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मानस मर्म

 भगवान राम के वनवास का मुख्य कारण कौन थे खुद श्री राम, रानी कैकयी, मन्थरा या भाग्य चक्र?

भगवान श्रीराम ही इसका मुख्य कारण थे क्योंकि भगवान श्रीराम नहीं माता कैकयी को यह सब करने के लिए कहा था भले ही यह बात तुलसीकृत रामायण में ना लिखी हो लेकिन यह सच्चाई है एक बार प्रभु श्री राम अकेले बगीचे में बैठे थे झूले पर और वह भी उदास तभी माता कैकेई उनके पास आई और उनकी उदासी का कारण पूछा की हे राघव तुम उदास क्यों हो तब भगवान ने कहां नहीं मां मैं उदास नहीं हूं आपको ऐसा क्यों प्रतीत होता है तब माता कैकई ने कहा हे राघव तुम सब से झूठ बोल सकते हो लेकिन मुझसे नहीं मुझे पता है तुम उदास हो जब बार-बार माने आग्रह करा प्रभु श्री राम ने कहा की हे माता मैं इस संसार में खाली यह राजसी सुख भोगने के लिए ही नहीं आया हूं बल्कि इसके अलावा भी मुझे बहुत कुछ करना है जिसके लिए मुझे अयोध्या से दूर जाना होगा तब माता कैकई ने कहा ऐसा कौन सा कार्य है जो तुम अयोध्या में रहते हुए नहीं कर सकते हो तो भगवान श्रीराम ने बताया की हे माता अनेक ऋषि मुनि ने मेरे दर्शन की अभिलाषा से अनेक जन्मों से तप किए हैं और अभी कर रहे हैं वह भी वनों में बैठकर अपना सब कुछ त्याग कर और इसी अभिलाषा में अब तक जीवित हैं कि एक दिन प्रभु हमें अवश्य दर्शन देंगे जिन इन जंगलों में तप कर रहे हैं बैठकर उन जंगलों में उन्हें राक्षस बहुत सता रहे हैं लेकिन फिर भी वह इसी आस में बैठकर तप करे जा रहे हैं प्रभु इन राक्षसों से हमारी रक्षा करने अवश्य आएंगे और दूसरा कारण यह है कि उन्हें पता है कि प्रभु भक्त वत्सल है और वह सदा हमारा हित चाहने वाले हैं तुझे प्रभु इन राक्षसों का संघार करने आएंगे इन वनों में तब हमें उनके दर्शन अवश्य होंगे हे माता तुम मुझे वनों में जाना चाहिए या नहीं या मुझे यहां बैठना चाहिए चैन से और वैसे भी रावण के अत्याचार दिन पर दिन बढ़ते ही जा रहे हैं और मैंने उसका वध करने के लिए ही इस धरती पर जन्म लिया है वह महा दुष्ट ऋषि-मुनियों, नारियों, मनुष्य, देवताओं, साथ ही साथ इस धरती मां के हर प्राणी को सता रहा है और उसका वध मेरे हाथों होना है क्योंकि उसने ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया है कि मेरा वध किसी देवता, ना होकर एक साधारण मनुष्य से हो तो इसलिए हे माता मुझे अयोध्या से दूर जाना ही होगा तो अयोध्या से दूर जाने के लिए कोई कारण तो होना चाहिए जो मुझे अब सूझ नहीं रहा है और वैसे भी कौन मुझे अपने से दूर करना चाहेगा जिस से भी मैं यह बात कहूंगा कोई नहीं मानेगा और मुझे वैसे भी राजसी भेज में नहीं जाना है बल्कि एक साधारण मनुष्य के रूप में जाना है जो उन ऋषि-मुनियों को यह सुख दे सकें कि वह किसी राजा से नहीं मिल रहे हैं बल्कि जिनकी वह आराधना कर रहे हैं जिस रूप में उसी रूप में उनके आराध्य उनके सामने प्रकट हुए हैं


और एक राजा अगर किसी नगर में जाता है या मन वन में जाता है तो वह उन साधारण और प्रेम युक्त व्यक्तियों से नहीं मिल पाता है जो उसे इसलिए प्रेम नहीं करते हैं वह एक राजा है बल्कि इसलिए प्रेम करते हैं वह उनसे प्रेम करता है और उनके दुख-सुख को सुनता है मुझे उन लोगों के बीच में जाकर उस प्रेम को महसूस करना है जो वह मुझसे करते हैं जो एक राजा होने के नाते मैं नहीं कर सकता हूं


और दूसरा कारण वन में जाने का यह है कि पिता महाराज को एक संत का श्राप लगा है श्रवण कुमार के पिता का जब पिता महाराज एक दिन जंगल में शिकार करने गए थे तब उन्होंने गलती से श्रवण कुमार को तीर मार दिया था श्रवन कुमार नदी पर अपने माता-पिता के लिए जल भर रहा था उनकी प्यास बुझाने के लिए पिता महाराज ने समझा कि कोई जानवर नदी किनारे जल पी रहा है तब उन्होंने शब्दभेदी बाण छोड़ दिया था तो है तीर श्रवण कुमार के छाती में जाकर लग गया जिससे उसकी मृत्यु हो गई जब पिता महाराज वहां पहुंचे और उन्होंने देखा कि उनका तीर एक ब्राह्मण कुमार के लग गया है उस ब्राह्मण कुछ ने पूछा हे राजन् मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो तुमने मुझे तीर मार दिया अब मेरे अंधे माता पिता को कौन देखेगा तब राजा दशरथ जी विलाप करने लगे और कहने लगे कि हे कुमार मुझे नहीं पता था तुम यहां चल भर रहे हो मैंने यह सोचकर तीर चलाया था कि कोई जानवर जल पी रहा है तब श्रवण कुमार ने कहा तुम्हें किसने अधिकार दिया है निर्दोष प्राणियों की हत्या करने का यह गलत है हे राजन् मैं तो मर जाऊंगा लेकिन मेरे माता-पिता का क्या होगा अब वह तो बेचारे देख भी नहीं सकते हैं मैं ही उनका आखिरी सहारा था वह भी तुमने आज छीन लिया हे राजन् में प्यार से ना मारे वह प्रतीक्षा में बैठे हैं कि मैं उन्हें जल पिला लूंगा अब मैं तो मर रहा हूं अब तुम यह कार्य करना होगा मेरे माता-पिता को जल अवश्य पिलाना नहीं तो बिना जल के मर जाएंगे यह कहते-कहते श्रणन कुमार ने अपने प्राण त्याग दिए तब राजा दशरथ उनके माता-पिता के पास गए और उन्हें जल पीने के लिए आग्रह करने लगे तब उन्होंने पूछा हमारा पुत्र कहां है तब उन्होंने सब बताया कि उनके तीर से उनका पुत्र कैसे मारा गया तब उन्होंने दिया कि इस प्रकार वे पुत्र वियोग में बिना जल ग्रहण मर रहे हैं ऐसे ही हे राजन् तुम भी पुत्र वियोग में ही अपने प्राण त्याग करोगी अंतिम समय तुम्हारे पास भी तुम्हारे पुत्र नहीं होंगी और तुम उसी अवस्था में अपने प्राणों का क्या करोगे जैसे आज हम कर रहे हैं


तो हे माता अगर मैं यहां पर रहा तो उन संत का श्राप सत्य नहीं होगा और मेरे पिता जीवन भर इसी ग्लानि से भरे रहेंगे कि उन्होंने एक निर्दोष ब्राह्मण की हत्या कर रखी है और वह इस बात से कभी मुक्त नहीं हो पाएंगे और कब पता नहीं उस संत का श्राप सत्य हो जाए और वह कभी भी चैन से जीवन नहीं जी पाएंगे और नहीं जी पा रहे हैं उन्होंने यह बात सिवाय आपके अलावा किसी को नहीं बताइए इस बात का भी मुझे क्यों नहीं है


माता कैकेई इस बात को याद करके रोने लगी कि हां राघव मैंने एक बार महाराज को चिंतित देखा तो बहुत पूछने पर उन्होंने यह बात मुझे बताई थी लेकिन इस वचन के साथ कि मैं यह बात किसी को नहीं बताऊं लेकिन हे राघव तुमसे कभी कुछ छुपा है


तुम चिंता मत करो यह तुम्हारा कार्य अब यह माता करेगी तब राघव ने कहा माता तुम कैसे करोगे तब उन्होंने बताया कि तुम्हारे पिता ने मुझे दो वरदान देने का वादा किया था जब मैंने देवताओं और असुरों के बीच में युद्ध हो रहा था तब मैं उनकी सारथी बनकर उस युद्ध में गई थी और उनके प्राणों की रक्षा मैंने ही की थी जब एक घायल अवस्था में थे मैं उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर ली गई थी तब उन्होंने मुझे कहा था देवी मैं आज बहुत प्रसन्न हूं और मैं आपको दो वरदान देना चाहती हूं तब मैंने कहा था कि महाराज पहले आप स्वस्थ हो जाएंगे वरदान तो बाद में भी दिए जा सकते हैं तब से वह वरदान महाराज के पास ही धरोहर के रूप में है तो मैं इन वरदानों के द्वारा ही तुम्हारा यह कार्य कर दूंगी तो भगवान ने पूछा की है माता ऐसा कैसे कर होगा तब माता कैकई ने कहा तुम इसकी चिंता मत करो मैं इस प्रकार से वरदान मांगूंगी कि जिससे तुम्हें महाराज खुद ही है क्या छोड़ने पर मजबूर कर दे वह भी 14 वर्ष के लिए क्योंकि उस समय रावण की आयु 14 वर्षीय से शेष गई थी


तब भगवान श्रीराम ने कहा हे माता तुम्हें सारा संसार अपयश देगा और तुम्हारा नाम लेना भी पाप समझेगा तुम यह सब कैसे सह पाओगे नहीं-नहीं माता तुम ऐसा मत करो तुम आने वाले युगो तक अपयश का भागी बनोगी तुम्हें सब गलत ही समझेंगे और बहुत कुछ गलत बोलेंगे तुम यह सब कैसे सह पाओगी माता नहीं-नहीं माता तो ऐसा मत करो


माता के कैकई ने हे राघव यह तुच्छ बात अगर मेरा अपयश होने से तुम्हारा यश बढ़ता है तो यह तो मेरी खुशी की बात है अगर मेरे इस कार्य से तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान आती है तो इससे बड़ी बात मेरे लिए और क्या हो सकती हैं दुनिया को जो चाह बोलने दो बस तुम प्रसन्न होने चाहिए मुझे किसी की परवाह नहीं है बस मुझे तुम्हारी परवाह है और तुम इसलिए रोक रहे हो ना क्योंकि मैं तुम्हारी सगी मां नहीं हूं अगर माता कौशल्या यह कार्य करने को कहती क्या तुम उन्हें भी रोकते तब श्री राम प्रभु की आंखों में आंसू आ गए कि मां मैंने कभी तुम्हें और कौशल्या मां में कोई फर्क नहीं करा ऐसे कैसे बोल सकती हो मगर मां चाहे कौशल्या मां हो, चाहे सुमित मां हो, चाहे तुम हो मेरे लिए तो सब एक समान है मां ऐसा कहकर तो मुझे अपने से दूर करना चाहती हो तभी माता कैकई ने कहा हे राम तुम एक वचन दो कि चाहे कुछ भी हो जाए तुम यह हम दोनों की बात किसी से नहीं कहोगे जब तक तुम्हारा कार्य सिद्ध ना हो जाएं लोग मेरा कितना है अपमान करें लेकिन तुम चुप रहोगे और अपना कार्य के लिए वन में चले जाओगे और हां 14 वर्ष के बाद राजा तुम ही बनोगे भरत नहीं मैं अपने भरत को जानती हूं उसके रहते तुम यहां से नहीं जा सकते हों


तों इसीलिए मैं सबसे पहले उसे उसके ननिहाल भेजती हूं उसके बाद तुम्हारे वन जाने की व्यवस्था करती हूं क्योंकि उसके रहते हुए हमारा यह प्रयास कभी सफल नहीं होगा


तब श्री राम ने कहा जब भरत को पता चलेगा कि उसकी माता की वजह से उसके बड़े भैया जिन्हें वह भगवान की तरह मानता है उन प्रभु श्री राम को वनवास भेज दिया गया है तो वह आपसे बहुत अधिक क्रोध करने लगेगा और आपको ही दोषी मानेगा शायद आपसे बात करना भी छोड़ दे और आपका सामना भी कभी ना करें तो आप कैसे सह होगी माता आप तो भरत को जानती हो उसे मेरे सिवा और कुछ नहीं सोचता है मेरे ही सुख में सुख मिलता है


माता कैकई ने कहा मुझे यह पता है तभी तो मैं पहले उसे ननिहाल भेज रही हूं और फिर बाद में तुम्हें वन में भेजने के लिए महाराज से कहूंगी चाह भरत मुझसे कितनी ही नफरत करें मुझे इसकी परवाह नहीं है क्योंकि मुझे पता है वह तुमसे मुझसे भी अधिक प्रेम करता है उसकी नफरत में मुझे तुम्हारे लिए प्यार ही दिखेगा तो उस नफरत से दुखी होने का क्या मतलब यह सब छोड़ो राघव बस तुम वन जाने की तैयारी करो


और फिर वह सब घटना घटी जो रामायण में लिखी हैं तो जो लोग माता कैकेई और मंथरा दोषी ठहराते हैं वह बहुत गलत करते हैं माता कैकई जैसा त्याग इस संसार में कोई नहीं कर सकता है उन्होंने तो ऐसा कार्य किया है शायद माता कौशल्या वह कार्य की हिम्मत ना कर सकती थी आपको यही लगता है कि माता कैकई ने बहुत गलत किया प्रभु श्रीराम के साथ मगर किसी को यह नहीं पता प्रभु श्रीराम के साथ नहीं अपने साथ बहुत गलत किया कलंक का टीका अपने माथे पर लगा कर प्रभु श्री राम का कार्य उन्होंने ही किया और वैसे भी जिनके पुत्र भरत लाल जी जैसे संत हो सकते हैं जिन्होंने एक पल में ही अयोध्या तो छोड़ो अपने जन्मधाय माता को भी त्याग दिया वह माता क्या गलत हो सकती है नहीं नहीं वह माता कभी गलत नहीं हो सकती है


माता कैकेई जैसा त्याग इस संसार में ना किसी ने किया है और ना ही कोई कर सकता है इस संसार में क्या इस ब्रह्मांड में भी कोई नहीं कर सकता है करने की तो छोड़ो कोई सोच भी नहीं सकता है कौन करेगा फिर भी ऐसा कार्य जिसे उसके युग में क्या हर युग में यह कलंक सहना पड़े उसकी वजह से ही प्रभु श्री राम को कष्ट हुआ कोई नहीं कर सकता है

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