Skip to main content

व्रत महत्त्व एवं निर्देश

 व्रत - उपवास 


आचरण ( 6 ) व्रत उपवास


                  * जैसा आहार ऐसे विचार *

          सद्विचार की साधना में अत्यंत जरूरी एक साधन है व्रत उपवास । शरीर के 114 चक्रोमे प्रधान सात चक्र ओर इनमे मणिपुर चक्र का स्थान नाभि है । जब हम आठ प्रहर तक निराहार रहते है तब नाभिचक्रमे ऊर्जा पैदा होती है । ये ऊर्जा 114 या प्रधान सातो चक्र तक व्याप्त होती है जो शरीरस्थ दिव्य शक्तिओ को जागृत करती है । जिस इष्टदेव देवी की प्रसन्नता केलिए व्रत किया जा रहा है उनके नाम स्मरण ओर मंत्र जापसे वो दैवीशक्ति की हमारे शरीरमे जागृति होने लगती है । मंत्रजाप नाम स्मरण या ध्यान अवस्थामे ब्रह्मांड की दिव्य शक्तिओ का अनायास संपर्क होने लगता है । सत्व तत्त्वका व्याप्त होने से चित मनमे सद्विचार का व्याप्त होता है । तामसी तत्व का नाश होता है और दिव्यता प्राप्त होती है । इस तरह उपवास व्रत मात्र अरोग्यहीत केलिए नही पर मन मस्तिष्क से नकारात्मकता , दुर्बुद्धि का नाश करने और सत तत्व का जागरण करने का साधन है ।


     व्रत, धर्म का साधन माना गया है. इसलिए संसार के समस्त धर्मों ने किसी न किसी रूप में व्रत और उपवास को अपनाया है. हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, यहूदी धर्म, ताओवाद, जैन धर्म में भी व्रत किए जाते हैं. भले ही हर धर्म में इसे अलग-अलग नाम से पुकारा जाता हो. जैसे इस्लाम में इसे रोजा कहते हैं. ईसाई फास्टिंग । अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उपवास कुछ घंटो, कुछ दिनों के या महीने भर के हो सकते हैं. लेकिन हर धर्म में उपवास का मकसद सिर्फ एक ही होता है त्याग और खुद को अंदर तक साफ कर लेना। व्रत के बारे में कहा जाता है कि ये सिर्फ आस्था से ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य से भी जुड़ा है. दिन में एक बार या दो बार का खाना न खाकर शरीर को भी अंदर से साफ करने का मौका मिलता है । 


       उपवास का तत्वज्ञान आहार शुद्धि से सम्बन्धित है, “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशेष रुप से आवश्यक हैं । इसके लिए फल, शाक, दूध जैसे सुपाच्य पदार्थो को ही प्रमुखता देनी होगी, उपवास वाले दिन चटोरेपन की पूर्ति करने वाली मसालेदार तथा खटाई, मिठाई, चिकनाई की भरमार वाले पदार्थों का विशेष रूप से उपवास करना पड़ता है । हमारे पूर्वज ऋषियों ने उपवासों की एक धारा, ‘अस्वाद व्रत’ को भी बताया है । साथ ही कहा भी है कि सप्ताह में एक दिन प्रत्येक व्यक्ति को बना नमक, शक्कर के अस्वाद भोजन वह भी सिर्फ एक समय, इससे शरीर को कई रोगों जैसे- कब्ज , गैस, एसिडीटी, सिरदर्द, बुखार, मोटापा जैसे कई रोगों से मुक्ति मिलने साथ मानसिक शांति भी मिलेगी । उपवास से ज्ञान, विचार, पवित्रता बुद्धि का विकास होता है । इसी कारण तो उपवास व्रत को हर पूजा पद्धति में शामिल किया गया है ।


      व्रत करते समय निम्नोक्त 10 गुणों का होना आवश्यक है। क्षमा, सत्य, दया, दान, शौच, इन्द्रियनिग्रह, देवपूजा, अग्निहवन, संतोष एवं अस्तेय। व्रत के दिन मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए। पतित पाखंडी तथा नास्तिकों से दूर रहना चाहिए और असत्य भाषण नहीं करना चाहिए। उसे सात्विक जीवन का पालन और प्रभु का स्मरण करना चाहिए। साथ ही कल्याणकारी भावना का पालन करना चाहिए।


      विज्ञान ने बताए हैं व्रत के फायदे और नुकसान

व्रत के बारे में कभी भी ये नहीं कहा जाता कि ये अच्छा नहीं है. और अगर सभी धर्मों ने इसे अपनाया है तो इसके पीछे कोई ठोस कारण तो होगा ही. विज्ञान ने व्रत रखने के कुछ फायदे बताए हैं-


- व्रत ब्लड शुगर लेवल को कम करने और इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन पुरुषों और महिलाओं को अलग तरह से प्रभावित कर सकता है.


- उपवास से कोरोनरी हृदय रोग कम होते हैं. और कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है.


- जानवरों पर हुए शोध से पता चलता है कि उपवास मस्तिष्क की कार्य क्षमता में सुधार कर सकता है, और अल्जाइमर और पार्किंसंस रोग जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव स्थितियों से बचा सकता है.


- व्रत शरीर के वजन और शरीर की वसा को कम करने में मदद कर सकता है.


- उपवास मानव विकास हार्मोन  के स्तर को बढ़ा सकता है, ये एक महत्वपूर्ण प्रोटीन हार्मोन है जो विकास, मेटाबॉलिज्म, वजन घटाने और मांसपेशियों को ताकत देने में अहम भूमिक निभाता है.


   मनुष्य की प्रगति को रोकने वाला एक नकारात्मक कारण है आलस्य । आप कृषिकार हो , नॉकरी करते हो , व्यापार क्षेत्रमे हो , उधोगकार हो , कला कारीगर हो , विद्यार्थी हो , उपासक हो मन की सुस्ती आलस आपकी प्रगति में रुकावट है । उपवास से तन मन पुलकित होता है और आत्मविश्वास के साथ कार्यशील रहने की ऊर्जा प्राप्त होती है । गृहस्थी जीवन या उपासक को सभी इंद्रियोमे स्वादेन्द्रिय ओर कामेन्द्रिय सबसे ज्यादा नुकसान पहुचा सकती है । उपवास ओर निमक शक्कर रहित खानपान इस दोनो इंद्रियों के नुकसान से बचाती है । अति भोजन शरीर का ओर अति काम मन बुद्धि आ विनाश करता है । 

 

      खगोल शास्त्र के मुजब अमावस्या से पूर्णिमा तक के समय चौथ , अष्टमी , एकादशी , त्रयोदशी या पूर्णिमा का उपवास सभी नोउ गृहदेवता की प्रसन्नता दिलाता है । विज्ञान के मुजब साप्ताहिक या पख्वादिक एक उपवास शरीर को हमेशा निरोगी ओर स्वस्थ रखता है । 

  

     हम ध्यान करने की कोशिश करते या मंत्रजाप केलिए बैठते है पर नींद आने लगती है , अनेक प्रकार के विचार आने लगते है , कामुक विचार आते है , मन ही नही होता ज्यादा समय जप जाप करे बिगेरा । तो उन सब केलिए श्रेष्ठ उपाय है सप्ताह में एक उपवास जरूर करे । हरदिन के भोजन में नमक , शक्कर , तेल कम करे । प्याज ,  लहसुन , तेजमसाले कम करे ।

Comments

Popular posts from this blog

विचारणीय

                         . *कटु सत्य..* *एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!* *पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!!* *तो आईं तो एक ने कहा-*  *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...* *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली..* *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया...* *दूसरी बोली--"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..*  *अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?* *तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* *लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-*               *क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है,...

शिव रहस्य

 भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा ही क्यों.. ? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। ''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र :  〰️🔸〰️ शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : 〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️ सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत...

भक्ति मार्ग

 _*ईश्वर प्राप्ति के 12 कदम*_   *भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....*   _*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।*_   _*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 8*_   *_भावार्थ :-_ हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।*   *तुलसी दास जी कहते हैं....*   _*"बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।"*_   *1. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस   व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।*   *2. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।*   *3. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।*   *4. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।*   *5. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जा...