श्री रामचरितमानसमाहात्म्य
गतांक से आगे..........
पिछले लेख में हमने जाना था कि भगवान शिव जी ने माता पार्वती को कैसे श्रीरामकथा सुनाई और वहां से रामकथा आमजनमानस के बीच में भूतभावनभगवान शिवजी से माता पार्वती वहां से उसे कागभुशुण्डि जी वहां से मुनि याज्ञवल्क्य वहां से मुनि भरद्वाज और मुनी भरद्वाज से आम जनमानस के बीच में वह कथा पहुंची जो कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने गुरु जी से सूकरखेत में सुनी थी।
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गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्री रामचंद्र और उनकी कथा के महत्व का उल्लेख करते हुए श्री रामचरितमानस में लिखते हैं।
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पूँछिहु राम कथा अति पावनि।
सुक सनकादि संभु मन भावनि॥
सत संगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दंड भरि एकउ बारा॥
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राम के नाम में इतनी शक्ति है कि उनके नाम का जाप करते हुए ऋषि बाल्मीकि और संत तुलसीदास अज्ञानी से महान ज्ञानी बने। उसके बाद उन्होंने रामायण और श्रीरामचरितमानस ग्रंथ की रचना की। शबरी ने भगवान की इतनी भक्ति की, कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम स्वयं मिलने के लिए शबरी की कुटिया पर गए। राम का नाम सत्य है, वह मनुष्य को सत्य के मार्ग पर ले जाता है।
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भगवान राम के जन्म के पूर्व इस नाम का उपयोग ईश्वर के लिए होता था अर्थात ब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर आदि की जगह पहले ‘राम’ शब्द का उपयोग होता था, इसीलिए इस शब्द की महिमा और बढ़ जाती है तभी तो कहते हैं कि राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। राम’ शब्द की ध्वनि हमारे जीवन के सभी दुखों को मिटाने की ताकत रखती है। कलयुग में सब कुछ दुर्लभ है, लेकिन राम का नाम सुलभ है। वर्तमान में ध्यान, तप, साधना और अटूट भक्ति करने से भी श्रेष्ठ राम का नाम जपना है।
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श्रीरामचरितमानस में बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि इस संसार में वही सर्वज्ञ है और वही समस्त गुणों की खदान है वही एकमात्र के ज्ञाता है जिस का मन श्री रामचंद्र जी के चरणों में रमता इसका सीधा सा अर्थ है कि जिसने अपने जीवन का दे और उद्देश्य ही भगवान श्री रामचंद्र जी के चरणों की भक्ति को बना लिया वह इस संसार में सबसे बड़ा ज्ञानी या ज्ञाता माना जाएगा और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यदि देखना चाहे तो श्री हनुमान जी महाराज हैं , जिनके लिए श्री सुंदरकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं "ज्ञाननामअग्रगण्यम्"। भूत भावन भगवान शंकर जिस राम नाम को जपते रहते हैं और जिस राम नाम को रमने में भूत भावन भगवान शंकर की खुशी की सीमा नहीं रहती वह राम नाम कलयुग में समस्त संकटों के निवारण का आधार है।
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सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता।
राम चरन जा कर मन राता॥
(जिसका मन श्री रामजी के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है॥)
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नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।
जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
(जो छल छो़ड़कर श्री रघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम् बुद्धिमान है। उसी ने वेदों के सिद्धांत को भली-भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर है॥)
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धन्य देस सो जहँ सुरसरी।
धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥
धन्य सो भूपु नीति जो करई।
धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥
(वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥)
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सो धन धन्य प्रथम गति जाकी।
धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा।
धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥
(वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो॥(धन की तीन गतियाँ होती हैं- दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है।)
सो कुल धन्य उमा सुनु
जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं
नर उपज बिनीत॥
(हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥)
मति अनुरूप कथा मैं भाषी।
जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥
तव मन प्रीति देखि अधिकाई।
तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥
(मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसको छिपाकर रखा था। जब तुम्हारे मन में प्रेम की अधिकता देखी तब मैंने श्री रघुनाथजी की यह कथा तुमको सुनाई॥)
यह न कहिअ सठही हठसीलहि।
जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥
कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि।
जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥
(यह कथा उनसे न कहनी चाहिए जो शठ (धूर्त) हों, हठी स्वभाव के हों और श्री हरि की लीला को मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी को, जो चराचर के स्वामी श्री रामजी को नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिए॥)
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ।
सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥
रामकथा के तेइ अधिकारी।
जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी॥
(ब्राह्मणों के द्रोही को, यदि वह देवराज (इन्द्र) के समान ऐश्वर्यवान् राजा भी हो, तब भी यह कथा न सुनानी चाहिए। श्री रामकथा के अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यंत प्रिय है॥)
गुर पद प्रीति नीति रत जेई।
द्विज सेवक अधिकारी तेई॥
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई।
जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥
(जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणों के सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं और उसको तो यह कथा बहुत ही सुख देने वाली है, जिसको श्री रघुनाथजी प्राण के समान प्यारे हैं॥)
राम चरन रति जो चह
अथवा पद निर्बान।
भाव सहित सो यह कथा
करउ श्रवन पुट पान॥
(जो श्री रामजी के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथा रूपी अमृत को प्रेमपूर्वक अपने कान रूपी दोने से पिए॥)
राम कथा गिरिजा मैं बरनी।
कलि मल समनि मनोमल हरनी॥
संसृति रोग सजीवन मूरी।
राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥
( हे गिरिजे! मैंने कलियुग के पापों का नाश करने वाली और मन के मल को दूर करने वाली रामकथा का वर्णन किया। यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण) रूपी रोग के (नाश के) लिए संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान पुरुष ऐसा कहते हैं॥)
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना।
रघुपति भगति केर पंथाना॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई।
पाउँ देइ एहिं मारग सोई॥
(इसमें सात सुंदर सीढ़ियाँ हैं, जो श्री रघुनाथजी की भक्ति को प्राप्त करने के मार्ग हैं। जिस पर श्री हरि की अत्यंत कृपा होती है, वही इस मार्ग पर पैर रखता है॥)
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मन कामना सिद्धि नर पावा।
जे यह कथा कपट तजि गावा॥
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं।
ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥
(जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मनःकामना की सिद्धि पा लेते हैं, जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसार रूपी समुद्र को गो के खुर से बने हुए गड्ढे की भाँति पार कर जाते हैं॥)
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सुनि सब कथा हृदय अति भाई।
गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा।
राम चरन उपजेउ नव नेहा॥
(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) सब कथा सुनकर श्री पार्वतीजी के हृदय को बहुत ही प्रिय लगी और वे सुंदर वाणी बोलीं- स्वामी की कृपा से मेरा संदेह जाता रहा और श्री रामजी के चरणों में नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया॥)
मैं कृतकृत्य भइउँ अब
तव प्रसाद बिस्वेस।
उपजी राम भगति दृढ़
बीते सकल कलेस॥
(हे विश्वनाथ! आपकी कृपा से अब मैं कृतार्थ हो गई। मुझमें दृढ़ राम भक्ति उत्पन्न हो गई और मेरे संपूर्ण क्लेश बीत गए (नष्ट हो गए)॥)
यह सुभ संभु उमा संबादा।
सुख संपादन समन बिषादा॥
भव भंजन गंजन संदेहा।
जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥
(शम्भु-उमा का यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करने वाला और शोक का नाश करने वाला है। जन्म-मरण का अंत करने वाला, संदेहों का नाश करने वाला, भक्तों को आनंद देने वाला और संत पुरुषों को प्रिय है॥)
राम उपासक जे जग माहीं।
एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाहीं॥
रघुपति कृपाँ जथामति गावा।
मैं यह पावन चरित सुहावा॥
(जगत् में जो (जितने भी) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथा के समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्री रघुनाथजी की कृपा से मैंने यह सुंदर और पवित्र करने वाला चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है॥)
एहिं कलिकाल न साधन दूजा।
जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि।
संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥
(तुलसीदासजी कहते हैं-) इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥)
जासु पतित पावन बड़ बाना।
गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई।
राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥
(पतितों को पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है, ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं- रे मन! कुटिलता त्याग कर उन्हीं को भज। श्री राम को भजने से किसने परम गति नहीं पाई?॥)
पाई न केहिं गति पतित पावन
राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजामिल ब्याध गीध
गजादि खल तारे घना॥
(आभीर जमन किरात खस
स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि
पावन होहिं राम नमामि ते॥
(अरे मूर्ख मन! सुन, पतितों को भी पावन करने वाले श्री राम को भजकर किसने परमगति नहीं पाई? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत से दुष्टों को उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच (चाण्डाल) आदि जो अत्यंत पाप रूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्री रामजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥)
रघुबंस भूषन चरित यह
नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलि मल मनोमल धोइ
बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥
सत पंच चौपाईं मनोहर
जानि जो नर उर धरै।
दारुन अबिद्या पंच जनित
बिकार श्री रघुबर हरै॥
(जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्री रामजी का यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्री रामजी के परम धाम को चले जाते हैं। (अधिक क्या) जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयों को भी मनोहर जानकर (अथवा रामायण की चौपाइयों को श्रेष्ठ पंच (कर्तव्याकर्तव्य का सच्चा निर्णायक) जानकर उनको हृदय में धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकार की अविद्याओं से उत्पन्न विकारों को श्री रामजी हरण कर लेते हैं, (अर्थात् सारे रामचरित्र की तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयों को भी समझकर उनका अर्थ हृदय में धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्री रामचंद्रजी हर लेते हैं)॥)
सुंदर सुजान कृपा निधान
अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित
निर्बानप्रद सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते
मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु
राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥
(परम) सुंदर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्री रामचंद्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करने वाला (सुहृद्) और मोक्ष देने वाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपा से मंदबुद्धि तुलसीदास ने भी परम शांति प्राप्त कर ली, उन श्री रामजी के समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं॥)
मो सम दीन न दीन हित
तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि
हरहु बिषम भव भीर॥
(हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिए॥)
कामिहि नारि पिआरि जिमि
लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय
लागहु मोहि राम॥
(जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। हे रामजी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥)
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं
सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं
प्राप्तयै तु रामायणम्।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं
स्वान्तस्तमः शान्तये।
भाषाबद्धमिदं चकार
तुलसीदासस्तथा मानसम्॥1॥
श्रेष्ठ कवि भगवान् श्री शंकरजी ने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायण की, श्री रामजी के चरणकमलों में नित्य-निरंतर (अनन्य) भक्ति प्राप्त होने के लिए रचना की थी, उस मानस-रामायण को श्री रघुनाथजी के नाम में निरत मानकर अपने अंतःकरण के अंधकार को मिटाने के लिए तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषाबद्ध किया॥
पुण्यं पापहरं सदा
शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं।
मायामोहमलापहं सुविमलं
प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं
भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतंगघोरकिरणै-
र्दह्यन्ति नो मानवाः॥
यह श्री रामचरित मानस पुण्य रूप, पापों का हरण करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया मोह और मल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानसरोवर में गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते॥
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भगवान श्री रामचंद्र के चरणों की भक्ति का यह संवाद और श्री रामचरितमानस के महत्त्व के प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्री रामचरितमानस के उत्तरकांड से लिया गया है कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं है कि कलयुग में समस्त पापों के दमन और शमन के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचंद्र जी के चरणों की भक्ति को ही श्रेष्ठतम बताया है।
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शेष अगले लेख में .............
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प्रभु के चरणों का सेवक
डॉ राहुल श्रीवास्तव
930 136 0 619
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(प्रभु चरणों के दास के रूप में मैं मेरी अल्प बुद्धि के आधार पर श्री रामचरितमानस जी की महिमा शब्दों में संजीवनी गायक प्रयास कर रहा हूं कोशिश कर रहा हूं और भगवान के श्री चरणों की भक्ति भगवान को समर्पित कर लिख रहा हूं यदि इस लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि हो तो भगवान श्री रामचंद्र जी मुझे अज्ञानी समझकर क्षमा करें आप सभी सुधि पाठक गण से अनुरोध है कि यदि आपको इस लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि दीख पड़े तो ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में जाकर आप अपना प्रश्न या उसी के बाबत लिख दें जिससे कि हम उस गलती का सुधार कर सकें । आप सभी लोगों के सुझाव और मार्गदर्शन हमेशा अपेक्षित रहेंगे जय श्री राम
जय जय श्री राम।।)
गतांक से आगे..........
पिछले लेख में हमने जाना था कि भगवान शिव जी ने माता पार्वती को कैसे श्रीरामकथा सुनाई और वहां से रामकथा आमजनमानस के बीच में भूतभावनभगवान शिवजी से माता पार्वती वहां से उसे कागभुशुण्डि जी वहां से मुनि याज्ञवल्क्य वहां से मुनि भरद्वाज और मुनी भरद्वाज से आम जनमानस के बीच में वह कथा पहुंची जो कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने गुरु जी से सूकरखेत में सुनी थी।
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गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्री रामचंद्र और उनकी कथा के महत्व का उल्लेख करते हुए श्री रामचरितमानस में लिखते हैं।
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पूँछिहु राम कथा अति पावनि।
सुक सनकादि संभु मन भावनि॥
सत संगति दुर्लभ संसारा।
निमिष दंड भरि एकउ बारा॥
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राम के नाम में इतनी शक्ति है कि उनके नाम का जाप करते हुए ऋषि बाल्मीकि और संत तुलसीदास अज्ञानी से महान ज्ञानी बने। उसके बाद उन्होंने रामायण और श्रीरामचरितमानस ग्रंथ की रचना की। शबरी ने भगवान की इतनी भक्ति की, कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम स्वयं मिलने के लिए शबरी की कुटिया पर गए। राम का नाम सत्य है, वह मनुष्य को सत्य के मार्ग पर ले जाता है।
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भगवान राम के जन्म के पूर्व इस नाम का उपयोग ईश्वर के लिए होता था अर्थात ब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर आदि की जगह पहले ‘राम’ शब्द का उपयोग होता था, इसीलिए इस शब्द की महिमा और बढ़ जाती है तभी तो कहते हैं कि राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। राम’ शब्द की ध्वनि हमारे जीवन के सभी दुखों को मिटाने की ताकत रखती है। कलयुग में सब कुछ दुर्लभ है, लेकिन राम का नाम सुलभ है। वर्तमान में ध्यान, तप, साधना और अटूट भक्ति करने से भी श्रेष्ठ राम का नाम जपना है।
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श्रीरामचरितमानस में बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं कि इस संसार में वही सर्वज्ञ है और वही समस्त गुणों की खदान है वही एकमात्र के ज्ञाता है जिस का मन श्री रामचंद्र जी के चरणों में रमता इसका सीधा सा अर्थ है कि जिसने अपने जीवन का दे और उद्देश्य ही भगवान श्री रामचंद्र जी के चरणों की भक्ति को बना लिया वह इस संसार में सबसे बड़ा ज्ञानी या ज्ञाता माना जाएगा और इसका प्रत्यक्ष उदाहरण यदि देखना चाहे तो श्री हनुमान जी महाराज हैं , जिनके लिए श्री सुंदरकांड में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं "ज्ञाननामअग्रगण्यम्"। भूत भावन भगवान शंकर जिस राम नाम को जपते रहते हैं और जिस राम नाम को रमने में भूत भावन भगवान शंकर की खुशी की सीमा नहीं रहती वह राम नाम कलयुग में समस्त संकटों के निवारण का आधार है।
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सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता।
सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता।
राम चरन जा कर मन राता॥
(जिसका मन श्री रामजी के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है॥)
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नीति निपुन सोइ परम सयाना।
श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा।
जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
(जो छल छो़ड़कर श्री रघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम् बुद्धिमान है। उसी ने वेदों के सिद्धांत को भली-भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर है॥)
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धन्य देस सो जहँ सुरसरी।
धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥
धन्य सो भूपु नीति जो करई।
धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥
(वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥)
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सो धन धन्य प्रथम गति जाकी।
धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा।
धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥
(वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो॥(धन की तीन गतियाँ होती हैं- दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है।)
सो कुल धन्य उमा सुनु
जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं
नर उपज बिनीत॥
(हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥)
मति अनुरूप कथा मैं भाषी।
जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी॥
तव मन प्रीति देखि अधिकाई।
तब मैं रघुपति कथा सुनाई॥
(मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसको छिपाकर रखा था। जब तुम्हारे मन में प्रेम की अधिकता देखी तब मैंने श्री रघुनाथजी की यह कथा तुमको सुनाई॥)
यह न कहिअ सठही हठसीलहि।
जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि॥
कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि।
जो न भजइ सचराचर स्वामिहि॥
(यह कथा उनसे न कहनी चाहिए जो शठ (धूर्त) हों, हठी स्वभाव के हों और श्री हरि की लीला को मन लगाकर न सुनते हों। लोभी, क्रोधी और कामी को, जो चराचर के स्वामी श्री रामजी को नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिए॥)
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ।
सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ॥
रामकथा के तेइ अधिकारी।
जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी॥
(ब्राह्मणों के द्रोही को, यदि वह देवराज (इन्द्र) के समान ऐश्वर्यवान् राजा भी हो, तब भी यह कथा न सुनानी चाहिए। श्री रामकथा के अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यंत प्रिय है॥)
गुर पद प्रीति नीति रत जेई।
द्विज सेवक अधिकारी तेई॥
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई।
जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई॥
(जिनकी गुरु के चरणों में प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणों के सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं और उसको तो यह कथा बहुत ही सुख देने वाली है, जिसको श्री रघुनाथजी प्राण के समान प्यारे हैं॥)
राम चरन रति जो चह
अथवा पद निर्बान।
भाव सहित सो यह कथा
करउ श्रवन पुट पान॥
(जो श्री रामजी के चरणों में प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथा रूपी अमृत को प्रेमपूर्वक अपने कान रूपी दोने से पिए॥)
राम कथा गिरिजा मैं बरनी।
कलि मल समनि मनोमल हरनी॥
संसृति रोग सजीवन मूरी।
राम कथा गावहिं श्रुति सूरी॥
( हे गिरिजे! मैंने कलियुग के पापों का नाश करने वाली और मन के मल को दूर करने वाली रामकथा का वर्णन किया। यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण) रूपी रोग के (नाश के) लिए संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान पुरुष ऐसा कहते हैं॥)
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना।
रघुपति भगति केर पंथाना॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई।
पाउँ देइ एहिं मारग सोई॥
(इसमें सात सुंदर सीढ़ियाँ हैं, जो श्री रघुनाथजी की भक्ति को प्राप्त करने के मार्ग हैं। जिस पर श्री हरि की अत्यंत कृपा होती है, वही इस मार्ग पर पैर रखता है॥)
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मन कामना सिद्धि नर पावा।
जे यह कथा कपट तजि गावा॥
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं।
ते गोपद इव भवनिधि तरहीं॥
(जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मनःकामना की सिद्धि पा लेते हैं, जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसार रूपी समुद्र को गो के खुर से बने हुए गड्ढे की भाँति पार कर जाते हैं॥)
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सुनि सब कथा हृदय अति भाई।
गिरिजा बोली गिरा सुहाई॥
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा।
राम चरन उपजेउ नव नेहा॥
(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) सब कथा सुनकर श्री पार्वतीजी के हृदय को बहुत ही प्रिय लगी और वे सुंदर वाणी बोलीं- स्वामी की कृपा से मेरा संदेह जाता रहा और श्री रामजी के चरणों में नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया॥)
मैं कृतकृत्य भइउँ अब
तव प्रसाद बिस्वेस।
उपजी राम भगति दृढ़
बीते सकल कलेस॥
(हे विश्वनाथ! आपकी कृपा से अब मैं कृतार्थ हो गई। मुझमें दृढ़ राम भक्ति उत्पन्न हो गई और मेरे संपूर्ण क्लेश बीत गए (नष्ट हो गए)॥)
यह सुभ संभु उमा संबादा।
सुख संपादन समन बिषादा॥
भव भंजन गंजन संदेहा।
जन रंजन सज्जन प्रिय एहा॥
(शम्भु-उमा का यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करने वाला और शोक का नाश करने वाला है। जन्म-मरण का अंत करने वाला, संदेहों का नाश करने वाला, भक्तों को आनंद देने वाला और संत पुरुषों को प्रिय है॥)
राम उपासक जे जग माहीं।
एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाहीं॥
रघुपति कृपाँ जथामति गावा।
मैं यह पावन चरित सुहावा॥
(जगत् में जो (जितने भी) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथा के समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्री रघुनाथजी की कृपा से मैंने यह सुंदर और पवित्र करने वाला चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है॥)
एहिं कलिकाल न साधन दूजा।
जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा॥
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि।
संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि॥
(तुलसीदासजी कहते हैं-) इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्री रामजी का ही स्मरण करना, श्री रामजी का ही गुण गाना और निरंतर श्री रामजी के ही गुणसमूहों को सुनना चाहिए॥)
जासु पतित पावन बड़ बाना।
गावहिं कबि श्रुति संत पुराना॥
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई।
राम भजें गति केहिं नहिं पाई॥
(पतितों को पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है, ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं- रे मन! कुटिलता त्याग कर उन्हीं को भज। श्री राम को भजने से किसने परम गति नहीं पाई?॥)
पाई न केहिं गति पतित पावन
राम भजि सुनु सठ मना।
गनिका अजामिल ब्याध गीध
गजादि खल तारे घना॥
(आभीर जमन किरात खस
स्वपचादि अति अघरूप जे।
कहि नाम बारक तेपि
पावन होहिं राम नमामि ते॥
(अरे मूर्ख मन! सुन, पतितों को भी पावन करने वाले श्री राम को भजकर किसने परमगति नहीं पाई? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत से दुष्टों को उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच (चाण्डाल) आदि जो अत्यंत पाप रूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्री रामजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥)
रघुबंस भूषन चरित यह
नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
कलि मल मनोमल धोइ
बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं॥
सत पंच चौपाईं मनोहर
जानि जो नर उर धरै।
दारुन अबिद्या पंच जनित
बिकार श्री रघुबर हरै॥
(जो मनुष्य रघुवंश के भूषण श्री रामजी का यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्री रामजी के परम धाम को चले जाते हैं। (अधिक क्या) जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयों को भी मनोहर जानकर (अथवा रामायण की चौपाइयों को श्रेष्ठ पंच (कर्तव्याकर्तव्य का सच्चा निर्णायक) जानकर उनको हृदय में धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकार की अविद्याओं से उत्पन्न विकारों को श्री रामजी हरण कर लेते हैं, (अर्थात् सारे रामचरित्र की तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयों को भी समझकर उनका अर्थ हृदय में धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्री रामचंद्रजी हर लेते हैं)॥)
सुंदर सुजान कृपा निधान
अनाथ पर कर प्रीति जो।
सो एक राम अकाम हित
निर्बानप्रद सम आन को॥
जाकी कृपा लवलेस ते
मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु
राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥
(परम) सुंदर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनाथों पर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्री रामचंद्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करने वाला (सुहृद्) और मोक्ष देने वाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपा से मंदबुद्धि तुलसीदास ने भी परम शांति प्राप्त कर ली, उन श्री रामजी के समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं॥)
मो सम दीन न दीन हित
तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि
हरहु बिषम भव भीर॥
(हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनों का हित करने वाला नहीं है। ऐसा विचार कर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण के भयानक दुःख का हरण कर लीजिए॥)
कामिहि नारि पिआरि जिमि
लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय
लागहु मोहि राम॥
(जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और लोभी को जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी। हे रामजी! आप निरंतर मुझे प्रिय लगिए॥)
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं
सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं
प्राप्तयै तु रामायणम्।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं
स्वान्तस्तमः शान्तये।
भाषाबद्धमिदं चकार
तुलसीदासस्तथा मानसम्॥1॥
श्रेष्ठ कवि भगवान् श्री शंकरजी ने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायण की, श्री रामजी के चरणकमलों में नित्य-निरंतर (अनन्य) भक्ति प्राप्त होने के लिए रचना की थी, उस मानस-रामायण को श्री रघुनाथजी के नाम में निरत मानकर अपने अंतःकरण के अंधकार को मिटाने के लिए तुलसीदास ने इस मानस के रूप में भाषाबद्ध किया॥
पुण्यं पापहरं सदा
शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं।
मायामोहमलापहं सुविमलं
प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं
भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतंगघोरकिरणै-
र्दह्यन्ति नो मानवाः॥
यह श्री रामचरित मानस पुण्य रूप, पापों का हरण करने वाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्ति को देने वाला, माया मोह और मल का नाश करने वाला, परम निर्मल प्रेम रूपी जल से परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानसरोवर में गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्य की अति प्रचण्ड किरणों से नहीं जलते॥
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भगवान श्री रामचंद्र के चरणों की भक्ति का यह संवाद और श्री रामचरितमानस के महत्त्व के प्रसंग को गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्री रामचरितमानस के उत्तरकांड से लिया गया है कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं है कि कलयुग में समस्त पापों के दमन और शमन के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचंद्र जी के चरणों की भक्ति को ही श्रेष्ठतम बताया है।
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शेष अगले लेख में .............
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प्रभु के चरणों का सेवक
डॉ राहुल श्रीवास्तव
930 136 0 619
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(प्रभु चरणों के दास के रूप में मैं मेरी अल्प बुद्धि के आधार पर श्री रामचरितमानस जी की महिमा शब्दों में संजीवनी गायक प्रयास कर रहा हूं कोशिश कर रहा हूं और भगवान के श्री चरणों की भक्ति भगवान को समर्पित कर लिख रहा हूं यदि इस लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि हो तो भगवान श्री रामचंद्र जी मुझे अज्ञानी समझकर क्षमा करें आप सभी सुधि पाठक गण से अनुरोध है कि यदि आपको इस लेख में किसी प्रकार की कोई त्रुटि दीख पड़े तो ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में जाकर आप अपना प्रश्न या उसी के बाबत लिख दें जिससे कि हम उस गलती का सुधार कर सकें । आप सभी लोगों के सुझाव और मार्गदर्शन हमेशा अपेक्षित रहेंगे जय श्री राम
जय जय श्री राम।।)


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