर्कट इव गहत हठ, तुलसी परम सुजान ।। दुखिया सकल प्रकार शठ, समुझि परत तोई नाहिं । लखत न कण्टक मीन जिमि, अशन भखत भ्रम नाहिं ।। विषयों के संसर्ग से मनुष्य के मन में कामना - इच्छा पैदा होती है । जब इच्छा पूरी नहीं होती, तब क्रोध होता है और क्रोध से मोह की उत्पत्ति होती है । मोह होने से प्राणी को अपना हित या परलोक की हानि नहीं दीखती । राग-द्वेष प्रभृति के कारण उसमें ज्ञानदृष्टी नहीं रहती; पर पढ़ने-लिखने के कारण वह अपने तई परम चतुर समझता है और जिस तरह हठ करके तोता बहेलिये के फन्दे में आप ही फंस जाता है और पिंजरे में कैद हो जाता है तथा बन्दर छोटे मुंह की ठिलिया में रोटी के लिए हाथ डालकर बंदरवाले के कब्जे में हो जाता है; उसी तरह विषयी पुरुष, विषयों के लालच में आकर, अपने तई संसार-बन्धन में फंसा लेता है । मनुष्य भूख, प्यास, रोग, शोक, दरिद्रता, प्रिय-वियोग, बुढ़ापा, जन्म-मरण, चौरासी लाख योनियों में दुःख-भोग तथा नरक प्रभृति से हर तरह दुखी है, उसे ज़रा भी सुख नहीं है, पर वह मोह के मारे ऐसा अन्धा हो रहा है कि उसे कांटे में लगे...

योगसूत्र व्याख्या सूत्र संख्या

 योगसूत्र व्याख्या सूत्र संख्या १  { समाधि पाद } "अथ योगानुशासनम्" जैसे एक कुशल किसान अपने खेत को तैयार करता है वैसे ही हम अपने चित्त की भूमि को कैसे तैयार करें इसके लिए महर्षि पतञ्जलि ने उत्तम अधिकारियों के लिए सर्वप्रथम समाधिपाद की रचना की। अर्थात मन को समाहित करने की शिक्षा का आरम्भ जिसके द्वारा लक्षण, भेद, उपाय और फलों के सहित शिक्षा दी जाए अर्थात व्याख्या की जाय उसको अनुशासन कहते हैं इसीलिए 'अथ योगानुशासनम्'।  इसके अर्थ हुए कि अब लक्षण, भेद, उपाय और फलों सहित योग की शिक्षा देनेवाले शास्त्र को आरम्भ करते हैं। योग को समाधि कहते हैं यद्यपि समाधि योग का अङ्ग है योग का फल नहीं।  योग का अन्तिम तात्पर्य, परिणाम उसका फल तो सत्वान्यताख्याति अथवा पुरुषाख्याति, प्रकृति-पुरुष का विवेक होकर के पुरुष में ???(1 -19) में आपत्ति योग का फल है।  लेकिन जब तक चित्त समाहित नहीं होता, समाधिष्ठ नहीं होता तब तक इस भूमिका को प्राप्त नहीं किया जा सकता।  'युज् संयोजने' और 'युज् समाधौ' - इन दो धातुओं से योग शब्द की निष्पत्ति होती है।  "संयोगोयोग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मन...

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः

 "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" चित्त की वृत्तियों को रोकना, यही योग है।  निरोध अर्थात रोकना।  जो बहिर्मुख वृत्तियाँ हैं जो संसार की तरफ, जो बाह्य विषयों की तरफ जा रही हैं, वहां से उनको लौटकर, उलटाकर, अन्तर्मुख करके अपने चित्त में लीन कर लेना, यही योग है।  ऐसा यह निरोध सब चित्त की भूमियों में, सब प्राणियों का धर्म है जो कभी किसी के चित्त में प्रकट हो जाता है प्रायः यह चित्तों में छिपा हुआ ही रहता है अर्थात चित्त से तमरूपी मल का जो आवरण है उसको हटाकर और राजस की जो विक्षेपरूप चञ्चलता है उससे निवृत्त होकर सत्व के प्रकाश में जो एकाग्र वृत्ति से रहे उसको योग समझना चाहिए।  सारी सृष्टि, सत्व, रजस और तमस, इन तीन गुणों का ही परिणाम रूप है।  एक धर्म, आकार अथवा रूप को छोड़कर, धर्मान्तर के ग्रहण अर्थात दुसरे धर्म, आकार अथवा रूप के धारण करने को परिणाम कहते हैं।  चित्त इन गुणों का सबसे प्रथम सत्व प्रधान परिणाम है इसीलिए इसको चित्तसत्व भी कहते हैं, यह इसका अपना व्यापक स्वरुप है।  यह सारा स्थूल जगत जिसमें हमारा व्यवहार चल रहा है।  रज तथा तम प्रधान गुणों का परिणाम ह...

प्रारब्ध। के प्रकार

 *_तीन प्रकार के प्रारब्ध होते हैं-_* 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 1. मन्द प्रारब्ध 2. तीव्र प्रारब्ध 3.तरतीव्र प्रारब्ध। मंद प्रारब्ध.... को तो आप वैदिक पुरुषार्थ से बदल सकते हैं, तीव्र प्रारब्ध.....आपके पुरुषार्थ एवं संतों-महापुरुषों की कृपा से टल सकता है लेकिन  *तरतीव्र प्रारब्ध.... में जो होता है वह होकर ही रहता है।* एक बार रावण कहीं जा रहा था। रास्ते में उसे विधाता मिले। रावण ने उन्हें ठीक से पहचान लिया। उसने पूछाः "हे विधाता ! आप कहाँ से पधार रहे हैं?" ''मैं कौशल देश गया था।" "क्यों? कौशल देश में ऐसी क्या बात है?" "कौशलनरेश के यहाँ बेटी का जन्म हुआ है।" "अच्छा ! उसके भाग्य में क्या है? "कौशलनरेश की बेटी का भाग्य बहुत अच्छा है। उसकी शादी राजा दशरथ के साथ होगी। उसके घर स्वयं भगवान विष्णु श्रीराम के रूप में अवतरित होंगे और उन्हीं श्रीराम के साथ तुम्हारा युद्ध होगा। वे तुम्हें यमपुरी पहुँचायेंगे। ""हूँऽऽऽ... विधाता ! तुम्हारा बुढ़ापा आ रहा है। लगता है तुम सठिया गये हो।  अरे ! जो कौशल्या अभी-अभी पैदा हुई है और दशरथ.... नन्हा- मुन...