Skip to main content

श्रीरामचरितमानस महिमा २

"श्री रामचरितमानस की महिमा" गतांक से आगे.....
..
पिछले लेख में हमने जाना कि श्रीरामचरितमानस में भगवान श्री रामचंद्र जी की लीलाओं का समायोजन गोस्वामी तुलसीदास जी ने कितनी सुंदरता  से किया है।
श्री रामचरितमानस में वर्णित भगवान की लीलाओं का वर्णन सर्वप्रथम भगवान शिव की रचना के साथ शुरू होता है , जहां भगवान शिव ने श्री रामचंद्र जी की रचना लीलाओं को रचा और उन रचना लीलाओं को कृपा करके माता पार्वती को सुनाया। तत्पश्चात वहीं श्री रामचरित श्री रामभक्त कागभुसुंडि जी को भगवान शंकर के मुख से सुनने को मिला और भगवान शंकर ने यह चरित कागभुसुंडि जी से संसार को आगे भेजने का अधिकारी बनाया । उन्हीं कागभुशुण्डि जी ने फिर मुनि याज्ञवल्क्य जी महाराज को राम कथा सुनाई गई , जिस रामकथा को याज्ञवल्क्य जी ने मुनि भरद्वाज को श्री राम कथा गाकर सुनाई। जब मुनि याज्ञवल्क्य, मुनि भरद्वाज को श्री राम कथा गाकर सुना रहे थे उस समय श्रोता और वक्ता दोनों समान शील स्वभाव तेज और समदर्शी थे और वह दोनों ही हरि की लीलाओं को जानते थे । दोनों ही श्रेष्ठ तपस्वी त्रिकालग्य अर्थात त्रिकालदर्शी थे और भगवान की लीलाओं का रहस्य जानने के बावजूद भी उस चरित्र को एक दूसरे को सुना कर प्रसन्नता पा रहे थे और वही कथा गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने गुरु जी से सुनी थी जिसके विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि उस समय में बहुत छोटा था और उस कथा को अच्छे से कह नहीं पाया था अर्थात उस कथा को अच्छे से सुन नहीं पाया था।
गोस्वामी तुलसीदास जी बालकांड में लिखते हैं
श्रोता बकता ज्ञान निधि कथा राम के गूढ़।
किमि समुझौ में जीव जड़ कलि मल ग्रसित विमूढ़।।
.
गोस्वामी तुलसीदासजी श्रीरामचरितमानस में श्री रामचरितमानस की महिमा का बखान करते हुए लिखते हैं:-
.
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी।
जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी।
तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥

(यमदूतों के मुख पर कालिख लगाने के लिए यह जगत में यमुनाजी के समान है और जीवों को मुक्ति देने के लिए मानो काशी ही है। यह श्री रामजी को पवित्र तुलसी के समान प्रिय है और तुलसीदास के लिए हुलसी (तुलसीदासजी की माता) के समान हृदय से हित करने वाली है॥)
.
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी।
सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी।
रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥(यह रामकथा शिवजी को नर्मदाजी के समान प्यारी है, यह सब सिद्धियों की तथा सुख-सम्पत्ति की राशि है। सद्गुण रूपी देवताओं के उत्पन्न और पालन-पोषण करने के लिए माता अदिति के समान है। श्री रघुनाथजी की भक्ति और प्रेम की परम सीमा सी है॥)
.
रामकथा मंदाकिनी
चित्रकूट चित चारु।
तुलसी सुभग सनेह बन
सिय रघुबीर बिहारु॥ (तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मंदाकिनी नदी है, सुंदर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है और सुंदर स्नेह ही वन है, जिसमें श्री सीतारामजी विहार करते हैं॥)
.
रामचरित चिंतामति चारू।
संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥
जग मंगल गुनग्राम राम के।
दानि मुकुति धन धरम धाम के॥
(श्री रामचन्द्रजी का चरित्र सुंदर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर श्रंगार है। श्री रामचन्द्रजी के गुण-समूह जगत्‌ का कल्याण करने वाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम के देने वाले हैं॥)
.
सदगुर ग्यान बिराग जोग के।
बिबुध बैद भव भीम रोग के॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के।
बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥
(ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु हैं और संसार रूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं के वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये श्री सीतारामजी के प्रेम के उत्पन्न करने के लिए माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं॥)
.
गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित श्रीरामचरितमानस के प्रथम सोपान श्री बालकांड के दोहा क्रमांक 29 से लेकर दोहा क्रमांक 32 तक श्री रामचरितमानस की महिमा और गाथा का बखान बहुत ही सरल भाषा में गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है । वर्तमान समय में श्रीरामचरितमानस वह मार्गदर्शक है जिस पर चल कर भगवत प्राप्ति या यूं कहें कि भगवान के चरणों की प्राप्ति के लिए प्रेम का मार्ग तलाशा जा सकता है । श्री रामचरितमानस की महिमा और गाथा पर प्रश्न लगाना तो कहीं से कहीं तक उचित नहीं है और वैसे भी प्रभु के पद प्राप्ति का मार्ग प्रेम से होकर गुजरता है और मैंने अपने पहले के लेख में भी इस बात को लिखा है कि प्रेम में तर्क नहीं होता प्रेम में प्रश्न नहीं होता प्रेम तो हृदय से उपजा हुआ एक भाव है जब प्रभु के प्रति प्रेम का भाव पैदा हो जाए तभी भक्ति का अंकुर निकल सकता है । भक्ति का नवांकुरण होने के लिए हृदय में प्रेम का बीज पड़ना चाहिए वह बीज सीधा पड़े या टेढ़ा पड़े, उल्टा पडे या आडा गिरे, ह्रदय में जो बीज गिरेगा उससे पेड़ तो सीधा ही निकलेगा। प्रेम का बीज भक्ति के वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है और उस भक्ति के वृक्ष की शीतल छांव में भक्त बैठकर प्रभु नाम की महिमा का सुमिरन करता है । अरण्यकांड में माता शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान देते समय भगवान श्री रामचंद्र जी ने इस बात का उल्लेख किया है।
.
शेष अगले लेख में......
प्रभु चरणों का सेवक
 डॉ राहुल श्रीवास्तव
(प्रभु चरणों का दास के रूप में मैं मेरी अल्प बुद्धि के द्वारा श्री रामचरितमानस की महिमा को शब्दों में संजोने की एक कोशिश कर रहा हूं एक प्रयास कर रहा हूं और भगवान के श्री चरणों की भक्ति भगवान को समर्पित कर लिख रहा हूं । यदि इस लेख में किसी भी प्रकार की कोई त्रुटि है तो प्रभु क्षमा करे।आप सुधि पाठक गण को कोई त्रुटि दीख पड़े तो कृपया ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में जाकर आप अपना प्रश्न या उस त्रुटि के बाबत लिख दें जिससे हम उस त्रुटि का सुधार कर सके । आप सभी लोगों के सुझाव और मार्गदर्शन हमेशा अपेक्षित रहेंगे)

Comments

Popular posts from this blog

विचारणीय

                         . *कटु सत्य..* *एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!* *पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!!* *तो आईं तो एक ने कहा-*  *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...* *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली..* *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया...* *दूसरी बोली--"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..*  *अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?* *तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* *लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-*               *क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है,...

शिव रहस्य

 भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा ही क्यों.. ? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। ''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र :  〰️🔸〰️ शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : 〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️ सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत...

भक्ति मार्ग

 _*ईश्वर प्राप्ति के 12 कदम*_   *भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....*   _*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।*_   _*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 8*_   *_भावार्थ :-_ हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।*   *तुलसी दास जी कहते हैं....*   _*"बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।"*_   *1. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस   व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।*   *2. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।*   *3. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।*   *4. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।*   *5. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जा...