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भक्ति महात्म्य

 जैसे दिल करें वैसे भक्ति करें। जैसा दिल कहे वैसे भजन करें।


आप कहेंगे ये क्या बात हुई? सही बात है और ये ही बात है। बहुत ज्यादा नियम में जाओगे तो थक जाओगे, हार जाओगे, परेशान हो जाओगे। इसका मतलब ये नहीं कि जो नियम से पूजा करते हैं वो गलत हैं…. पर हम जैसे कहाँ जायेंगे जो नियम नहीं कर पाते।


ध्यान – जिनकी ध्यान में रूचि है, जिनका ध्यान लग जाता है भगवान में और आपको ये करने में अगर सहजता होती है तो आप ध्यान करो। मान लीजिये आपको कोई ध्यान करने के लिए बोले और आपका ध्यान लग ही नहीं रहा। आप आँखें बंद करके बैठे रहो। मन में उलटे पुल्टे ख्याल आये। तो इससे अच्छा है न आप ध्यान ही न करो।


भजन – अगर आपका भजन करने में मन है। कोई भी एक भजन जो जिसे गाकर, सुनकर आप की आँख में आंसू आ जाए। तो वो आपके लिए भक्ति है। भगवान को याद करके आंसू आना…. भक्ति है… प्रेम है। वो आपकी भक्ति चल रही है। अगर आपकी भजन में रूचि नहीं है तो आप भजन मत गाइये।


कथा सुनना– आपकी कथा सुनने में रूचि है आप कथा सुनिए। लेकिन ये सब काम करते हुए थोड़ा ध्यान रखना ज़िद्द मत करना परिवार में कि हमें तो भजन करना है.. कथा सुननी है आप टीवी नहीं देखने देते.. या जो भी हो। शिकायत करना बंद करो यार… जो पहले कथा सुनी हो न उसका मनन करो फिर.. चिंतन करो। उसमें डूब जाओ।


नाम जप – यदि आपकी नाम जप में रूचि है। आप उठते बैठते राम नाम, कृष्ण नाम, हरि नाम, हनुमंत बाबा का नाम, शिव नाम, दुर्गा नाम, अल्लाह नाम, खुदा नाम या जो आपका दिल करें वो नाम…. आप ले सकते हैं। दिन रात उठते बैठते सोते जागते खाते पीते नाम लो। कोई नियम नहीं। आलस से लो, प्रेम से लो, हंसकर लो, रोकर लो, गाकर लो, खाकर लो.. जैसे भी लो पर नाम लो और कलयुग में तो

कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा।


सेवा श्रृंगार – कई भाई बहन भगवान का बड़ा सुन्दर श्रृंगार करते हैं। उन्हें समय से उठाते हैं, स्नान करवाते हैं, भोग लगाते हैं। इस तरह से ये उनकी भक्ति ही है। आप सेवा कीजिये.. श्रृंगार कीजिये।


अब चलिए थोड़ा श्रीमद्भगवद गीता जी का दर्शन करते है…


कृष्ण ने ज्ञान योग की चर्चा की है। कई बार लोगों को ज्ञान में बड़ी रूचि होती है। वो कई सारी किताबें पढ़कर ज्ञान अर्जित करते हैं। इसमें रूचि होती है। आत्मा को जानकार, पहचानकर, मन को निरोध करके.. बड़ी कठिन तपस्या करके वो आगे बढ़ते हैं। शरीर मन इन्द्रियों को वशीभूत करते हैं। आत्मा का मिलन परमात्मा से करवाते है। जो जो उपाय है आप गीता में पढ़ सकते हैं। अगर आपकी ज्ञान मार्ग में रूचि है तो आप ज्ञान मार्ग अपना लीजिये। भगवान ने गीता में कहा ज्ञान योग श्रेष्ठ है।


कर्म योग – हम कर्म करते करते भी भक्ति कर सकते हैं। कोई भी कर्म करते रहो और नाम जपते रहो। बुरा क्या है? एक भी व्यक्ति कर्म किये बिना नहीं रह सकता है। ये गीता का अकाट्य वाक्य है। कई बार हम शरीर से कर्म करना छोड़ भी दें पर मन को कैसे रोकेंगे आप। इसलिए अगर आपकी रूचि कर्म योग में है तो आप कर्म योग कीजिये। कर्म योग श्रेष्ठ है।


भक्ति योग – भक्ति योग का सीधा सा अर्थ है प्रेम। थोड़ा संसार में लें जिससे हमें प्यार होता है हमें उसकी याद आती है। फिर आप कितने भी busy क्यों न हो अपने प्रेमी के लिए समय निकल ही जाता है। ऐसे ही जिन जिन संतों का.. साधुओं का.. भक्तों का.. गोपियों का भगवान से प्रेम था … तो उन्हें भगवान को याद करने की जरुरत नहीं पड़ती थी बल्कि उनकी याद खुद आ जाती थी। याद बनी रहती थी।

गोपियाँ तो कहती थी प्यारे तुम क्यों याद आते हो। हम कोई काम ठीक से नहीं कर पाती जब तुम्हारी याद आती है। इतना याद न आया करो। जिन्हें हम भूलना चाहते हैं वो अक्सर याद आते हैं। मीराबाई जब प्रभु की याद में विह्वल होने लगती तो कभी नाचती कभी गाती और कभी रोती थी। इसलिए आपको भक्ति योग पसंद है तो भक्ति मार्ग अपना लो। भक्ति योग श्रेष्ठ है।


अब अर्जुन बोला केशव ये सब क्या है? तुम कभी कहते हो ज्ञान योग श्रेष्ठ है, कभी कहते हो कर्म योग श्रेष्ठ है, कभी कहते हो भक्ति योग श्रेष्ठ है। इतना कंफ्यूज क्यों करते हो? तुम दुविधा में ज्यादा डालते हो सुलझाते कम हो। ठीक से बताओ न।


कृष्ण बोले पार्थ ये सब तुम्हारे लिए ही तो है। जो तुम्हें पसंद हो वो करो। ज्ञान मार्ग पसंद है ज्ञान मार्ग से मुझे पा लो,, कर्म योग पसंद है तो कर्म योग से पा लो, भक्ति मार्ग पसंद है तो भक्ति योग से पा लो।


अर्जुन बोला और कुछ या और कोई तरीका? अगर ये सब भी न कर पाए तो?

तब भगवान ने कहा – सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । ये सब छोड़कर मेरी केवल एक मेरी शरण में आ जाओ। मुझसे प्यार करो, जगह जगह क्यों भटकते हो? एकमात्र मुझे ही आश्रय बना लो। फिर सब पाप पुण्य हानि लाभ मुझे समर्पित कर दो। तुम मेरे लोक को प्राप्त करोगे।


इसके अलावा श्रीमद भागवत पुराण में और रामचरितमानस में भी बताया गया है कि भक्ति के कितने प्रकार है। और किन किन भक्त ने कौनसी भक्ति की। शायद आप समझ गए होंगे कि भक्ति कैसे करें। और भक्ति का छोटा रूप नहीं है।

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