Skip to main content

मानव शरीर के रहस्य २

सात प्रकार के शरीरों की संरचना एवम् विकास

.
1. स्थूल शरीर:👉 एक बच्चे के जन्म लेने के बाद 7 वर्षों तक स्थूल शरीर अथवा भौतिक शरीर का निर्माण और विकास होता है। इन साथ वर्षों में भौतिक शरीर का पूर्ण रूप से विकसित होना आवश्यक है। पशुओं के पास सिर्फ भौतिक शरीर ही होता है। इन प्रथम सात वर्षों में मनुष्य और पशुओं में कोई विशेष अंतर नही पायी जाती है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिनका सिर्फ भौतिक शरीर ही निर्मित हो पाता है और आगे के शरीरों का कोई विकास नही हो पाता है। ऐसे लोग पशुवत जीवन ही जीकर मरजाते हैं।भौतिक शरीर में रहने वालों में नकल करने की आदत होती है। उस समय तक बुद्धि का विकास नही हो पाता है। इसलिए पहले सात वर्षों तक बच्चों में अनुकरण अथवा नकल करने की प्रवृत्ति प्रधान रूप से बनी रहती है।

2.आकाश शरीर:👉  दूसरे सात वर्षों में आकाश शरीर अथवा भाव शरीर का विकास होने लगता है। व्यक्ति में भावनाओं का जन्म होता है। उसमे प्रेम और आत्मीयता की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है। अब व्यक्ति अपने तक सीमित नही रहता है। वह दूसरों से भी अपने संबंधों का ताना बाना बुनने लगता है। विकास का यह चरण व्यक्ति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसीके कारण वह पशुओं से कुछ ऊपर उठ पाता है। उसमे मनुष्य होने की गरिमा आने लगती है। चौदह वर्ष तक पहुँचते पहुँचते सेक्स की भावना भी प्रगाढ़ होने लगती है। बहुत से लोग होते हैं जो चौदह वर्ष के ही होकर रह जाते हैं। उनमे आगे का विकास नही हो पाता है।

3. सूक्ष्म शरीर:👉 तीसरे शरीर में विचार बुद्धि और तर्क की क्षमता विकसित होने लगती है। यह शरीर 14-21 वर्ष तक विकसित होजाता है। इस अवधी में शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति विकसित हो जाती है। बौद्धिक चिंतन एवम् विचार इस शरीर के प्रमुख आयाम हैं।

4. मनस शरीर:👉 विचार-जगत से भाव-जगत व मनस-जगत अधिक गहरा होता है। मन की प्रधानता के कारण ही व्यक्ति मनुष्य कहलाता है। इस शरीर में चित्रकारिता, काव्य, साहित्य, संगीत आदि कलात्मक भावों की प्रधानता होने लगती है। सम्मोहन, टेलीपैथी, दूरदर्शिता ये सब चौथे शरीर की संभावनाएं हैं। यद्यपि इस शरीर में धोखे और खतरों की संभावना बहुत अधिक होती है, फिर भी इसका पूरी तरह से विकसित होना जरुरी होता है।
कुण्डलिनी जागरण चौथे शरीर की घटना है। इसे हम psychique body भी कह सकते हैं। चौथे शरीर में मनुष्य को कल्पनायें घेरने लगती है, जो उसे एक प्रकार से जानवरों से श्रेष्ठ बना देती है। मनुष्य की तरह जानवर कल्पना करने में असमर्थ होते हैं। कल्पना का मार्ग प्रमाणिक भी हो सकता है और मिथ्या भी हो सकता है। चौथा शरीर 28 वर्ष तक विकसित होता है, लेकिन कम लोग ही इसे विकसित कर पाते हैं।

5. आत्म शरीर:👉 यह शरीर बहुत ही महत्व का होता है। इसे अध्यात्म शरीर, spiritual body भी कहते हैं। अगर जीवन का विकास ठीक ढंग से होता रहे, तो यह 35 वर्ष की उम्र तक विकसित हो जाता है। परंतु यह दूर की बात तो है ही, क्योंकि अधिकांश लोगों में चौथा शरीर ही विकसित नही हो पाता है। चौथे शरीर में कुण्डलिनी शक्ति जगे, तो ही पाँचवे शरीर में प्रवेश हो सकता है अन्यथा नहीं। पांचवे शरीर तक पहुँच जाने वाले लोगो को ही हम सही मायने में आत्मावादि कह सकते हैं। इस शरीर में आकर ही आत्मा हमारे लिए केवल एक शब्द मात्र ही नही वरन् एक अनुभव बनती है। भिन्न भिन्न प्रकार की सिद्धियाँ/ दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती है। यहाँ पर एक खतरा यह भी है की पांचवे शरीर पर पहुँच कर आत्मा के स्तित्व का अनुभव तो होता है परंतु परमात्मा अभी भी प्रतीति से दूर रहता है। सिद्धियाँ प्राप्त होने पर अहंकार होने का खतरा रहता है। ऐसा व्यक्ति आत्मा को ही परम स्थिति मान बैठता है। कई योगी इस चरण में ही योग भ्रस्ट हो जाते है और आगे की साधना नही कर पाते हैं।

6. ब्रह्म शरीर:👉 छठा शरीर ब्रह्म शरीर कहलाता है। इसे cosmic body भी कहते हैं। ऐसा व्यक्ति जो आत्मा को पाँचवे शरीर में उपलब्ध करले तथा उसको पुनः खोने को भी राजी हो, केवल वही छठे शरीर में प्रवेश कर सकता है। वह 42 वर्ष की उम्र तक विकसित हो जाना चाहिए।

7. निर्वाण शरीर:👉 सांतवा शरीर 49 वर्ष तक विकसित हो जाना चाहिए। सातवां शरीर ही निर्वाण शरीर कहलाता है। वास्तव में यह कोई शरीर नही है, बल्कि देह शून्यता (bodylessness) की स्थिति है। वहां पर शरीर जैसी कोई स्थिति नहीं रहती है। शून्य ही शेष बचता है शेष सब समाप्त हो जाता है या अन्य शब्दों में निर्वाण हो जाता है, जैसे दिए का बुझना। यहाँ मैं-तू दोनों नही होते। यहाँ परम शून्य है निर्वाण है।

इस प्रकार उपरोक्त सातों शरीरों की स्थितियां है। दूसरे और तीसरे शरीर पर रुकने वालों के लिए जन्म, मृत्यु और जीवन ही सब कुछ है। चौथे शरीर का अनुभव स्वर्ग-नर्क का है। मोक्ष पांचवे शरीर की अवस्था का अनुभव है। छठे शरीर में पहुंचने पर मोक्ष के भी पार ब्रह्म की सम्भावना है। वहां न कोई मुक्त है और न अमुक्त। 'अहम् ब्रह्मास्मि ' (मैं ही ब्रह्म हूँ) की घोषणा छठे शरीर की सम्भावना है, लेकिन अभी एक कदम और बाकी है और वह है की जहाँ न अहम्, न ब्रह्म। जहाँ मैं-तू दोनों नही, परम शून्य। परम निर्वाण की स्थिति है- यही सातवें शरीर की स्थिति है।
.
संकलन
डॉ राहुल श्रीवास्तव
९३०१३६०६१९

Comments

Popular posts from this blog

विचारणीय

                         . *कटु सत्य..* *एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!* *पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!!* *तो आईं तो एक ने कहा-*  *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...* *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली..* *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया...* *दूसरी बोली--"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..*  *अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?* *तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* *लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-*               *क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है,...

शिव रहस्य

 भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा ही क्यों.. ? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। ''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र :  〰️🔸〰️ शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : 〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️ सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत...

भक्ति मार्ग

 _*ईश्वर प्राप्ति के 12 कदम*_   *भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....*   _*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।*_   _*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 8*_   *_भावार्थ :-_ हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।*   *तुलसी दास जी कहते हैं....*   _*"बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।"*_   *1. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस   व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।*   *2. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।*   *3. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।*   *4. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।*   *5. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जा...