Skip to main content

श्री रामचरितमानस महिमा ५

श्रीरामचरितमानस महिमा 
भाग ६ 
गतांक से आगे........
.
बंदऊं नाम राम रघुवर को।
 हेतु क्रसानू भानु हिमकर को।।
पुनि मन वचन कर्म रघुनायक। चरण कमल बंदऊं सब लायक।।
.
   यह नाम क्या है?  राम ऐसा नाम है जिसकी वंदना करना भी नाम की वंदना के स्वरूप है । राम भी तो अनेक जैसे परशुराम, बलराम, व्यापक राम इत्यादि तो फिर कौन से राम ? रघुवर को राम अर्थात श्रेष्ठ रघुकुल उत्पन्न चक्रवर्ती महाराज श्री दाशरथि पुत्र राम जी।


 परम राम भक्त मानस प्रेमी महानुभाव परमप्रसिद्ध बैकुंठ वासी श्रीजयरामदास जी महाराज के लगभग सभी लेख मैंने कल्याण में पड़े हैं और मेरे ह्रदय उनके अगाध श्रद्धा है मानस से संबंधित लगभग सभी शंकाओं का समाधान और मीमांसा श्री जी द्वारा अति उत्तम स्वरूप में की गई उन्होंने श्रीरामचरितमानस से संबंधी भावपूर्ण लेख कल्याण में लिखे हैं जिनसे यह उद्धरण लेकर मैं लिख रहा हूं साथ ही इस उद्धरण में मैं मानस रहस्य से भी कुछ अंश ले रहा हूं।
इस निर्णय के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज (श्री गोसाई जी) श्रीअवधनाथसरकारदशरथ पुत्र कौशल्यानंदन रघुकुल श्रेष्ठ जो राम हैं उन राम के नाम की वंदना करते हैं ।कैसा है वह राम नाम? वह राम नाम कृशानु अर्थात भानु अर्थात सूर्य तथा हिमकर अर्थात चंद्रमा का हेतु यानी कारण है।
तात्पर्य राम के ( र) अर्थात रकार से अग्नि हैं , बड़ा (आ) की मात्रा अकार से सूर्य एवं (मा) मकार से चंद्र इन तीनों कार्य रूपों की उत्पत्ति हुई है। इस पद से श्री राम नाम का महान महत्व इस प्रकार सूचित कर रहे हैं कि इस जगत मात्र के आधार अग्नि सूर्य और चंद्र ही हैं। यदि यह तीनों ना होते तो संसार का कोई भी कार्य चल ही नहीं सकता था । यह प्रत्यक्ष और निर्विवाद है जब कार्यों का महत्व इतना प्रकट है तब उनके कारण स्वरूप राम नाम के महत्व का क्या कहना? राम नाम के महत्व की महिमा के बखान को कैसे लिखना जिसका सीधा सा अर्थ है कि इस जीव का जो अर्थ अग्नि के द्वारा सिद्ध हो रहा है उसके लिए तो अग्नि ही समर्थ है परंतु जो परमार्थ अग्नि के सामर्थ में नहीं है उस परमार्थ के जिज्ञासु को अग्नि के कारण र यानी रकार की शरण लेनी चाहिए तब काम चलेगा तात्पर्य यह है कि सृष्टि के संपूर्ण 5 भौतिक पदार्थों को अग्नि द्वारा भस्म किया जा सकता है परंतु शुभ अशुभ कर्मों को भस्म करने का कार्य इस अग्नि से नहीं सिद्ध हो सकता इसलिए जिसे शुभ अशुभ कर्मों से छुटकारा पाकर मोक्ष प्राप्त करने की चाह है वह अनल के बीज राम नाम के र कार का अनुसंधान करें तब उसके शुभ अशुभ कर्म भस्मी भूत होंगे।
श्री रामचंद्रजी का रामनामचंद्र है परंतु साधारण रजनी के लिए नहीं है इस रात्रि को तो यही चंद्रमा शोभित करते हैं श्री रामनामभक्तों रूप पूर्णमासी की रात के लिए सोम अर्थात चंद्र है जहां प्रताप एवं अंतत आपका नाम नहीं रह जाता।
श्री रामचरितमानस में भक्त श्रेष्ठ गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने पद में अग्नि सूर्य और चंद्र के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जिनमें रखा आकार और मकान बीज रूप से झलक रहे हैं और इस तरह इन्हीं भावों की पुष्टि होती है गोस्वामी तुलसीदास जी ने पावक अग्नि अनल आदि ऐसे किसी शब्द का प्रयोग ना कर क्रशानू शब्द का प्रयोग किया है।

राम नाम नरकेसरी कनक कसिपु कलिकाल ।
जापक जन प्रहलाद जिमी पालिहि दलि सुरसाल।।
श्री रामनाम नरसिंह भगवान की उपमा में है । कलयुग हिरण्यकश्यप की उपमा में है राम नाम जापक लोग प्रहलाद की उपमा में हैं और पुण्यात्मा लोग देवताओं की भूमि जैसे सुरसाली सुरों को दुखी करता रहता है उसी प्रकार कलयुग पुण्य आत्माओं को जो अपने वर्णाश्रम धर्म अनुकूल शुभ आचरण करते हुए चलना चाह रहे हैं उन्हें परेशान करता रहता है एक राम नाम के जापको से उसकी उसी प्रकार एक भी नहीं चलती जिस प्रकार हिरण्यकश्यप की प्रह्लाद से एक भी नहीं चली जब तक हिरण्यकश्यप देवताओं को दुखी करता रहा तब तक तो भगवान के लिए सही नहीं हुआ था सब कुछ किसी प्रकार से चलता गया किंतु जब हिरण्यकश्यप ने नाम जापक भक्त प्रहलाद को दुख देना आरंभ किया तब भगवान ने तत्काल नरसिंह रूप में प्रकट होकर उसे चीर फाड़ डाला वैसे ही अपार यज्ञ करना वलअंबियों को कलिकाल कलेस पहुंचाता रहता परंतु अगर कभी भी वह किसी राम नाम जापक भक्तों पर अपना जोर दिखा देगा तो उसी समय नष्ट भ्रष्ट कर डाला जाएगा । ऐसा समझकर वह राम नाम जापकों के नजदीक नहीं आता और ना ही उनको कोई विघ्न पहुंचाता है इसी प्रकार घोर कलयुग में गली में एक नाम अवलंबन ही निशकंटक मार्ग बताया गया। राम नाम को छोड़कर और दूसरे समस्त उपाय बिना पद के हो गए हैं। चल नहीं सकते वे देखने मात्र को रह गए कलयुग ने उन्हें शक्तिहीन बना दिया है जैसे चित्र में सूर्य का आकार तो छपा रहता है परंतु वह देखने भर के लिए होता है उससे यदि कोई रात्रि का निवारण करना चाहे तो कदापि नहीं हो सकता लेकिन श्री राम नाम एक ऐसा देदीप्यमान  सूर्य है जिससे समस्त प्रकार के रात्रि का निवारण संभव है कहने का आशय यह है कि कलयुग में श्री राम नाम की महिमा और श्री राम नाम का जप श्री राम नाम की नाम माला की एकमात्र ऐसा निवारण मंत्र है जिसके आधार पर हम अपने समस्त पापों को काट सकते हैं क्यों कि कलयुग श्री राम नाम से भय खाता है
.

शेष अगले लेख में............
प्रभु चरणों का सेवक
डॉ.राहुल श्रीवास्तव
९३०१३६०६१९

Comments

Popular posts from this blog

विचारणीय

                         . *कटु सत्य..* *एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!* *पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!!* *तो आईं तो एक ने कहा-*  *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...* *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली..* *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया...* *दूसरी बोली--"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..*  *अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?* *तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* *लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-*               *क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है,...

शिव रहस्य

 भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा ही क्यों.. ? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। ''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र :  〰️🔸〰️ शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : 〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️ सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत...

भक्ति मार्ग

 _*ईश्वर प्राप्ति के 12 कदम*_   *भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....*   _*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।*_   _*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 8*_   *_भावार्थ :-_ हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।*   *तुलसी दास जी कहते हैं....*   _*"बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।"*_   *1. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस   व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।*   *2. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।*   *3. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।*   *4. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।*   *5. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जा...