दान के विषय मे महत्त्वपूर्ण जानकारी
दाता प्रतिगृहीता च शुद्धि र्देयं च धर्मयुक् ।
देशकालौ च दानानाम ङ्गन्येतानि षड् विदुः ॥
दाता, लेनेवाला, पावित्र्य, देय वस्तु, देश, और काल – ये छे दान के अंग हैं ।
दानेन भूतानि वशी भवन्ति दानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम् ।
परोऽपि बन्धुत्वभुपैति दानैर् दानं हि सर्वेव्यसनानि हन्ति ॥
दान से सभी प्राणी वश होते है; दान से बैर खत्म हो जाता है । दान से शत्रु भी भाई बन जाता है। दान से ही सभी संकट दूर होते हैं ।
बोधयन्ति न याचन्ते भिक्षाद्वारा गृहे गृहे ।
दीयतां दीयतां नित्यमदातुः फलमीदृशम् ॥
घर घर जानेवाले याचक, भिक्षा नहीं मांग रहे बल्कि यह उपदेश दे रहे हैं कि नित्य दान देते रहो, (अन्यथा) अदातृत्व का परिणाम हम को देख लो !
अनुकूले विधौ देयं एतः पूरयिता हरिः ।
प्रतिकूले बिधौ देयं यतः सर्वं हरिष्यति ॥
समय अनुकुल हो तब दान देना चाहिए क्यों कि सब देनेवाला भगवान है । समय प्रतिकुल हो तब भी देना चाहिए क्यों कि सब हरण करनेवाला भी भगवान ही है।
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दान के विषय मे महत्त्वपूर्ण जानकारी
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दान एक ऐसा कर्म है, जो इस धरा पर सारे धर्म के लोग मानते है। विविध धर्मावलम्बी अपने अपने धर्म और मत अनुसार दान करते है, इसका नाम अलग अलग धर्म, जाती, भाषा में अलग अलग है, पर धर्म से साध्य, अपनी अपनी सोंच अनुसार हर मतावलम्बी के लिए एक सामान होता है।
इस कर्म को सनातन धर्म में दान, इस्लाम में जकात और ईसाईयों में चैरिटी कहते है।
छान्दोग्य उपनिषद अनुसार धर्म के तीन घटक है, त्याग, ज्ञानार्जन और दान ।
दान : हमारे वैदिक (सनातन) धर्म में दान की प्रथा वैदिक समय से ही चली आ रही है, ऋग वेद में भी दान का उल्लेख मिलता है।
ऋगवेद में दान तीन प्रकार के बताये है, १. सात्विक दान, २. राजसी दान और ३. तामसिक दान ।
सात्विक दान
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शुभ समय, तीर्थ स्थल और वेदज्ञ को बिना किसी अभिलाषा और आकांक्षा के दिया हुआ दान , सात्विक कहलाता है, समय काल के बदलाव को देखते हुए, वर्तमान में शुभ समय, तीर्थ स्थल , या स्वयं के निवास स्थल पर वेदज्ञ या किसी जरूरतमंद योग्य व्यक्ति को बिना किसी अभिलाषा और आकांक्षा के दिया हुआ दान भी सात्विक कहलाता है।
राजसिक दान
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किसी कारण, अपनी दुविधाओं को टालने के लिए , कुछ पाने की चाह में किया हुआ दान, या फिर नाम के लिए, या जग दिखावे के लिए किया हुआ दान, चाहे किसी को भी दिया गया हो राजसिक दान की श्रेणी में आता है।
तामसिक दान
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असमय , अवांछित, अयोग्य को अभद्रता से दिया हुआ दान तामसिक दान कहलाता है।
भगवद्गीता १७ वे अध्याय २८वें श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है कि बिना श्रद्धा यज्ञ में दी हुई आहुति या बिना श्रद्धा दीया गया दान या बिना श्रद्धा लिया गया दान फलित नहीं होते।
तैत्तरीय उपनिषद अनुसार मन की गहराइयों से प्रफुलीत हो श्रद्धावान होते हुए दान देना चाहिए।
ऐसे तो दान हर वस्तु का हो सकता है, पर हम इन सबको कुछ इस तरह कह सकते है ।
१. द्रव्य दान
२. धातु दान
३. भूदान
४. नित्य उपयोग में आने वाली वास्तु का दान
५. गृहस्थ जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं का दान
६ .अनाज का दान
७. गौ दान
८. अन्न दान
९. अभय / क्षमा दान
१०. जीवन दान
११. कन्या दान
१२. विद्या / ज्ञान दान
दान में त्याग की भावना होती है. दान दी हुई वस्तु पर अपना कोई अधिकार नहीं होता, जबकि सौंपी हुई वस्तु पर अपना अधिकार बना रहता है, ऐसे ही कन्या दान में विवाह के समय पवित्र अग्नि की साक्षी में वर से कन्या की पूर्ण देखभाल का वचन लेकर कन्या का दान करने पर कन्या पर अपना, मातृ परिवार का , अधिकार नहीं रहता पर अपनत्व की भावना, ममत्व का लगाव बना रहता है।
दूसरे दानो में दान लेने वाले और दान देने वाले के दान लेने और देने का बाद कोई सम्बन्ध कोई व्यवहार नहीं रहता. पर कन्या दान में कन्या दान के पश्चात दोनों परिवारों में और कन्या की अगली दो पीढ़ियों तक सम्बन्ध बना रहता है।
१. द्रव्य दान
२. धातु दान
३. भूदान
४. नित्य उपयोग में आने वाली वास्तु का दान
५. गृहस्थ जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं का दान
६. अनाज का दान
७. गौ दान
इन दानो को अपनी अपनी सामर्थय अनुसार देना बड़ा आसान और सरल होता है, इस में दान ग्रहण करने वाले को और उसके परिवार को सामयिक तौर पर संतृप्ति मिल सकती है,
८. अन्न दान : इस दान में सिर्फ ग्रहण कर्ता की उस समय की भूख से संतुष्टि मिलती है.
९. अभय / क्षमा दान इस दान में दानग्रहणकर्ता , शांतिपूर्वक बिना किसी भय , संकोच और ग्लानि के जी सकता है. पर यही दान देना सबसे कठिन है, इस दान को देने में कही कोई आर्थिक हानि नहीं, हर कोई देने के काबिल होता है, पर यह दान कोई देता नहीं है।
१०. जीवन दान , यह दान देने का अधिकार हर एक को नहीं, यह दान सर्व जगत नियन्ता भगवान दे सकते है, या राजा , शासक या राष्ट्र अध्यक्ष ही दे सकते है
११. कन्या दान , इस संसार चक्र के चलने के लिए यह दान अति महत्वपूर्ण है, कन्या दान ग्रहण करने वाले के कुल की अभिवृद्धि इस दान के ग्रहण करने से ही होती है, दो कुलों के सम्मान का प्रतिक यह दान है. दान करने वाले माता पिता अपने जिगर के टुकड़े को एक अनजान के हाथ दान में सौपते है, इस दान को ग्रहण करने वाले के घर की सारि जिम्मेदारी सँभालते हुए दोनों घरों की मान , मर्यादा को संजोए रखती है, इतर धर्मों में कन्यादान की प्रथा नहीं है, अपने अपने याने कन्या को स्वीकार करने वाला और स्वयं कन्या , या उनके अभिभावक या माता पिता के आपसी विचारों के मेल , अनुसार सौपने का रिवाज़ है, जिसकी परिणीति का उल्लेख यहाँ करना उचित नहीं.
१२. विद्या दान / ज्ञान दान: मेरे विचार में सबसे महत्वपूर्ण दान विद्या दान या ज्ञान दान है, इस दान को ग्रहण करने वाला पुरे परिवार का निर्वाह , और स्वयं के साथ साथ परिवार के आत्मसम्मान की रक्षा कर सकता है, सिर्फ विद्या और ज्ञान से धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है।
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अनादरो विलम्बश्च वै मुख्यं निष्ठुरं वचः ।
पश्चात्तापश्च पञ्चापि दानस्य दूषणानि च ॥
(तिरष्कार, देने में विलंब, मुँह फेरना, निष्ठुर वचन, और देने के बाद पश्चाताप – ये पाँच दान के दूषण हैं ।)
यद् दत्त्वा तप्यते पश्चादपात्रेभ्यस्तथा च यत् ।
अश्रद्धया च यद्दानं दाननाशास्त्रयः स्वमी ॥
(देने के बाद पश्चात्ताप होना, अपात्र को देना, और श्रद्धारहित देना – इनसे दान नष्ट हो जाता है ।)
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अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
(जो दान बिना सत्कार, तिरष्कारपूर्वक, अयोग्य देश-काल में या कुपात्र को दिया जाता है, वह तामस दान कहलाता है ।)
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥
(जो दान क्लेश से, प्रत्युपकार की भावना से, या फल मिलने की अपेक्षा से दिया जाता है, वह राजस दान कहा गया है ।)
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कुपात्र दानात् च भवेत् दरिद्रो दारिद्र्य दोषेण करोति पापम् ।
पापप्रभावात् नरकं प्रयाति पुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी ॥
(कुपात्र को दान देने से दरिद्री बनता है । दारिद्र्य दोष से पाप होता है । पाप के प्रभाव से नरक में जाता है; फिर से दरिद्री और फिर से पाप होता है ।)
सुपात्रदानात् च भवेत् धनाढ्यो धनप्रभावेण करोति पुण्यम् ।
पुण्यप्रभावात् सुरलोकवासी पुनर्धनाढ्यः पुनरेव भोगी ॥
(सुपात्र को दान देने से, इन्सान धनवान बनता है; (फिर) धन के प्रभाव से पुण्यकर्म करता है; पुण्य के प्रभाव से उसे स्वर्ग प्राप्त होता है; और फिर से धनवान और फिर से भोगी बनता है ।)
फलं यच्छति दातृभ्यो दानं नात्रास्ति संशयः ।
फलं तुल्यं ददात्येतदाश्चर्यं त्वनुमोदकम् ॥
(दान करने से दान फल देता है उसमें संशय नहि, पर पीछे से वह उतना ही आनंद रुपी फल देता है, वह आश्चर्य है ।)
सुदानात्प्राप्यते भोगः सुदानात्प्राप्यते यशः ।
सुदानात् जायते कीर्तिः सुदानात् प्राप्यते सुखम् ॥
(सत् (सम्यक्) दान करने से यश, कीर्ति और सुख प्राप्त होते हैं ।)
मायाहंङ्कार लज्जाभिः प्रत्युपक्रिययाऽथवा ।
यत्किञ्चिद्दीयते दानं न तध्दर्मस्य साधकम् ॥
(माया से, अहंकार से, लज्जा से या बदला लेने की भावना से जो कुछ भी दान दिया जाता है, उस दान से धर्म नहीं साधा जाता ।)
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