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पञ्चामृत स्नानाभिषेकम्

 पञ्चामृत स्नानाभिषेकम्


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क्षीराभिषेकं


आप्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वत॑स्सोम॒वृष्णि॑यं । भवा॒वाज॑स्य सङ्ग॒धे ॥ क्षीरेण स्नपयामि ॥




दध्याभिषेकं


द॒धि॒क्रावण्णो॑ अ॒कारिषं॒ जि॒ष्णोरश्व॑स्य वा॒जिनः॑ । सु॒र॒भिनो॒ मुखा॑कर॒त्प्रण॒ आयूग्ं॑षितारिषत् ॥ दध्ना स्नपयामि ॥





आज्याभिषेकं


शु॒क्रम॑सि॒ ज्योति॑रसि॒ तेजो॑ऽसि दे॒वोवस्स॑वितो॒त्पु॑ना॒ त्वच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ वसो॒ स्सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑ ॥ आज्येन स्नपयामि ॥




मधु अभिषेकं


मधु॒वाता॑ ऋतायते मधु॒क्षरन्ति॒ सिन्ध॑वः । माध्वी᳚र्नस्सं॒त्वोष॑धीः । मधु॒नक्त॑ मु॒तोषसि॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑व॒ग्ं॒ रजः॑ । मधु॒द्यौर॑स्तु नः पि॒ता । मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माग्ं अस्तु॒ सूर्यः॑ । माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः ॥ मधुना स्नपयामि ॥




शर्कराभिषेकं


स्वा॒दुः प॑वस्व दि॒व्याय॒ जन्म॑ने स्वा॒दुरिन्द्रा᳚य सु॒हवी᳚तु॒ नाम्ने᳚ । स्वा॒दुर्मि॒त्राय॒ वरु॑णाय वा॒यवे बृह॒स्पत॑ये॒ मधु॑मा॒ग्ं अदा᳚भ्यः ॥ शर्करया स्नपयामि ॥


याः फ॒लिनीर्या अ॑फ॒ला अ॑पु॒ष्पायाश्च॑ पु॒ष्पिणीः᳚ । बृह॒स्पति॑ प्रसूता॒स्तानो मुञ्चस्त्वग्ं ह॑सः ॥ फलोदकेन स्नपयामि ॥




शुद्धोदक अभिषेकं


ॐ आपो॒ हिष्ठा म॑यो॒भुवः॑ । ता न॑ ऊ॒र्जे द॑धातन । म॒हेरणा॑य॒ चक्ष॑से । यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रसः॑ । तस्य॑ भाजयते॒ ह नः॒ । उ॒ष॒तीरि॑व मा॒तरः॑ । तस्मा॒ अर॑ङ्ग माम वः । यस्य॒ क्षया॑य॒ जि॑न्वथ । आपो॑ ज॒नय॑था च नः ॥ इति पञ्चामृतेन स्नापयित्वा ॥

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