Skip to main content

मानस मर्म :-2

 *‼️श्रीराम: शरणं मम‼️*

        *❗श्रीरामचरितमानस चिंतन❗*

°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

      *भक्त का भार भगवान उठाते हैं।* 

     °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "°

     जब पापी और पुण्यात्मा दोनों में ही भगवान विद्यमान हैं तो फिर हम पाप का परित्याग क्यों करें ? इसे दृष्टान्त के रूप में यों कहा जा सकता है कि सूर्य का प्रकाश भले ही सम हो पर उसके सामने अगर एक दर्पण तथा एक कोयला रखा जाय तो क्या दोनों में समान प्रकाश दिखाई देगा ? सूर्य भले ही समान प्रकाश दे रहा है पर शीशे में जो चमक और किरणें दिख रही हैं, कोयले में उस तरह की कोई प्रतीति नहीं होती। भगवान ने भेद करते हुए कहा --"भुशुण्डिजी ! यद्यपि सारे संसार के प्राणी मेरे ही द्वारा उत्पन्न हुए हैं तथा सब पर मेरी दया भी बराबर है -- *'सब मम प्रिय सब मम उपजाए।'* लेकिन इतना होते हुए भी *'सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥'* -- मनुष्य मुझे बड़ा प्यारा है। मनुष्यों में भी *'तिन्ह महं द्विज'* ब्राह्मण मुझे बड़ा प्रिय है। द्विज से भी श्रेष्ठ *'द्विज महँ श्रुतिधारी'* जो वेद का ज्ञाता हो। वेद के ज्ञाताओं में भी श्रेष्ठ वह है -- *'तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।'* -- जो वेद के अनुकूल आचरण करता है वह मुझे प्रिय है। धार्मिकों में भी मुझे वैराग्यवान बड़ा प्रिय है -- *'तिन्ह महं प्रिय बिरक्त'* विरक्तों की अपेक्षा ज्ञानी अधिक प्रिय है। -- *'तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी।'* ज्ञानी की अपेक्षा विज्ञानी अधिक प्रिय हैं। *'ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।'* किन्तु सबसे ऊपर कौन है इसका स्पष्टीकरण करते हुए अन्त में भगवान ने कह दिया कि --

   *तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा।*

   *जेहि  गति  मोरि  न  दूसरि  आसा॥*

     भगवान ने इसे बड़े सुन्दर दृष्टान्त के माध्यम से समझाते हुए कहा -- "भुशुण्डि ! एक पिता के अनेक पुत्र होते हैं । योग्य पिता हर पुत्र की प्रशंसा अलग-अलग अवसरों पर करता है। अगर पुत्र युद्धभूमि से विजय प्राप्त कर लौटे तो पिता उसकी पीठ ठोकते हुए कहेगा -- 'वाह ! पुत्र तुम सबसे महान हो।' दूसरा पुत्र अगर कवि-सम्मेलन से काव्यपाठ में सफलता प्राप्त करके लौटे तो पिता उस पुत्र की पीठ ठोकता हुआ कहता है कि तुम मुझे सर्वाधिक प्रिय हो। तात्पर्य है कि जो पुत्र जिस समय अपनी कला-कुशलता का प्रदर्शन करता उस समय पिता उसी पुत्र को सर्वाधिक सम्मान देता है।"

       कागभुशुण्डिजी ने कह दिया -- "महाराज! आप कभी किसी को प्रिय बता देते हैं और कभी किसी को। चित्रकूट में जब आपने कह दिया कि *'भरत सरिस प्रिय को जग माहीं।'* तो लगा कि आपको सबसे प्रिय श्री भरतजी हैं। लेकिन लंका से वापस आने पर जब गुरुजी से बन्दरों का परिचय कराने लगे तो कह दिया कि --

      *ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।*

      *भए  समर  सागर  कहँ  बेरे॥*

      *मम हित लागि जन्म इन्ह हारे।*

      *भरतहु ते मोहि अधिक पियारे॥*

      और कहीं आप कहते हैं कि *'कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरे।'* शंकरजी सबसे अधिक प्रिय हैं। इसलिए समझ में नहीं आता है कि आपको सचमुच कोन प्रिय है। भगवान ने कहा -- "भुशुण्डि ! इसमें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि --

   *एक  पिता  के  बिपुल  कुमारा।*

   *होहिं प्रथक गुन सील अचारा॥*

   *कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता।*

   *कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥*

   *कोउ  सर्बग्य  धर्मरत  कोई।*

   *सब पर पितहि प्रीति सम होई॥*

     कभी पिता विद्वान की प्रशंसा करता है, कभी वीर की और कभी सेवक की। भगवान ने कहा कि सबकी अलग-अलग भूमिका है तथा योग्य पिता का कार्य भी यही है कि वह अपने पुत्रों को निरन्तर प्रोत्साहित करे । लेकिन इतना होते हुए भी पिता के अन्तर्मन में किसी-न-किसी बालक के प्रति पक्षपात भी होता है । और वह बालक ऐसा है कि --

   *कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा।*

  *सपनेहुँ   जान   न   दूसर   धर्मा ॥*

     जो न तो कवि है, न योद्धा है और न ही उसमें किसी विशिष्ट प्रकार का गुण है। अपितु वह तो केवल मन, वचन और कर्म से पिता का भक्त है।

     *सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना।* 

    *जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥*

    भगवान ने कहा कि जो मेरे भक्त हैं, जो अपने आपको अत्यन्त नन्हा और असमर्थ मानते हैं वे मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। इस तरह से भगवान ने भुशुण्डिजी को उपदेश दिया।

🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹

Comments

Popular posts from this blog

विचारणीय

                         . *कटु सत्य..* *एक साधू किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!!* *पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं !!!* *तो आईं तो एक ने कहा-*  *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया...* *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।" पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली..* *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया...* *दूसरी बोली--"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..*  *अभी रोष नहीं गया, तकिया फेंक दिया।" तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ?* *तब तीसरी बोली- "बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* *लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी-*               *क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है, तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है, अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तूम जैसे भी हो, हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है,...

शिव रहस्य

 भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा ही क्यों.. ? 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। ''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र :  〰️🔸〰️ शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : 〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️ सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत...

भक्ति मार्ग

 _*ईश्वर प्राप्ति के 12 कदम*_   *भगवान श्री कृष्ण कहते हैं....*   _*मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।*_   _*निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ 8*_   *_भावार्थ :-_ हे अर्जुन! तू अपने मन को मुझमें ही स्थिर कर और मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगा, इस प्रकार तू निश्चित रूप से मुझमें ही सदैव निवास करेगा, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। यह उन व्यक्तियों के लिये है जिनके सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं।*   *तुलसी दास जी कहते हैं....*   _*"बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।"*_   *1. जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस   व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है।*   *2. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है।*   *3. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है।*   *4. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है।*   *5. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जा...