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योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः

 "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"


चित्त की वृत्तियों को रोकना, यही योग है।  निरोध अर्थात रोकना।  जो बहिर्मुख वृत्तियाँ हैं जो संसार की तरफ, जो बाह्य विषयों की तरफ जा रही हैं, वहां से उनको लौटकर, उलटाकर, अन्तर्मुख करके अपने चित्त में लीन कर लेना, यही योग है।  ऐसा यह निरोध सब चित्त की भूमियों में, सब प्राणियों का धर्म है जो कभी किसी के चित्त में प्रकट हो जाता है प्रायः यह चित्तों में छिपा हुआ ही रहता है अर्थात चित्त से तमरूपी मल का जो आवरण है उसको हटाकर और राजस की जो विक्षेपरूप चञ्चलता है उससे निवृत्त होकर सत्व के प्रकाश में जो एकाग्र वृत्ति से रहे उसको योग समझना चाहिए।  सारी सृष्टि, सत्व, रजस और तमस, इन तीन गुणों का ही परिणाम रूप है।  एक धर्म, आकार अथवा रूप को छोड़कर, धर्मान्तर के ग्रहण अर्थात दुसरे धर्म, आकार अथवा रूप के धारण करने को परिणाम कहते हैं।  चित्त इन गुणों का सबसे प्रथम सत्व प्रधान परिणाम है इसीलिए इसको चित्तसत्व भी कहते हैं, यह इसका अपना व्यापक स्वरुप है।  यह सारा स्थूल जगत जिसमें हमारा व्यवहार चल रहा है।  रज तथा तम प्रधान गुणों का परिणाम है।  बाह्य जगत के रज और तम प्रधान पदार्थों और विषयों से जब इस चित्त का संपर्क होता है तो उसको चित्तवृत्ति कहते हैं।  विषय को और स्पष्ट रूप से समझना चाहिए, मानो चित्त एक अगाध, परिपूर्ण सागर का जल है।  जिस प्रकार पृथ्वी के सम्बन्ध से खाड़ी, झील, तलाव, कुआं, सरोवर इत्यादि अनेक प्रकार के परिणाम को जल प्राप्त हो जाता है इसी प्रकार चित्त अपने अन्तर में राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय इत्यादि आकारों को धारण कर लेता है और जिस प्रकार वायु आदि के वेग से जल में तरंगे उठती हैं इसी प्रकार चित्त, इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों से आकर्षित होकर उनके जैसे ही आकारों के रूप में परिणित हो जाता है - यह सब चित्त की वृत्तियाँ कहलाती हैं जो कि अनन्त है और प्रतिक्षण उदय होती रहती हैं जैसे जल, वायु आदि के अभाव में तरंग आदि आकारों को परिणामों को त्याग कर अपने ही स्वभाव में, शान्त स्वभाव में अवस्थित हो जाता है वैसे ही जब चित्त, बाह्य तथा आभ्यन्तर विषयाकार परिणाम को त्यागकर अपने स्वरुप में अवस्थित हो जाता है तब उसको चित्तवृत्ति निरोध कहते हैं।  ये वृत्तियाँ रजोगुणी, तमोगुणी और सतोगुणी होती हैं।  जब उसमें रजोगुण और तमोगुण, इन दोनों का मेल होता है तब ऐश्वर्य और विषय प्रिय लगते हैं।  जब यह तमोगुण से युक्त होता है तब अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनीश्वरी को प्राप्त होता है।  वही चित्त जब तमोगुण के नष्ट होने पर रजोगुण के अंश से युक्त होता है तब धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐस्वर्य को प्राप्त होता है।  वही चित्त जब रजोगुण के लेशमात्र मल से भी रहित होता है तब वह अपने स्वरुप में स्थिर होता है, प्रतिष्ठित कहलाता है।  तब चित्त, सत्व और पुरुष की भिन्नता का ज्ञान होता है जिसको विवेक-ख्याति अथवा भेदज्ञान कहते हैं। विवेकख्याति के परिपक्व होने पर धर्म-मेघ समाधि की अवस्था प्राप्त होती है अर्थात वहां धर्म बरसता है, ब्रह्मानन्द अपना आत्मानन्द अपना स्वरुप है उसमें वो सराबोर हो जाता है।  इस प्रकार चित्त से पुरुष का भिन्न देखना विवेकख्याति कहलाती है।


तदा दृष्टस्वरूपे अवस्थानम् - क्योंकि इसमें कोई सांसारिक, प्राकर्तिक विषय नहीं रह जाता और जब अविवेक की अवस्था होती है अर्थात जब विवेक नहीं होता है उस समय यह चित्त अपनी स्वाभाविक पांच अवस्थाओं में रहता है उनके नाम पहले गिनाये थे - मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध।

मूढ़ अवस्था तम-प्रधान और सत्व वहां पर गौण होते हैं अर्थात दबे हुए होते हैं, तमोगुण की प्रधानता होती है इसलिए निद्रा, तन्द्रा, मोह, भय, आलस्य, दीनता, भ्रम इत्यादि इसके गुण है।


दूसरी अवस्था है क्षिप्त अवस्था - इसमें रजोगुण प्रधान होता है तथा तम और सत्वगुण गौण होते हैं।  दुःख, चञ्चलता, चिन्ता, शोक और संसार के कामों में प्रवृत्ति, अज्ञान, अधर्म, राग, अनैश्वर्य, ज्ञान, धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य इन सबमें  मिली-जुली प्रवृत्ति इस क्षिप्त अवस्था में होती है।  कभी धर्म का विचार करता है कभी अधर्म का विचार करता है।


तीसरी अवस्था है विक्षिप्त अवस्था - यह सत्व प्रधान है, इसमें रज और तमोगुण गौण हैं, दबे हुए रहते हैं।  इस अवस्था में सुख, प्रसन्नता, क्षमा, श्रद्धा, धैर्य, चैतन्यता, उत्साह, वीर्य, दान और दया और विशेषकर के ज्ञान, धर्म, वैराग्य और ऐस्वर्य की वृत्तियों की प्रबलता रहती है।


चौथी अवस्था है एकाग्र अवस्था - इस अवस्था में भी सत्व गुण ही प्रधान रहता है, रज और तम, ये नाममात्र के लिए रहते हैं।  इस अवस्था में वास्तु का यथार्थ ज्ञान होता है।  इस अवस्था में तटस्थता आती है। यह इष्ट अवस्था है, प्राप्त करने जैसी स्थिति है।


और अगली है पांचवीं निरुद्ध अवस्था - ये तीनों गुणों से बाहर है।  यहाँ सारे चित्त के परिणाम बन्द हो जाते हैं केवल संसार शेष रहते हैं।  इसी अवस्था में दृष्टा की स्वरुपस्थिति होती है।  यह ऊंचे योगियों की स्थिति है।  जब चित्त की वृत्तियों का सम्पूर्णतया निरोध हो जाता है तो -

दृश्यस्वरूपे अवस्थानं - तदा मने तब ऐसी स्थिति में वह अपने स्वरुप में स्थित हो जाता है और यदि नहीं होता तो -

वृत्तिसारूप्य मितरत्र - वृत्ति की ही समानरूपता को धारण कर लेता है। अब ये वृत्तियाँ पांच प्रकार की होती है।  पतञ्जलि ने वृत्तियों का विभाग किया है, पांच में उनको बाँट दिया है।

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