जय माँ महाकाली
आज हम आपको महाशक्ति के मुख्य रहस्यों से अवगत करवाएंगे हालांकि यह बहुत गूढ़ विषय है किंतु अध्ययन और मनन करने पर इसे समझा जा सकता है!
महा-शक्ति का रहस्य
विश्व में जो कुछ है, वह व्यापक ब्रह्म है।'तैत्तिरीयोपनिषद्' ने ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि जिसमें सारा विश्व पैदा होता है, पैदा होकर जीता है और जीकर जिसमें लय होता है, उसी का नाम ब्रह्म है।इस बात को समझाते हुए गुरुदेव ने पहले शिष्य को यह बताया कि 'अत्नं ब्रह्मेति व्यजानत' अर्थात् अन्न ब्रह्म है। देह अन्न से पैदा हुआ, अन्न से जीता है और अन्न में लय होता है। अतएव अन्न को ब्रह्म मानो। शिष्य को इस व्याख्या से संतोष न हुआ, तब गुरुजी ने 'प्राणं ब्रह्मेति व्यजानत' कहा अर्थात् प्राण ब्रह्म है। देह प्राण से पैदा हुआ, प्राण से जीता है और प्राण में लय होता है। शिष्य को इस व्याख्या से सन्तोष न हुआ। फिर गुरुजी न 'मन
ब्रह्मेति व्याजानत' बताया अर्थात् मन ब्रह्म है। शिष्य को इस व्याख्या से सन्तोष न हुआ। तब गुरुजी ने 'विज्ञान'
को और पीछे ' आनन्द' को भी ब्रह्म बताया, लेकिन जब इतने सारे ब्रह्म बताये गये, तब हम किसको सचमुच ब्रह्म मानें? ब्रह्म की उक्त व्याख्याओं से हमें सन्तोष नहीं होता।
'माण्डूक्योपनिषद्' ने आत्मा की चार अवस्थायें बताई हैं-१. जाग्रत, २. स्वप्न, ३. सुषुप्ति और४. तुरीय। जाग्रत् और स्वप्न का अनुभव सबको होता है। सुषुप्ति अर्थात् गाढ़ निद्रा। तुरीय का अनुभव सबको नहीं होता। अत: उसे आत्मा की चौथी अवस्था कह कर उसका सारा वर्णन नकार में ही किया है।
जब
आत्मा का यह हाल है, तब ब्रह्म क्या वस्तु है, कैसे समझ में आये?आदि शंकराचार्य अपने शिष्य के साथ जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक पागल हाथी आता दिखाई पड़ा। सबलोग इधर-उधर हो गये। हाथी के निकल जाने के बाद एक शिष्य ने गुरु से पूछा कि आप तो 'सर्वंखल्विदं ब्रह्म' बताते हैं। अतएव हम और हाथी सब ब्रह्म ही हैं। फिर हम सब हाथी को देखकर भाग क्योंगये? शंकराचार्यजी ने कहा कि "हाथी का आना, हमारा देखना और छिपना सभी ब्रह्म था।"इतना सोचने-विचारने के बाद जो कुछ है, ब्रह्म है, यह मानने में नहीं आता। यदि कोई कहे कि 'मैं
ब्रह्म हूँ', तो मानना पड़ेगा कि 'मैं' और 'ब्रह्म' अलग-अलग वस्तु हैं, क्योंकि वस्तु और वस्तु का मालिकदोनों एक नहीं होते। सभी तरह से ब्रह्म का विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि जो कुछ है, वह अकेला ब्रह्मनहीं है, अपितु साथ में कुछ और भी है। वह क्या है, यह जानना चाहिये।जिस द्रव में से नवीन पदार्थ पैदा हो या पैदा हुआ पदार्थ फिर द्रव बनकर अणु-अणु में मिल जाये, उस द्रव का नाम 'तत्त्व' है। उदाहरण के लिये पृथ्वी में एक ही बीज को जल, वायु और अग्नि मिलने से वह अवकाश में प्रस्फुटित होकर पेड बनता है और पेड में से रुई और कपड़ा भी बनता है। वह कपड़ा यदि जलगया, तो कहा जायेगा कि बीज ने जो रूपक धारण किया था. वह अग्नि से जलकर तत्त्व तत्त्व से मिल गया।तत्त्व अर्थात् भू, जल, अग्नि, वायु और अवकाश। प्रत्येक तत्त्व में दूसरे चार तत्त्वों की कुछ-न-कुछमिलावट विद्यमान है। त्त्व अणु में से पैदा होते हैं। अणु में भयंकर शक्ति है। अणु-बम कितनी हानि कर सकता है, उससे लोग अपरिचित नहीं हैं। अणु में छिपी हुई भयंकर शक्ति क्या है, उसे जानना चाहिये।
विश्व अनन्त है और अनन्त होने से प्रत्येक बिन्दु मध्य बिन्दु है। जो चीज शान्त है, उसका मध्यं बिन्दु एक ही होगा। यदि अनन्त का मध्य बिन्दु एकं ही माना जाये, तो अनन्त शांत हो जायेगा। अतएव अनन्त का प्रत्येक बिन्दु चिद्-बिन्दु है। उसमें जीवन्त चिद्-शक्ति है। उस प्रत्येक बिन्दु या अणु में भयंकर शक्ति है। तो फिर उस शक्ति को ही विश्व की आदि-शक्ति क्यों न माना जाये ?
'कठोपनिषद्' में यम ने नचिकेता को बताया कि सूर्य विश्व की आँखें हैं, लेकिन आँख में रोग होने से सूर्य में रोग नहीं होता। इसी तरह प्राणी मात्र की अन्तरात्मा एक होते हुए भी व्यक्तिगत दुःख से आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता अर्थात् आत्मा को कुछ भी कष्ट नहीं होता। यम ने ब्रह्म का भाव न बताकर सूर्य में विद्यमान शक्ति का भाव बताया। सूर्य की गुरुत्वाकर्षण-शक्ति से नवग्रह नियमानुसार सूर्य के चारों ओर बराबर घूम रहे हैं। तब सोच सकते हैं कि सूर्य में कितनी शक्ति है। सूर्य में जो शक्ति हैं, वह अणु में भी है क्योंकि सूर्य अणु से बनता है। 'ईशावास्योपनिषद्' कहता है कि जो आदमी केवल विद्या की उपासना करता है, वह अन्धकार में प्रवेश करता है और जो केवल अविद्या की उपासना करता है, वह भी अन्धकार में पड़ता है। जैसे केवल विद्या या अविद्या को मानने से अपना काम नहीं चलता, वैसे ही न अकेले ब्रह्म को मानने से हमारा काम चलेगा, न अकेली शक्ति को मानने से यह सब सोचने पर मानना पड़ेगा कि विश्व में दो चीजें होनी चाहिये-एक व्यापक ब्रह्म और दूसरी शक्ति । व्यापक ब्रह्म शव है और बाकी जो कुछ है, वह शक्ति है। उस शक्ति को कुछ भी नाम दीजिये। चाहे चिद्शक्ति कहो या आदिशक्ति कहो या विश्व की परमेश्वरी ही क्यों न कह डालो।.
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