. तमिलनाडु का कन्याकुमारी शक्तिपीठ
पौराणिक आख्यान है, एक बार बाणासुर नामक असुर ने भगवान् शिवशंकर की कठिन तपस्या की और अमरत्व का वर माँगा। उसको वर देते समय शिव ने एक शर्त रखी थी कि तुम कुमारी कन्या के अतिरिक्त अन्य सबसे अजेय रहोगे। शिव का वर मिलने के बाद उसने खूब उपद्रव एवं उत्पात करने शुरू कर दिये। सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गयी। इससे सभी देवता भयभीत हो गये। तब उसके उत्पात से पीड़ित देवता भगवान् विष्णु की शरण में गये। विष्णु के कथनानुसार एक महायज्ञ का आयोजन किया गया। उस यज्ञ में हवन करने पर यज्ञकुण्ड की चिद् (ज्ञानमय) अग्नि से दुर्गाजी अपने एक अंश से कन्या रूप में प्रकट हुईं। बड़ी होने पर उस कन्या ने भगवान् शंकर को वररूप में पाने के लिये दक्षिण समुद्र के तट पर कठोर तपस्या की। उस कन्या के तप से भगवान् शिव बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने उसके साथ पाणिग्रहण स्वीकार किया। देवों को फिर चिन्ता सताने लगी कि यदि विवाह हो गया तो बाणासुर का वध होना कठिन हो जायगा। इस कार्य को रोकने का दायित्व ऋषियों ने नारद को सौंपा। नारद ने शुचीन्द्रम् नामक स्थान पर (चार-पाँच कि०मी०के अन्तर पर) अनेक प्रपंचों में उलझाकर रात भर शिवजी को रोक रखा। विवाह का मुहूर्त टल गया और प्रात:काल उपस्थित हो गया। भगवान् वहीं स्थाणु रूप में स्थित हो गये तथा देवताओं की युक्ति काम कर गयी।
ऐसा कहा जाता है कि अपना मनोरथ पूरा न होने के कारण देवी ने वहाँ पर पुन: तप करना शुरू कर दिया। अभी भी वे वहाँ कुमारी रूप से तप में संलग्न हैं। बाणासुर ने अपने दूतों से तपस्यारत देवी के अद्भुत सौन्दर्य की ख्याति सुनी, तो उससे विवाह के लिये हठ शुरू कर दिया। जब वह नहीं मानी, तो बाणासुर ने उससे युद्ध शुरू कर दिया। उस कुमारी का बाणासुर से भयंकर युद्ध हुआ। इसमें बाणासुर मारा गया। तब जाकर देवता उसके भय से मुक्त हो गये।
महाभारत के वनपर्व में कन्याकुमारी तीर्थ की महिमा बताते हुए कहा गया है-
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत्।
तत्तोयं स्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
अर्थात् महर्षि पुलस्त्यजी भीष्मपितामह से कहते हैं- हे राजेन्द्र! [कावेरी में स्नान करके] तत्पश्चात् समुद्र के तट पर विद्यमान कन्यातीर्थ (कन्याकुमारी) - में जाकर स्नान करे। उस तीर्थ में स्नान करते ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्रीमद्भागवत-महापुराण के अनुसार अगस्त्यजी से आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त करके बलरामजी ने दक्षिण समुद्र की यात्रा की और वहाँ उन्होंने देवी दुर्गा का कन्याकुमारी के रूप में दर्शन किया-
दक्षिणं तत्र कन्याख्यां दुर्गां देवीं ददर्श सः॥
(श्रीमद्भा० १०।७९।१७)
कन्याकुमारी एक अन्तरीप (समुद्र में स्थित भूमि) है। यह हिन्दमहासागर, अरबसागर और बंगाल की खाड़ी का सम्मिलन-स्थल है दक्षिण तट पर जहाँ तीनों समुद्र मिलते हैं, वहाँ का दृश्य देखने योग्य है; क्योंकि अरबसागर, बंगाल की खाड़ी एवं हिन्दमहासागर देखने का आनन्द यहाँ ही मिलता है। ऐसा अन्यत्र कहीं भी भारत में अवसर प्राप्त नहीं होता। यहाँ पर बंगाल की खाड़ी के समुद्र में सावित्री, सरस्वती, गायत्री और कन्याविनायक इत्यादि तीर्थ हैं। कन्याकुमारी मन्दिर के दक्षिण में मातृतीर्थ, पितृतीर्थ और भीमातीर्थ हैं। पश्चिम में थोड़ी दूरी पर स्थाणुतीर्थ है। यह भी प्रसिद्धि है कि जो जल शुचीन्द्रम् में शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है, वह वहाँ से रिस-रिसकर
भीतर-ही-भीतर से पुन: समुद्रमें कन्याकुमारी के मन्दिर के पास आकर के मिलता है।
कन्याकुमारी का मन्दिर समुद्रतट पर स्थित है। इसी स्थान पर राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की अस्थियाँ भी प्रवाहित की गयी थीं और समाधि भी बना करके रखी गयी है। एक विशेष बात यह है कि दो अक्टूबर को सूर्य की पहली किरण का प्रकाश सर्वप्रथम गाँधीजी की समाधि पर ही पड़ता है। कन्याकुमारी देवी के दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालु स्नानकर पहले गणेश-मन्दिर में गणेशजी के दर्शन के लिये जाते हैं। यह भी प्रथा है कि गणेशजी के दर्शन के पश्चात् पुरुष केवल एक वस्त्र धोती पहनकर और महिलाएँ साड़ी पहन करके कन्याकुमारी के दर्शन करती हैं। अन्यथा पुजारी अन्दर जाने नहीं देते हैं। भीतर जाने के लिये कई द्वार हैं। उनको पार करके कन्याकुमारी देवी के दर्शन किये जा सकते हैं। देवी की प्रतिमा अत्यन्त सुन्दर, प्रभावोत्पादक एवं भव्य है। देवी के हाथ में जपमाला दिखायी देती है। विशेष उत्सवों पर देवी का हीरों से श्रृंगार किया जाता है। देवी की नाक के आभूषण में हीरा जड़ा हुआ है। उसके दर्शन का बहुत ही महत्त्व बताया जाता है। पहले जिस ओर से यह हीरा दिखायी देता था, रात्रि के समय उस ओर से आने वाले जहाज चट्टान से टकरा करके चूर-चूर हो जाते थे। इस कारण उस ओर वाला द्वार अब बन्द रहता है। अधिक प्रकाश रात के समय होता है। इस कारण रात्रि के समय अवश्य दर्शन करने चाहिये। रात को वैसे भी विशेष शृंगार होता है। मन्दिर की उत्तरी दिशा में भद्रकाली का मन्दिर है। इनको देवी की सखी कहा जाता है। इस स्थान को सिद्धपीठ माना गया है; क्योंकि यहाँ सती का पृष्ठभाग गिरा था। यहाँ की देवी नारायणी और भैरव स्थाणु हैं। यहाँ और भी कई विग्रह हैं। थोड़ी दूरी पर 'पापविनाशनम्' पुष्करिणी है, यह सागरतट पर स्थित मीठे जल की बावली है। यात्री इसके जल से भी स्नान करते हैं। इसको मण्डूकतीर्थ भी कहते हैं। यहाँ के तट पर काली, लाल एवं सफेद रेत मिलती है। इसको लोग अपने साथ याद के लिये ले जाते हैं। इन रेतों के दाने चावलों के समान लगते हैं। कहते हैं कि देवी कन्याकुमारी और भगवान् शिव के विवाह के लिये प्रस्तुत तिल, अक्षत और रोली ही विवाह न हो पाने की स्थिति में समुद्र में विसर्जित कर दिये गये थे, वे ही अब विभिन्न रंगों की रेत के रूप में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ कौड़ियाँ, सीपियाँ और कई प्रकार के शंख मिलते हैं। समुद्र के बीच में विवेकानन्द रॉक है। वहाँ विवेकानन्दजी का मन्दिर बनाया गया है। मोटरबोट पर बैठकर वहाँ जाया जा सकता है। उनके दर्शन करने के बाद वहाँ एक कमरे में ध्यान भी कर सकते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जब भारतकी अत्यन्त दुखी अवस्था विवेकानन्दजी ने देखी, तो इस चट्टान पर तैर करके गये थे, जो सामान्य व्यक्ति के लिये सम्भव नहीं है; उन्होंने वहाँ तीन दिन तक चिन्तन किया था। इसी स्थान पर गौतममुनि के शाप से इन्द्र को मुक्ति मिली थी। यहाँ पर ही आ करके वे शुचि (पवित्र) हुए थे, इसी कारण इसका नाम 'शुचीन्द्रम्' भी है। वैसे इसका मन्दिर कुछ दूरी पर है। इसे नागराज मन्दिर भी कहा जाता है। इस स्थान की 'नागर कोविल' संज्ञा भी है। यहाँ एक बड़ा तालाब है। साथ ही शिव का मंदिर एवं एक बहुत बड़ी हनुमान्जी की खड़ी मूर्ति है। उसमें ऊपर जब पानी डालें तो नीचे अपने-आप आकर के गिरता है। वहाँ के पुजारी अलग होते हैं। यहाँ भी एक वस्त्र ही पहनकर जाना पड़ता है। कन्याकुमारी में ही सन्त तिरुवल्लुवर की १३३ फीट ऊँची प्रतिमा है, जो भारत की सबसे ऊँची प्रतिमाओं में से एक है।
चैत्र-पूर्णिमा को सायंकाल यदि बादल न हों तो इस स्थान से एक साथ बंगाल की खाड़ी में चन्द्रोदय तथा अरबसागर में सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य दीख पड़ता है। उसके दूसरे दिन प्रात:काल बंगाल की खाड़ी में सूर्योदय तथा अरबसागर में चन्द्रास्त का दृश्य भी बहुत आकर्षक होता है। वैसे भी कन्याकुमारी में सूर्योदय तथा सूर्यास्त का दृश्य बहुत भव्य होता है। बादल न होने पर समुद्र-जल से ऊपर उठते या समुद्र-जल से पीछे जाते हुए सूर्य-बिम्ब का दर्शन बहुत आकर्षक लगता है। इस विहंगम दृश्य को देखने के लिये प्रतिदिन प्रातः-सायं समुद्र-तट पर भारी भीड़ होती है।
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कल्याण (९४|११)
गीतावाटिका (गोरखपुर) से साभार
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