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कालभैरव भजे

 महारुद्र - कालभैरव देवता 


      कालभैरव वो महादेव का रौद्र अवतार है । उग्र  स्वरूप है और भूत पिचाशादी गणों के अध्यक्ष है और स्मशानादी स्थानमे उनकी तंत्र उपासना तंत्र विधान मंत्रो से की जाती है । पर ये सिर्फ योग्य गुरु के सनिध्यमे तंत्र मार्ग से दीक्षित उपासको को ही करनी होती है । इसलिए यहां काल भैरवदेवता की सौम्य उपासना दे रहे है । ये विधान भक्ति भाव पूर्वक हरकोई कर सकता है । भैरव देवता के प्रमुख अष्ट स्वरूप पूजे जाते है । कार्य और स्थान को लेकर ये अलग अलग स्वरूप है पर तत्वानुसार महारुद्र के ही स्वरूप है । 


शिवपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को दोपहर में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए इस तिथि को काल भैरवाष्टमी या भैरवाष्टमी के नाम से जाना जाता है।

 

पुराणों के अनुसार अंधकासुर दैत्य ने एक बार अपनी क्षमताओं को भूलकर अहंकार में भगवान शिव के ऊपर हमला कर दिया। उसके संहार के लिए शिव के खून से भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव शिव का ही स्वरूप हैं। 

 इसलिए शिव की आराधना से पहले भैरव उपासना का विधान बताया गया है। उनकी साधना से समस्त दुखों से छुटकारा मिल जाता है। 

 

काशी और उज्जैन को भैरव का सिद्ध स्थान माना जाता है। भैरव साधना करने वाले व्यक्ति को सांसारिक दुखों से छुटकारा मिल जाता है। वैसे तो प्रमुख कालाष्टमी का व्रत कालभैरव जयंती के दिन किया जाता है, लेकिन कालभैरव के भक्त हर महीने ही कृष्ण पक्ष की अष्टमी पर इनकी पूजा और अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं।कालभैरव का व्रत रखने से उपासक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। वर्तमान में भैरव की उपासना बटुक भैरव और काल भैरव के रूप में प्रचलित हैं। 

 

तंत्र साधना में भैरव के आठ स्वरूप की उपासना की बात कही गई है। ये रूप असितांग भैरव, रुद्र भैरव, चंद्र भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, कपाली भैरव, भीषण भैरव संहार भैरव। कालिका पुराण में भी भैरव को शिवजी का गण बताया गया है जिसका वाहन कुत्ता है। 


इस दिन व्रत रखने वाले साधक को पूरा दिन 'ओम कालभैरवाय नम:' का जाप करना चाहिए।  इस दिन शक्ति अनुसार रात को माता पार्वती और भगवान शिव की कथा सुन कर जागरण का आयोजन करना चाहिए। व्रती को फलाहार ही करना चाहिए। कालभैरव की सवारी कुत्ता है अतः इस दिन कुत्ते को भोजन करवाना शुभ माना जाता है। 


पूजन ;- 


  स्नानादि शुद्धिकरण के बाद एक पाट पर लाल कलर का कापड पर भैरवजी की प्रतिमा या फ़ोटो स्थापित करे । गुरु और गणपतिजी का पूजन करे और बादमे श्री भैरवजी की षोडशोपचार पूजन करे । पूजन के बाद भैरवजी के मंत्र :- 


ॐ कालभैरवाय नमः 


इस मंत्र की 10 माला जाप करे । 


भैरव जी का ध्यान मंत्र :- 


धर्मध्वजं शङ्कररूपमेकं शरण्यमित्थं भुवनेषु सिद्धम्।


द्विजेन्द्र पूज्यं विमलं त्रिनेत्रं श्री भैरवं तं शरणं प्रपद्ये।।


काल भैरव गायत्री मंत्र :-


ॐ शिवगणाय विद्महे।


गौरीसुताय धीमहि।


तन्नो भैरव प्रचोदयात।।


पूजन मंत्र जाप के बाद बटुकभैरव अष्टोत्तरणाम स्तोत्र करे ।


श्री बटुक-भैरव-अष्टोत्तर-शत-नाम-स्तोत्र


 ध्यान :-


वन्दे बालं स्फटिक-सदृशम्, कुन्तलोल्लासि-वक्त्रम्।

दिव्याकल्पैर्नव-मणि-मयैः, किंकिणी-नूपुराढ्यैः।।

दीप्ताकारं विशद-वदनं, सुप्रसन्नं त्रि-नेत्रम्।

हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं, शूल-दण्डौ दधानम्।।


 मानस-पूजन ;-


उक्त प्रकार ‘ध्यान’ करने के बाद श्रीबटुक-भैरव का मानसिक पूजन करे-


ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये घ्रापयामि नमः।


ॐ रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये निवेदयामि नमः।


ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमद् आपदुद्धारण-बटुक-भेरव-प्रीतये समर्पयामि नमः।


अष्टोत्तरणाम स्तोत्र :-


ॐ भैरवो भूत-नाथश्च, भूतात्मा भूत-भावनः।


क्षेत्रज्ञः क्षेत्र-पालश्च, क्षेत्रदः क्षत्रियो विराट्।।१


श्मशान-वासी मांसाशी, खर्पराशी स्मरान्त-कृत्।


रक्तपः पानपः सिद्धः, सिद्धिदः सिद्धि-सेवितः।।२


कंकालः कालः-शमनः, कला-काष्ठा-तनुः कविः।


त्रि-नेत्रो बहु-नेत्रश्च, तथा पिंगल-लोचनः।।३


शूल-पाणिः खड्ग-पाणिः, कंकाली धूम्र-लोचनः।


अभीरुर्भैरवी-नाथो, भूतपो योगिनी-पतिः।।४


धनदोऽधन-हारी च, धन-वान् प्रतिभागवान्।


नागहारो नागकेशो, व्योमकेशः कपाल-भृत्।।५


कालः कपालमाली च, कमनीयः कलानिधिः।


त्रि-नेत्रो ज्वलन्नेत्रस्त्रि-शिखी च त्रि-लोक-भृत्।।६


त्रिवृत्त-तनयो डिम्भः शान्तः शान्त-जन-प्रिय।


बटुको बटु-वेषश्च, खट्वांग-वर-धारकः।।७


भूताध्यक्षः पशुपतिर्भिक्षुकः परिचारकः।


धूर्तो दिगम्बरः शौरिर्हरिणः पाण्डु-लोचनः।।८


प्रशान्तः शान्तिदः शुद्धः शंकर-प्रिय-बान्धवः।


अष्ट-मूर्तिर्निधीशश्च, ज्ञान-चक्षुस्तपो-मयः।।९


अष्टाधारः षडाधारः, सर्प-युक्तः शिखी-सखः।


भूधरो भूधराधीशो, भूपतिर्भूधरात्मजः ।।१०


कपाल-धारी मुण्डी च, नाग-यज्ञोपवीत-वान्।


जृम्भणो मोहनः स्तम्भी, मारणः क्षोभणस्तथा ।।११


शुद्द-नीलाञ्जन-प्रख्य-देहः मुण्ड-विभूषणः।


बलि-भुग्बलि-भुङ्-नाथो, बालोबाल-पराक्रम ।।१२


सर्वापत्-तारणो दुर्गो, दुष्ट-भूत-निषेवितः।


कामीकला-निधिःकान्तः, कामिनी-वश-कृद्वशी ।।१३


जगद्-रक्षा-करोऽनन्तो, माया-मन्त्रौषधी-मयः।


सर्व-सिद्धि-प्रदो वैद्यः, प्रभ-विष्णुरितीव हि ।।१४


पूजन , मंत्रजाप , स्तोत्र के बाद महादेव के इस मंत्र :- 


ॐ ह्रीं नमः शिवाय 


इस मंत्र की एक माला जाप करे और अन्तमे भगवान भैरवजी की आरती करें । 

 

कालाष्टमी व्रत बहुत ही फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रत रखकर पूरे विधि-विधान से काल भैरव की पूजा करने से व्यक्ति के सारे कष्ट मिट जाते हैं। काल उससे दूर हो जाता है। इसके अलावा व्यक्ति रोगों से दूर रहता है और उसे हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है ।

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