*‼️श्रीराम: शरणं मम‼️*
*❗श्रीरामचरितमानस चिंतन❗*
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*भक्त का भार भगवान उठाते हैं।*
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जब पापी और पुण्यात्मा दोनों में ही भगवान विद्यमान हैं तो फिर हम पाप का परित्याग क्यों करें ? इसे दृष्टान्त के रूप में यों कहा जा सकता है कि सूर्य का प्रकाश भले ही सम हो पर उसके सामने अगर एक दर्पण तथा एक कोयला रखा जाय तो क्या दोनों में समान प्रकाश दिखाई देगा ? सूर्य भले ही समान प्रकाश दे रहा है पर शीशे में जो चमक और किरणें दिख रही हैं, कोयले में उस तरह की कोई प्रतीति नहीं होती। भगवान ने भेद करते हुए कहा --"भुशुण्डिजी ! यद्यपि सारे संसार के प्राणी मेरे ही द्वारा उत्पन्न हुए हैं तथा सब पर मेरी दया भी बराबर है -- *'सब मम प्रिय सब मम उपजाए।'* लेकिन इतना होते हुए भी *'सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥'* -- मनुष्य मुझे बड़ा प्यारा है। मनुष्यों में भी *'तिन्ह महं द्विज'* ब्राह्मण मुझे बड़ा प्रिय है। द्विज से भी श्रेष्ठ *'द्विज महँ श्रुतिधारी'* जो वेद का ज्ञाता हो। वेद के ज्ञाताओं में भी श्रेष्ठ वह है -- *'तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।'* -- जो वेद के अनुकूल आचरण करता है वह मुझे प्रिय है। धार्मिकों में भी मुझे वैराग्यवान बड़ा प्रिय है -- *'तिन्ह महं प्रिय बिरक्त'* विरक्तों की अपेक्षा ज्ञानी अधिक प्रिय है। -- *'तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी।'* ज्ञानी की अपेक्षा विज्ञानी अधिक प्रिय हैं। *'ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।'* किन्तु सबसे ऊपर कौन है इसका स्पष्टीकरण करते हुए अन्त में भगवान ने कह दिया कि --
*तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा।*
*जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥*
भगवान ने इसे बड़े सुन्दर दृष्टान्त के माध्यम से समझाते हुए कहा -- "भुशुण्डि ! एक पिता के अनेक पुत्र होते हैं । योग्य पिता हर पुत्र की प्रशंसा अलग-अलग अवसरों पर करता है। अगर पुत्र युद्धभूमि से विजय प्राप्त कर लौटे तो पिता उसकी पीठ ठोकते हुए कहेगा -- 'वाह ! पुत्र तुम सबसे महान हो।' दूसरा पुत्र अगर कवि-सम्मेलन से काव्यपाठ में सफलता प्राप्त करके लौटे तो पिता उस पुत्र की पीठ ठोकता हुआ कहता है कि तुम मुझे सर्वाधिक प्रिय हो। तात्पर्य है कि जो पुत्र जिस समय अपनी कला-कुशलता का प्रदर्शन करता उस समय पिता उसी पुत्र को सर्वाधिक सम्मान देता है।"
कागभुशुण्डिजी ने कह दिया -- "महाराज! आप कभी किसी को प्रिय बता देते हैं और कभी किसी को। चित्रकूट में जब आपने कह दिया कि *'भरत सरिस प्रिय को जग माहीं।'* तो लगा कि आपको सबसे प्रिय श्री भरतजी हैं। लेकिन लंका से वापस आने पर जब गुरुजी से बन्दरों का परिचय कराने लगे तो कह दिया कि --
*ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे।*
*भए समर सागर कहँ बेरे॥*
*मम हित लागि जन्म इन्ह हारे।*
*भरतहु ते मोहि अधिक पियारे॥*
और कहीं आप कहते हैं कि *'कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरे।'* शंकरजी सबसे अधिक प्रिय हैं। इसलिए समझ में नहीं आता है कि आपको सचमुच कोन प्रिय है। भगवान ने कहा -- "भुशुण्डि ! इसमें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि --
*एक पिता के बिपुल कुमारा।*
*होहिं प्रथक गुन सील अचारा॥*
*कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता।*
*कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥*
*कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई।*
*सब पर पितहि प्रीति सम होई॥*
कभी पिता विद्वान की प्रशंसा करता है, कभी वीर की और कभी सेवक की। भगवान ने कहा कि सबकी अलग-अलग भूमिका है तथा योग्य पिता का कार्य भी यही है कि वह अपने पुत्रों को निरन्तर प्रोत्साहित करे । लेकिन इतना होते हुए भी पिता के अन्तर्मन में किसी-न-किसी बालक के प्रति पक्षपात भी होता है । और वह बालक ऐसा है कि --
*कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा।*
*सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥*
जो न तो कवि है, न योद्धा है और न ही उसमें किसी विशिष्ट प्रकार का गुण है। अपितु वह तो केवल मन, वचन और कर्म से पिता का भक्त है।
*सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना।*
*जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥*
भगवान ने कहा कि जो मेरे भक्त हैं, जो अपने आपको अत्यन्त नन्हा और असमर्थ मानते हैं वे मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। इस तरह से भगवान ने भुशुण्डिजी को उपदेश दिया।
🌹🙏जय श्री सीताराम🙏🌹
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